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क्या सुस्ती के लंबे दौर से उबरने की तैयारी कर रही है ये कमोडिटी इंडस्ट्री?

Tea stocks: कमज़ोर फ़ाइनेंशियल्स और मुश्किल दौर से गुज़र रही इस साइक्लिक इंडस्ट्री में क्या कोई उम्मीद की किरण बाक़ी है?

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Tea stocks in india: शुरू में दरकिनार, पर बाद में जश्न! भारतीय मार्केट में सफलता की ऐसी कहानियों की कोई कमी नहीं है. उदाहरण के लिए, रियल एस्टेट, स्टील, ऑयल और कोयला जैसे मौज़ूदा स्टार परफ़ॉर्मर सेक्टरों के बारे में कुछ साल पहले तक कहा जाता था कि ये ख़राब निवेश हैं. लेकिन अब इन सेक्टरों के निवेशक गदगद हैं. इन सभी सेक्टरों में एक प्रमुख समानता इनका साइक्लिक होना है. जैसे-जैसे इनका साइकल बदलता गया, वैसे-वैसे इनकी क़िस्मत भी बदलती गई. शायद ऐसी ही कहानी चाय बागान (टी प्लांटेशन) सेक्टर में भी चल रही है, जो इस वक़्त गुमनामी में है और शायद इसकी कोई अच्छी वजह भी हो. लेकिन क्या ये सेक्टर गिरावट के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है और अब और नीचे नहीं गिर सकता?

ख़राब दौर

टी प्लांटेशन कंपनियां पिछले कई सालों से पिछड़ी हुई हैं. उन्होंने 2018 से -30 फ़ीसदी का औसत रिटर्न (गिरावट) दिया है. उदाहरण के लिए, मैकलॉयड रसेल में इस अवधि के दौरान 87 फ़ीसदी से ज़्यादा गिरावट आई, जिसकी बड़ी वजह कंपनी के मिसमैनेजमेंट के साथ-साथ सेक्टर की ख़राब स्थिति भी है.

सेक्टर में क्या दिक़्क़त है?

अफ्रीका से ज़्यादा सप्लाई के कारण, पिछले 10 साल में वैश्विक स्तर पर चाय की क़ीमतें स्थिर रही हैं. इसमें कोई हैरानी वाली बात नहीं कि प्रमुख एक्सपोर्टर होने के कारण इससे भारत को एक बड़ा झटका लगा. इसके अलावा, भारत की प्रोडक्शन यील्ड सुस्त रही जबकि कंपनियों के ख़र्च में लगातार बढ़ोतरी हुई, जिससे मार्जिन में कमी आई. इस इंडस्ट्री में कंपनियों का ख़र्च मुख्य रूप से कर्मचारी ख़र्च के रूप में सामने आता है जो बहुत ज़्यादा बना हुआ है और सरकारी नियमों के कारण अभी भी बढ़ रहा है. इससे इंडस्ट्री की प्रॉफ़िटेबिलिटी कम हो रही है.

क्या ख़राब दौर गुज़र चुका है?

इस सवाल का ज़वाब इन फ़ैक्टर में मौजूद है:

  • दिक़्क़त तो है लेकिन...
    टी इंडस्ट्री ज़्यादा सप्लाई की समस्या से जूझ रही है, जिसने क़ीमतों को दबा कर रखा है. कमोडिटी बिज़नस में, आर्थिक नुक़सान के कारण कई खिलाड़ी इंडस्ट्री से बाहर निकल जाते हैं, जिससे सप्लाई-डिमांड का अंतर प्रभावी रूप से बहाल हो जाता है. टी इंडस्ट्री में ये ट्रेंड पहले से ही देखा जा रहा है, जहां पिछले कुछ साल में कई टी एस्टेट और प्रोसेसिंग फैसिलिटी बंद हो गई हैं.
  • सप्लाई पर दबाव की उम्मीद
    इंडस्ट्री में सप्लाई पर दबाव या बाधा एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है जो क़ीमतों को बढ़ा सकता है और कंपनियों को अपना ज़्यादा ख़र्च वसूलने में मदद कर सकता है. ऐसा ही एक डिसरप्सन जलवायु परिवर्तन के ख़राब असर के कारण हुआ था, जिसने हाल ही में क़ीमतों में उछाल ला दिया था. वैश्विक स्तर पर ट्रैक किए जाने वाले कोलकाता के ऑक्शन टी प्राइस पिछले तीन महीनों में दोगुने हो गए हैं (मार्च 2024 में $1.6 प्रति किलोग्राम से बढ़कर मई 2024 में $3 प्रति किलोग्राम). इसकी वजह असम और पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख चाय उत्पादक राज्यों में ख़राब मौसम की स्थिति है. लाल सागर में चल रही लॉजिस्टिक संबंधी समस्याओं ने भी इस ट्रेंड में मदद की है. दुनिया में सबसे ज़्यादा खपत वाली असम CTC टी (Assam CTC tea) ने भी हाल ही में ऑक्शन में अपनी सबसे ज़्यादा क़ीमत हासिल की.
  • अच्छी खपत
    भले ही मार्केट में ज़्यादा सप्लाई एक समस्या रही हो, पर वैश्विक स्तर पर चाय की खपत में अभी भी गिरावट के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं. इस कमोडिटी की कंजम्पसन ग्रोथ धीमी होने की संभावना नहीं है, बल्कि 3-4 फ़ीसदी के पिछले रिकॉर्ड के अनुरूप स्थिर रहने की संभावना है. इसलिए, सिर्फ़ ज़्यादा सप्लाई वाले मुद्दे से निपटने की ज़रूरत है.
  • वैल्यूएशन
    साइक्लिक बिज़नस में निवेश करने का सबसे सही समय तब होता है जब वे या तो कम अर्निंग के कारण ज़्यादा P/E रेशियो पर क़ारोबार कर रहे हों या फिर घाटे के कारण कोई P/E रेशियो ही न हो. आसान भाषा में कहें तो आपको उनकी अर्निंग के सबसे निचले स्तर के आस-पास उन्हें पकड़ना होता है. इस समय सभी टी स्टॉक इसी स्तर पर हैं, जिनकी वैल्यू उनके नेट एसेट से भी कम है. धुनसेरी टी एंड इंडस्ट्रीज़ (Dhunseri Tea and Industries) का मामला ही देख लें; इस समय इसका वैल्यूएशन इसके बुक वैल्यू के आधे से भी कम पर है, क्योंकि इसके फ़ाइनेंशियल्स बहुत अच्छे नहीं है.
  • हमारी राय

    इस सेक्टर में संदेह और निराशा की स्थिति बनी हुई है क्योंकि प्रॉफ़िटेबिलिटी कम हो रही है और कई खिलाड़ी बाहर निकल रहे हैं. लेकिन ऐतिहासिक रूप से, ऐसी परिस्थितियां कई कमोडिटी और साइक्लिक बिज़नस में सकारात्मक बदलाव आने से पहले भी रही हैं. आइए, ऑयल और कोयला इंडस्ट्री के उदाहरण पर वापस आते हैं. रिन्यूएबल एनर्जी की बढ़ती प्राथमिकता के कारण वे मार्केट में सबसे कम पसंदीदा थे, पर रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से एनर्जी सिक्योरिटी का मुद्दा वापस छा गया, जिससे दोनों सेक्टरों में सकारात्मक बदलाव आया.

    हालांकि, टी प्लांटेशन इंडस्ट्री को उम्मीद की नज़र से देखने से पहले ये याद रखें कि इस सेक्टर में कोई भी सुधार काफ़ी हद तक सप्लाई के घटने पर निर्भर करेगा. इसके अलावा, निवेशकों को उन कंपनियों पर ही फ़ोकस करना चाहिए जो अपनी ऑपरेशनल एफिशिएंसी में सुधार ला रहे हैं.

    ये लेख कोई सुझाव नहीं है. कोई भी निवेश का फ़ैसला लेने से पहले ज़रूरी जांच-पड़ताल कर लें.

    ये भी पढ़िए- क्या फ़र्टिलाइज़र कंपनियां मुश्किलों से उबर पाएंगी?

Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.

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