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स्टॉक प्राइस देख कर ठगे मत जाइए

उठा-पटक वाले मार्केट में प्राइस के ऊपर-नीचे होने का जुनून हावी होने देंगे तो भटक जाएंगे

उठा-पटक वाले मार्केट में प्राइस के ऊपर-नीचे होने का जुनून हावी होने देंगे तो भटक जाएंगे Anand Kumar

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5:27

पिछले कुछ वक़्त से भारतीय स्टॉक मार्केट रोलर कोस्टर जैसे रहे हैं और एक अनोखा नज़ारा पेश कर रहे हैं. हर रोज़, न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया फ़ीड स्टॉक के प्राइस और इंडेक्स लेवल को लेकर बिना रुके कंमेंट्री सुना रहा है. लगातार चल रही उठा-पटक की ये कहानी कई निवेशकों के माथे पर चिंता की लकीरें ला रही हैं और वो सांसें थामे सुन रहे हैं. आदतन फ़ोन पर उंगलियां हर एक मिनट पर तलाश रही हैं कि अब प्राइस कहां है और कहीं मेरे निवेश के फ़ैसलों को ग़लत तो नहीं साबित कर रहा है.

प्राइस ऊपर-नीचे होने को लेकर ये जुनून बताता है कि स्टॉक प्राइस और निवेश के फ़ैसलों पर होने वाले उसके असर की बुनियादी समझ में कोई खोट ज़रूर है. ये बात, शॉर्ट-टर्म के उतार-चढ़ावों की सनक सवार होने तक ही सीमित बात नहीं-ये बात, स्टॉक प्राइस को लेकर बहुत से निवेशकों के ग़लत मानसिक मॉडल की है.

मैंने देखा है, बहुत से निवेशकों को कम प्राइस वाले स्टॉक 'सस्ते' लगते हैं, और इसलिए, ऊंचे प्राइस वाले स्टॉक निवेश के लिए बेहतर समझे जाते हैं. इसी ग़लतफ़हमी जैसी कुछ बड़ी दिलचस्प मिसालें आपको म्यूचुअल फ़ंड NAV को लेकर मिल जाएंगी, मिसाल के तौर पर कई लोग समझते हैं कि निवेश के लिए एक जैसे NAV की ही आपस में तुलना करनी चाहिए. ये दोनों सोच ग़लत हैं. म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री ने इस ग़लतफ़हमी के ख़िलाफ़ लंबी लड़ाई भी लड़ी है, जिसमें निवेशक मान बैठते हैं कि एक फ़ंड जिसका NAV ₹15 है वो 'सस्ता' है या उसके 'बढ़ने की गुंजाइश ज़्यादा है' बजाए उस फ़ंड के जिसका NAV ₹50 का है. फ़ंड मैनेजरों और सलाह देने वालों को इस बात को लगातार समझाना चाहिए कि NAV सिर्फ़ अकाउंटिंग का पैमाना है, फ़ंड की वैल्यू की संभावना नहीं है. मगर अचरज की बात है कि मंझे हुए निवेशक जो म्यूचुअल फ़ंड के इस कॉन्सेप्ट को तो अच्छी तरह समझते हैं, पर अक्सर स्टॉक प्राइस को लेकर इसी जाल में फंस जाते हैं.

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आइए इसे ज़रा बारीक़ी से समझें. हां, निवेश में किसी स्टॉक का प्राइस एक अहम रोल अदा करता है-कम प्राइस, स्टॉक ख़रीदने की सही वजह होती है, और हाई प्राइस बेचने का या फिर ऊंचे प्राइस पर न ख़रीदने का अच्छा कारण हो सकता है. ये कॉन्सेप्ट क़रीब-क़रीब सभी इक्विटी इन्वेस्टमेंट पर लागू होता है. मगर, ये 'ऊंचा' या 'कम' होना कोई अंतिम वाक्य नहीं है जिसके आगे-पीछे कोई किंतु-परंतु हो ही न. ये उस क़ीमत के मुक़ाबले ज़्यादा या कम होता है जो आप तय करते हैं कि इस एक स्टॉक का सही प्राइस क्या है, और इस फ़ैसले का आधार उस स्टॉक के बुनियादी पैरामीटर, संभावनाओं, या दूसरे अहम फ़ैक्टर होते हैं.

इस समय मार्केट में जो उतार-चढ़ाव चल रहा है वो इस ग़लतफ़मी को और भी गहरा कर रहा है. जब प्राइस बहुत ज़्यादा ऊपर-नीचे होते हैं, तो अक्सर निवेशक इस ज़रूरी फ़र्क़ से आंख हटा बैठते हैं. वो स्टॉक, जो ₹15 पर ट्रेड कर रहा है, वो अपने-आप में ₹500 पर ट्रेड करने वाले से सस्ता नहीं होता. हो सकता है ₹15 वाले स्टॉक का इस प्राइस पर वैल्युएशन बहुत ज़्यादा हो, और ₹500 वाला एक सस्ता सौदा साबित हो. सिर्फ़ प्राइस का नंबर देख कर ही दो अलग-अलग कंपनियों की तुलना नहीं की जा सकती.

दिलचस्प ये है कि इस टेढ़ी-मेढ़ी सोच ने इन्वेस्टमेंट का का एक पूरा सब-कल्चर खड़ा कर दिया है जो 'सस्ते' स्टॉक्स पर टिका है-यानि, भारत के रुपए के स्टॉक बाक़ी जगहों के पेनी स्टॉक. कम प्राइस के स्टॉक का ये आकर्षण इतना गहरा है कि इसके लिए ख़ासतौर पर रिसर्च टूल्स और वेबसाइट बनाई गई हैं जो उन्हें फिल्टर करने का ही काम करती हैं. लगता है जैसे सिर्फ़ प्राइस का लेवल ही इन्वेस्टमेंट के फ़ैसलों की बुनियाद हो गया है, जिसमें किसी फ़ंडामेंटल अनालेसिस की ज़रूरत ही नहीं रह गई है.

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विडंबना ये है कि मंझे हुए निवेशक प्राइस-टू-अर्निंग या प्राइस-टू-बुक जैसे प्राइस-बेस्ड रेशियो की वैल्यू का इस्तेमाल एनेलाइज़ करने वाले टूल की तरह करते हैं. इन रेशियो से कई कंपनियों के बीच तुलना इसलिए की जा सकती है क्योंकि ये बिज़नस के बुनियादी पैमानों के प्राइस को एक संदर्भ देते हैं. हालांकि, तुलना करने के इस तर्क के लिए सिर्फ़ प्राइस के नंबरों को चुन लेना एक बुनियादी ग़लती है जो निवेशक, उठा-पटक के दौर में ख़ासतौर पर कर बैठते हैं.

आज के इस बड़े उतार-चढ़ावों वाले माहौल में, प्राइस को लेकर ऐसा जुनून ख़ासतौर पर ख़तरनाक है. प्राइस में लगातार चलने वाली उठा-पटक, जानकारियों का एक ऐसा भ्रम खड़ा कर देती है, जो असल में होता ही नहीं है. उतार-चढ़ाव वाले मार्केट में किसी एक स्टॉक का 5% गिरना उसे ख़रीदने के लिए बेहतर बना देगा, ऐसा ज़रूरी नहीं, ठीक वैसे ही जैसे महज़ 5% बढ़ना उसे ओवरवैल्यूड नहीं कर देता.

इस मुश्किल का हल प्राइस को पूरी तरह नकारने में नहीं है, क्योंकि ये निवेश के फ़ैसलों में अपनी अहमियत रखता है. इसके बजाए, ज़रूरत इस बात को समझना है कि प्राइस किसी संदर्भ में ही मायने रखता है, अब वो संदर्भ कंपनी की बुनियादी बातें हो सकते हैं, संभावनाएं हो सकती हैं या फिर पूरे मार्केट की स्थिति हो सकती है. ज़्यादा उतार-चढ़ाव वाले मार्केट में ये नज़रिया बड़े काम का होता है और निवेश को सही बनाए रखने के लिए ज़रूरी भी.

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