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ये समय वाक़ई अलग है

जब स्थिरता आत्मसंतोष पैदा करे, तो निवेशकों को फिर से सावधानी बरतनी चाहिए

जब स्थिरता आत्मसंतोष पैदा करे, तो निवेशकों को फिर से सावधानी बरतनी चाहिएAditya Roy/AI-Generated Image

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“इस बार चीज़ें अलग हैं” - निवेश की दुनिया में ये वाक्य अक्सर किसी ख़तरनाक भ्रम की पहचान के लिए इस्तेमाल होता है. हम निवेशक तब इसका इस्तेमाल व्यंग्य करने के लिए करते हैं जब हमें बुलबुले या हास्यास्पद सनक नजर आती हैं - ये वो वक़्त होता है जब प्रमोटर इस बात पर जोर देते हैं कि उनकी ख़ास योजना सामान्य आर्थिक कानूनों से परे है. ट्यूलिप बल्ब गिर नहीं सकता, वो टेक्नोलॉजी स्टॉक जिसे मुनाफ़ा दिखाने की ज़रूरत नहीं, वो क्रिप्टोकरेंसी जो सभी करेंसीज की जगह ले लेगी - हर पीढ़ी अपने-अपने तरीक़े से अविश्वास का एक नया रूप गढ़ती है. मुझे याद है, अपने निवेश जीवन की शुरुआत में कैसे लोग हर्षद मेहता की ‘रिप्लेसमेंट कॉस्ट थ्योरी’ पर गंभीरता से विश्वास करते थे. अब पीछे मुड़कर देखें, तो वह कितना हास्यास्पद लगता है.

लेकिन इस सोच में एक असहज विडंबना है. जब हम हर बार “इस बार अलग नहीं है” मानकर किसी भी बदलाव को खारिज कर देते हैं, तो हम दूसरे छोर पर चले जाते हैं - ये मानने लगते हैं कि कभी कुछ बदल ही नहीं सकता. जबकि सच्चाई ये है कि कुछ दौर वास्तव में परिवर्तनकारी होते हैं. हां, कभी-कभी “इस बार सच में सब कुछ अलग होता है.”

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सोचिए, हम किस असाधारण दौर में जी रहे हैं. लगभग 75 वर्षों से दुनिया ने एक अभूतपूर्व स्थिरता का अनुभव किया है. हां, इस दौरान आर्थिक संकट, क्षेत्रीय संघर्ष और मंदी जैसी घटनाएं आईं, लेकिन बुनियादी ढांचा कायम रहा. वैश्विक व्यापार बढ़ता गया, मुद्रा प्रणालियां सुचारू रूप से चलती रहीं, संस्थान टिके रहे और नियम-कायदों में ज़्यादा बदलाव नहीं आया. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जन्मे लोगों के लिए यह स्थिरता कोई असाधारण बात नहीं है - यही तो उनकी नज़र में दुनिया का सामान्य ढंग है.

लेकिन मानव इतिहास के संदर्भ में 75 वर्ष कोई बड़ी अवधि नहीं. थोड़ा पीछे हटकर देखें तो तस्वीर अलग दिखती है. बड़ी बाधाएं - विश्व युद्ध, महामंदी, मुद्रा प्रणालियों का पतन और राजनीतिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण - हमारी हाल की स्थिरता की तुलना में कहीं ज़्यादा बार आईं. स्वर्णिम दौर समाप्त हो गया, साम्राज्य टूट गए, आर्थिक प्रणालियां पूरी तरह बदल गईं. जो हमने 1950 के बाद अनुभव किया है, वो शायद एक अपवाद है, नियम नहीं.

ख़ासकर आज के हालात में, इस एहसास से हमें असहज हो जाना चाहिए. चारों ओर देखें - प्रमुख वैश्विक शक्तियों के बीच व्यापारिक टकराव लगातार बढ़ते दिख रहे हैं. तकनीकी क्रांतियां सचमुच अर्थव्यवस्थाओं की कार्यप्रणाली को पुनर्गठित कर रही हैं. दशकों की मौद्रिक विस्तार की नीति ने धन, एसेट्स और मूल्य के पारंपरिक संबंधों को बिगाड़ दिया है. भू-राजनीतिक तनाव अब वैसा “नियंत्रित प्रतिद्वंद्विता” जैसा नहीं लग रहा, जैसा पिछले दशकों में था.

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बॉब डिलन ने ऐसे ही दौर का सार बयान किया था - “The order is rapidly fadin’, and the first one now will later be last, for the times they are a-changin.” यानी व्यवस्था तेज़ी से बदल रही है और जो आज आगे है, वो कल पीछे भी हो सकता है. पिछले दशकों के पैटर्न के आदी निवेशकों के लिए ये संभावना - कि स्थापित व्यवस्था मूल रूप से बदल सकती है - गंभीरता से विचार करने लायक है, न कि उसे नज़रअंदाज़ करना चाहिए.

इनमें से कोई एक चुनौती मौजूदा ढांचे के भीतर संभाली जा सकती है, लेकिन जब ये सभी एक साथ सामने आती हैं, तो वे शायद कुछ गहरे बदलाव - उस लंबी स्थिरता के अंत का- का संकेत देती हैं, जिसे हमने अब तक सामान्य मान लिया था. ये किसी विनाश की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि इस यथार्थ की पहचान है कि निवेश से जुड़े हमारे पुराने पैटर्न अब उतने भरोसेमंद नहीं रह सकते.

तो निवेशकों के लिए इसका व्यावहारिक अर्थ क्या है? घबराहट नहीं, बल्कि संयम. दुनिया पहले भी कई बड़े बदलावों से गुज़री है और आगे भी गुज़रेगी. लेकिन ये स्थिति हमें एक ऐसे गुण की याद दिलाती है, जिसे अपनाने में हम अक्सर हिचकिचाते हैं, वो है- सतर्कता. ये वो सतर्कता नहीं जो डर पैदा करे और पूंजी को गद्दे के नीचे छिपा दे, बल्कि वो विवेकपूर्ण सावधानी जो वास्तविक अनिश्चितता को स्वीकार करे.

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ये सतर्कता शायद इस बात की मांग करे कि आप सामान्य से थोड़ी ज़्यादा तरलता रखें. सबसे अहम बात ये है कि अपनी मान्यताओं पर पुनर्विचार करें. वो निवेश सिद्धांत अब शायद समायोजन मांग रहे हों, जो दशकों की स्थिरता और घटती ब्याज दरों के दौर में शानदार ढंग से काम करते रहे. जो वैश्वीकरण कभी अपरिवर्तनीय लगता था, वो अब उलटा दिखाई देने लगा है. जो मौद्रिक नीतियां स्थायी लगती थीं, वे पहले ही बदल रही हैं. और वह भू-राजनीतिक व्यवस्था, जो स्थिर प्रतीत होती थी, अब फिर अस्थिर नज़र आ रही है.

इसका मतलब ये नहीं कि ठोस निवेश सिद्धांतों को छोड़ दिया जाए - बल्कि इसके विपरीत, अब उनकी अहमियत और बढ़ जाती है. जब परिस्थितियां वास्तव में अनिश्चित हों, तब बुनियादी सिद्धांतों पर लौटना पहले से ज़्यादा ज़रूरी होता है. ध्यान दीजिए कि आप क्या निवेश कर रहे हैं, उन बिज़नसेज को प्राथमिकता दीजिए जिनके पास वास्तविक प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त है, सिर्फ़ फ़ाइनेंशियल इंजीनियरिंग नहीं. विविधता को अर्थपूर्ण बनाइए, सिर्फ़ औपचारिक नहीं. लागत कम रखिए. तिमाहियों नहीं, वर्षों में सोचिए.

सबसे बड़ा जोखिम अत्यधिक सावधानी में नहीं है, बल्कि उस अंधे आशावाद में है जो ये मान बैठता है कि स्थिरता हमेशा बनी रहेगी. जो लोग “इस बार अलग है” वाक्य का मज़ाक उड़ाते हैं, वे ज़्यादातर मामलों ख़ासकर बुलबुलों और फैशन जैसे दौर में सही होते हैं . लेकिन कभी-कभी, नींव सच में हिल जाती है. ये समझना कि हम ऐसे ही किसी दौर से गुज़र रहे हो सकते हैं, निराशावाद नहीं है - बल्कि यथार्थवाद है.

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