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निवेश के मौक़े गंवाने की समझदारी

वॉरेन बफ़े की सबसे बड़ी पछतावे की बात आपको डराएगी नहीं, भरोसा देगी

the-wisdom-of-missing-opportunitiesAditya Roy/AI-Generated Image

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सारांशः वॉरेन बफ़े कहते हैं उनकी सबसे बड़ी ग़लतियां वही मौक़े हैं जो उन्होंने गंवा दिए. फिर भी उन्होंने असाधारण सफलता पाई. सीख ये है कि हर मौक़े को पकड़ना ज़रूरी नहीं, बल्कि अपनी समझ के दायरे में रहकर निवेश करना सही है. क्यों? जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें.

कई दशक पुराना एक वीडियो हाल ही में सोशल मीडिया पर सामने आई. इसमें एक नौजवान श्रोता वॉरेन बफ़े से उनके सबसे बुरे निवेश के बारे में पूछता है. बफ़े का जवाब उनकी आदत के मुताबिक़ साफ़ और सटीक था: उनकी सबसे बड़ी ग़लतियां वे निवेश नहीं थे जो ग़लत साबित हुए, बल्कि वे मौक़े थे जो उन्होंने पूरी तरह गंवा दिए. उनका अनुमान है कि उन्होंने उन निवेशों में क़रीब 10 अरब डॉलर के मुनाफ़े से हाथ धोया, जिन्हें वो अच्छी तरह समझते थे मगर फिर भी नहीं किए.

इस क़बूलनामे पर स्वाभाविक प्रतिक्रिया डर की हो सकती है. अगर दुनिया का सबसे महान निवेशक अक्सर ऐसे "छूटे मौक़ों की ग़लतियां" करता है, तो बाक़ी हम सबको तो दोगुना मेहनत करनी चाहिए कि हम कोई मौक़ा न चूकें? लेकिन ये सोच बिल्कुल ग़लत होगी.

असल में बफ़े का ये स्वीका करना आम निवेशकों के लिए गहरा सुकून देने वाला होना चाहिए. ये वही व्यक्ति है जिसने छह दशकों से भी ज़्यादा समय तक ग़ज़ब के रेट पर दौलत बढ़ाई, और फिर भी वो बड़े मौक़ों के छूटने की बात खुलकर मानते हैं. अहम सीख ये है कि हर लहर को पकड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि ये समझना कि मौक़े छूटना भी सफल निवेश का ही एक हिस्सा है.

सोचिए, बफ़े और उनके साथी चार्ली मंगर ने उन मौक़ों पर क्या किया जिन्हें वो पूरी तरह नहीं समझते थे. दशकों तक उन्होंने टेक्नॉलॉजी शेयरों से दूरी बनाए रखी. उन्होंने गूगल को ठुकरा दिया, जबकि उन्होंने अपनी इंश्योरेंस कंपनियों में उसकी विज्ञापन ताक़त को ख़ुद देखा था. मंगर ने एक बार स्वीकार किया था, "हम बस बैठे-बैठे अंगूठा चूसते रह गए." उन्होंने एप्पल में निवेश तब किया जब वो टेक्नॉलॉजी से ज़्यादा एक लक्ज़री कंज़्यूमर ब्रांड बन चुका था.

आम व्याख्या ये होगी कि उन्हें इन सेक्टरों को पहले समझने की कोशिश करनी चाहिए थी. लेकिन यही असल मुद्दे को मिस करना है. मंगर जिसको उनका "सर्कल ऑफ़ कॉम्पिटेंस" कहते थे और जिसके इर्द-गिर्द मैंने पहले एक कॉलम में "डोनट ऑफ़ इनकम्पिटेंस" कहा था, उसके भीतर रहते हुए उन्होंने कहीं ज़्यादा बड़े और महंगे नुक़सान से अपने को बचा लिया.

पिछले दो दशकों में टेक्नॉलॉजी सेक्टर के हालातों को देखिए. हर गूगल या एप्पल के बदले, दर्जनों कंपनियां थीं जिन्होंने क्रांति का वादा किया लेकिन नुक़सान ही दिए. Pets.com, Webvan, WeWork, QuiBi और अनगिनत सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, जो कुछ समय के लिए भर चमके और फिर ग़ायब हो गए - टेक्नॉलॉजी का ये कब्रिस्तान बहुत बड़ा और बेहद महंगा है.

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जब निवेशक "छूटे मौक़ों की ग़लतियों" से बचने पर अटक जाते हैं, तो वो "किए गए मौक़ों की ग़लतियां" कर बैठते हैं. वे उन क्षेत्रों में निवेश करने लगते हैं जिन्हें वे समझते नहीं, उन कंपनियों में जिनके मॉडल उन्हें उलझाते हैं, या उन ट्रेंड्स में जिनका सही आकलन वो कर ही नहीं सकते. "फ़ियर ऑफ़ मिसिंग आउट" यानी FOMO उन्हें उनके सर्कल से बाहर धकेल देता है, जहां नुक़सान की संभावना फ़ायदे से कहीं ज़्यादा होती है.

ये स्थिति व्यक्तिगत निवेशकों के लिए और भी ख़तरनाक है, जिनके पास न तो ऐसे संसाधन हैं और न ही वो समय जो पेशेवर फ़ंड मैनेजरों के पास होता है. जब आप अपनी नौकरी और परिवार की ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ पोर्टफ़ोलियो भी संभाल रहे हों, तब हर मौक़े को पकड़ने की कोशिश भारी नुक़सान कर सकती है.

निवेश का गणित भी इसी सतर्क नज़रिए की पैरवी करता है. जैसा कि मैंने पहले लिखा है, आम तौर ये अनुमान लगाना आसान होता है कि किसी निवेश में क्या ग़लत हो सकता है, बजाय इसके कि क्या बेहद शानदार साबित होगा. सफल निवेश ज़्यादातर समझदारी भरे फ़ैसलों की एक श्रृंखला से आता है, न कि भविष्य की अद्भुत भविष्यवाणियों से.

बफ़े के छूटे मौक़े बर्कशायर हैथवे को दुनिया की सबसे क़ीमती कंपनियों में से एक बनने से नहीं रोक पाए. उनके शेयरधारकों ने टेक्नॉलॉजी शेयरों में हर मौक़े का फ़ायदा न उठाने से कोई नुक़सान नहीं उठाया. बल्कि, उन्हें बफ़े के अनुशासन से ही बहुत बड़ा फ़ायदा हुआ, जो उन्होंने उन्हीं क्षेत्रों में निवेश करके बनाया जहां वे सूझ-बूझ के साथ फ़ैसले ले सकते थे.

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आम निवेशकों के लिए सीख ये नहीं कि मौक़ों को पकड़ने में और आक्रामक बनना है, बल्कि ये कि उन्हें छोड़ देने में सहज होना है. हर सफल निवेशक के पास ऐसे मौक़ों का एक कब्रिस्तान होता है जिन्हें उन्होंने अपनाया नहीं. असली बात ये है कि जिन निवेशों को आप करते हैं, वे आपकी समझ और विश्वास पर टिके हों, न कि "मिस करने के डर" पर.

इसका ये मतलब नहीं कि बिल्कुल रूढ़िवादी बन जाना है या हर जोखिम से बचना है. इसका मतलब है ऐसी आत्म-चेतना विकसित करना कि कौन से मौक़े आपकी समझ के दायरे में हैं और कौन से बाहर. जब आप किसी ऐसे निवेश से रूबरू हों जो आशाजनक लगता हो लेकिन आपकी समझ से बाहर हो, तो अक्सर सबसे समझदारी भरा रास्ता उसे जाने देना ही होता है.

जैसा कि मंगर ने कहा था, "मैं बहुत बुद्धिमान बनने की कोशिश करने के बजाय मूर्ख बनने से बचने की कोशिश करता हूं." मौक़े गंवाना तकलीफ़देह लगता है, लेकिन ऐसी जगह निवेश करना जिसे आप समझते नहीं, कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है. बफ़े की ये "छूटे मौक़ों" वाली पछतावे की कहानियां उन्हें असाधारण सफलता पाने से नहीं रोक पाईं - वे तो बस दशकों तक निवेश अनुशासन बनाए रखने की ज़रूरी क़ीमत हैं.

अगली बार जब आप किसी ऐसे निवेश ट्रेंड का पीछा करने को उकसाए जाएं जिसे आप पूरी तरह नहीं समझते, तो याद कीजिए कि बफ़े भी अरबों डॉलर के मौक़ों से चूक जाते हैं. सफल और असफल निवेशकों में अंतर दूरदृष्टि में नहीं, बल्कि इसी समझदारी में है कि अपनी "सर्कल ऑफ़ कॉम्पिटेंस" या जानकारी के दायरे में रहें, चाहे कितने ही आकर्षक मौक़े बाहर क्यों न बुला रहे हों.

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