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ठग जो ख़ुद को ठगे

शेयर बाज़ार में झटपट मुनाफ़े का लोभ ऐसा है कि घोटालेबाज़ अक्सर न केवल अपने शिकार को बल्कि ख़ुद को भी बेवकूफ़ बना बैठते हैं.

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एक ठेठ हेडलाइन जैसी हेडलाइन थी, "मुंबई सी.ए. अंबर दलाल निवेशकों के करोड़ों लेकर भागा." सोशल मीडिया पर यही ख़बर विस्तार से थी, जिसमें विरोध के लिए पीड़ितों के एकजुट होने की बात थी. ऐसे मामलों में सोशल मीडिया का रोल नई घटना है, लेकिन इन घोटालों का कथानक बहुत पुराना है. एक 'इन्वेस्टमेंट एडवाइज़र' पैसे मैनेज करना शुरू करता है. कुछ समय के लिए, तेज़ी से बढ़ते बाज़ार में शानदार रिटर्न कमा कर अपने ग्राहकों को देता है, लेकिन जब स्टॉक की क़ीमतें कुछ थमती हैं, तो लोगों को पैसा मिलना बंद हो जाता है. कभी ये घोटालेबाज़ ग़ायब हो जाते हैं, और कभी, जुर्म क़ुबूलते पाए जाते हैं. कुछ पकड़े जाते हैं और कुछ हाथ नहीं लग पाते हैं. मगर, मूल कहानी कमोबेश पुरानी लीक पर चलती है. जहां तक श्री दलाल का सवाल है, वो धोटाले के साइज़ के लिहाज़ से शायद ही बर्नी मैडॉफ़ के आसपास फटक सकें - ज़्यादातर रिपोर्टों में कहा गया है कि वो क़रीब 50 करोड़ रुपये मैनेज करते थे, हालांकि कई जगह ये आंकड़ा 500 या 1000 करोड़ के बीच छलांगें मार रहा है.

हालांकि, ये मौसम ही स्टॉक से जुड़े घोटालों का है - या यूं कहें, ये स्टॉक से जुड़े घोटालों पर पानी फिरने और धुलाई के बाद उनके उजागर होने का मौसम है. जब बाज़ार में तेज़ी हो, तो हर तरह की ठगने वाली स्कीमें और गड़बड़-घोटाले जारी रह सकते हैं. पर जब स्टॉक की क़ीमतें हिचकोले खाने लगती हैं, तो घोटालेबाज़ अपनी नाव डुबो बैठते हैं.

पर सबकुछ हमेशा एक जैसा नहीं होता, हर कहानी में कुछ-न-कुछ फ़र्क़ आता रहता है. इनमें से कुछ घोटालेबाज़ बाघ की पीठ पर सवारी की ठीक-ठाक शुरुआत करते हैं मगर उसकी पीठ से उतर नहीं पाते. शायद अंबर दलाल के साथ भी ऐसा ही हुआ. वहीं, सत्यम के राजू भाई भी ऐसी ही कहानी रहे. ये किसी अलग ही मिट्टी के बने थे. और शिवराज पुरी की मिसाल लें, जिन्हें पहली बार 2011 में तब गिरफ़्तार किया गया था, जब उन्होंने सिटीबैंक रिलेशनशिप मैनेजर के तौर पर काम करते हुए गुरुग्राम में बैंक ग्राहकों से क़रीब ₹400 करोड़ का चूना लगाया था. उन्हें गिरफ़्तार किया गया, ज़मानत नहीं मिली और फिर छह साल बाद एक और घोटाले में दोबारा गिरफ़्तार हुए. मैं समझता हूं कि कुछ साल पहले जेल में उनकी मृत्यु हो गई.

निवेशकों के लिए सबक़ साफ़ है: अगर कोई चीज़ इतनी अच्छी है कि यक़ीन नहीं होता, तो संभवतः यक़ीन न करना सही है. तेज़ी के बाज़ार में, हाई रिटर्न के वायदे पर मोहित होना और ख़तरे के हर लाल निशान को नज़रअंदाज़ करना आसान होता है. मज़े की बात ये है कि कुछ घोटालेबाज़ों को भी यही सबक़ सीखने की ज़रूरत है. कहा जाता है कि पुरी को इसलिए पकड़ा गया क्योंकि उन्होंने उस सारे पैसे का इस्तेमाल डेरिवेटिव्स के लिए किया था, जिसमें वो पैसा गंवा बैठे. दूसरी तरफ़ राजू का केस भी ऐसा ही था. शायद अंबर दलाल भी इसी तरह हैं. कुल मिला कर, सामान्य अपराधियों के उलट, इन लोगों ने जिन कहानियों से लोगों को लूटा, उन्हीं कहानियों से ख़ुद को भी धोखा दिया. ये बताता है कि शेयर बाज़ार में ताबड़तोड़ कमाई का लोभ कितना ताक़तवर है.

इसीलिए, मैं कहता हूं कि निवेशकों, घोटालेबाज़ों और संभावित घोटालेबाज़ों, सभी को याद रखना चाहिए कि पैसा बनाने का कोई शॉर्टकट नहीं. लंबे समय में अच्छी क्वालिटी वाले एसेट (संपत्तियों) में लगातार और अनुशासित निवेश ही आर्थिक (वित्तीय) सुरक्षा का इकलौता और भरोसेमंद रास्ता है. तुरत-फुरत रिटर्न के पीछे भागना और अपनी गाढ़ी कमाई को रेग्युलेशन के दायरे से बाहर की संस्थाओं के हवाले करना, अपने सर्वनाश को आमंत्रित करने का सटीक नुस्ख़ा है.

निवेश घोटालों के लंबे इतिहास के बावजूद, समस्या की मौलिक प्रकृति वही पुरानी है. यहां तक कि जो व्यक्ति ख़ुद को जानकार और चतुर-चालाक निवेशक समझते हैं वो भी निवेश के बड़े फ़ायदे को देख कर रीझने से ख़ुद को रोक नहीं पाते. ये सब इशारा करता है, वित्तीय साक्षरता में कमी की ओर - इस बात की समझ की कमी कि कौन सी रणनीतियां काम की हैं और कौन सी नहीं. हालांकि, सच्चाई की बयार उलटी भी बह सकती है. यानी, केवल यही सीखने पर ध्यान देना कि क्या करना है, इसके बजाय लोगों के लिए ये समझना ज़्यादा फ़ायदेमंद हो सकता है कि उन्हें अपने पैसों के साथ क्या नहीं करना चाहिए.

क्या नहीं करना है इस पर ध्यान देने की बात में दम है. यही 'नेगेटिव अप्रोच के ज़रिए' (via negativa) वाली बात है. एक ऐसा दार्शनिक सिद्धांत, जो कहता है कि हमेशा कुछ जोड़ने के बजाय, हटाने वाली चीज़ों पर ध्यान दे कर हम बेहतर नतीजे हासिल कर सकते हैं. निवेश में, इसका मायने हुआ, आम तरह के ट्रैप और ग़लतियों की पहचान और उनसे बचने का गुर सीखना.

आप बाज़ार को लगातार हरा सकते हैं इस तरह का अति-आत्मविश्वास, ट्रेडिंग की अति की तरफ़ ले जाता है और डाइवर्सिफ़िकेशन के साथ, लंबे समय की होल्डिंग के फ़ायदों की उपेक्षा करवाता है. इस ट्रैप से बच कर, और विनम्रता और धीरज धारण कर, निवेशक अपनी सफलता की संभावनाओं को बहुत बेहतर कर सकते हैं.

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