फंड वायर

आपके लॉन्ग-टर्म पोर्टफ़ोलियो के लिए दो बेहतरीन म्यूचुअल फ़ंड

जानिए इन दो फ़ंड्स की ख़ूबियों के बारे में

जानिए इन दो फ़ंड्स की ख़ूबियों के बारे में Aditya Roy/AI-Generated Image

सारांशः लंबे समय तक फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स को लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर्स के लिए सबसे बेहतर विकल्प माना जाता था. लेकिन वैल्यू रिसर्च की सोच अब बदल रही है. हाल ही में आए एक पॉडकास्ट में हमारे CEO धीरेंद्र कुमार ने साफ़ कहा, “कुछ साल पहले मैं कहता था कि फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स सबसे अच्छे लॉन्ग-टर्म विकल्प हैं, लेकिन अब नहीं.” तो अब वो किन फ़ंड्स के नाम सुझा रहे हैं? आइए जानते हैं.

कई साल तक फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स लंबे समय के निवेशकों की पहली पसंद रहे हैं और इसकी वजह भी है.

ये फ़ंड्स डायवर्सिफ़ाइड होते हैं, मार्केट-कैप से मुक्त होते हैं और फ़ंड मैनेजरों को पूरा लचीलापन देते हैं कि वो पैसा लार्ज, मिड या स्मॉल-कैप कंपनियों में जहां चाहें वहां लगा सकें.

इस लचीलेपन का फ़ायदा भी मिला है. सितंबर 2025 तक फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स में ₹5 लाख करोड़ से ज़्यादा निवेश है, जो किसी भी इक्विटी कैटेगरी से ज़्यादा है. देश के दो सबसे बड़े इक्विटी फ़ंड्स - पराग पारिख फ़्लेक्सी कैप और HDFC फ़्लेक्सी कैप - इसी कैटेगरी के हैं जिनका कुल कॉर्पस क्रमशः ₹1.19 लाख करोड़ और ₹85,500 करोड़ है.

 लेकिन हाल में, इस पर फिर से विचार किया गया.

चार महीने पहले जारी एक पॉडकास्ट में वैल्यू रिसर्च के CEO धीरेंद्र कुमार ने कहा, “कुछ साल पहले मैं कहता था कि फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स लॉन्ग-टर्म के लिए सबसे अच्छा विकल्प हैं, लेकिन अब नहीं. इस समय सबसे अच्छा विकल्प मल्टी-कैप फ़ंड्स ही लगता है.”

क्यों हुआ ये बदलाव?

जब लचीलापन एक बाधा बन जाती है

फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स आज़ादी के लिए डिज़ाइन किए गए थे लेकिन अब कुछ इतने बड़े हो गए हैं कि उनका लचीलापन खुद सीमित हो गया है.

अपनी भारी भरकम एसेट्स के कारण, इन फ़ंड्स को छोटी कंपनियों में सार्थक निवेश करना मुश्किल लगता है. यानि, बड़े फ़ंड हज़ारों करोड़ का एसेट मैनेज करते हैं, इसीलिए किसी स्मॉल-कैप कंपनी में में थोड़ी सी भी हिस्सेदारी ख़रीदने का मतलब उस कंपनी के कुल शेयरों का बहुत बड़ा हिस्सा ख़रीदना हो सकता है, जो जोखिम भरा और बाद में बेचने में मुश्किल होता है.

इसलिए, भले ही कोई स्मॉल-कैप स्टॉक आशाजनक लगे, बड़े फ़ंड्स के लिए स्टॉक की कीमत या लिक्विडिटी को प्रभावित किए बिना कोई सार्थक निवेश करना मुश्किल होता है.

इस वजह से बड़े फ़ंड्स आमतौर पर बड़ी, लिक्विड कंपनियों में ही पैसा लगाते हैं. जहां वो आसानी से बड़ी रक़म निवेश कर सकते हैं.

नतीजतन, फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स में निवेशकों का 60 से 70 प्रतिशत पैसा अब लार्ज-कैप स्टॉक में लगा है, जिसे मिड और स्मॉल-कैप के लिए केवल एक छोटा सा हिस्सा ही बचता है.

साफ़ शब्दों में, ज़्यादातर फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स अब बड़े-कैप फ़ंड्स जैसे दिखते हैं.

मल्टी-कैप फ़ंड्स का उभार

दूसरी ओर मल्टी-कैप फ़ंड्स के लिए नियम साफ़ हैं. इन्हें लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप कंपनियों में कम से कम 25-25 प्रतिशत निवेश करना ही होता है.

इस मैन्डेट का मतलब है कि मल्टी-कैप फ़ंड लार्ज-कैप में ज़्यादा निवेश नहीं कर सकते. ऐसा इसलिए है क्योंकि भले ही फंड मैनेजर बहुत ज़्यादा नर्वस हो, निवेशक का कम से कम 50 प्रतिशत पैसा मिड और स्मॉल-कैप में निवेश किया जाता है.

बेशक, ये संयोजन इन्हें थोड़ा ज़्यादा उतार-चढ़ाव वाला बनाता है. पिछले तीन सालों में मल्टी-कैप फ़ंड्स का औसत उतार-चढ़ाव (स्टैंडर्ड डिविएशन) 13.8 प्रतिशत रहा जबकि फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स का 12.95 प्रतिशत. लेकिन यही उतार-चढ़ाव लंबे समय में बेहतर रिटर्न दे सकता है.

आंकड़े भी यही कहते हैं. पिछले तीन सालों में मल्टी-कैप फ़ंड्स ने 19.7 प्रतिशत वार्षिक रिटर्न दिया जबकि फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स ने 17 प्रतिशत.

दूसरे शब्दों में कहें तो, अगर आपने तीन साल पहले ₹1 लाख मल्टी-कैप फ़ंड में लगाए होते तो आपका निवेश बढ़कर ₹1.71 लाख हो जाता, जबकि फ़्लेक्सी-कैप में ₹1.59 लाख ही होता.

वैल्यू फ़ंड्स का मामला

लेकिन चर्चा यहीं ख़त्म नहीं होती.

उसी पॉडकास्ट में धीरेंद्र कुमार ने एक और लॉन्ग-टर्म विकल्प का नाम सुझाया: “इसके अलावा, अगर कोई और लॉन्ग-टर्म फ़ंड जिसे मैं चुनना चाहूंगा, तो वो वैल्यू फ़ंड ही होगा.”

वैल्यू फ़ंड्स उन स्टॉक्स को चुनते हैं जो इस समय अंडरवैल्यूड हैं लेकिन मज़बूत बुनियाद रखते हैं. जबकि ग्रोथ स्टॉक्स महंगे वैल्यूएशन (हाई P/E और P/B) पर चलते हैं, वैल्यू फ़ंड्स उन कंपनियों पर दांव लगाते हैं जिनकी असल क़ीमत अभी पूरी तरह झलक नहीं रही.

और इनके विपरीत रुख़ ने इन्हें चुपचाप बेहतर प्रदर्शन करने में मदद की है.

  • तीन साल का औसत रिटर्न 20.5 प्रतिशत रहा है जो फ़्लेक्सी-कैप के 17 प्रतिशत और मल्टी-कैप के 19.7 प्रतिशत से ज़्यादा है.
  • पांच साल का औसत रिटर्न 23.5 प्रतिशत रहा है जबकि फ़्लेक्सी-कैप का 20.1 प्रतिशत. हालांकि मल्टी-कैप कैटेगरी नवंबर 2020 में शुरू हुई थी इसलिए उसका पांच साल का पूरा रिकॉर्ड अभी नहीं है.

तो, आप सही मल्टी-कैप और वैल्यू फ़ंड का चुनाव कैसे करें?

वैल्यू रिसर्च रेटिंग्स के अनुसार, मौजूदा बाज़ार में 25 एक्टिव वैल्यू और कॉन्ट्रा फ़ंड्स हैं जिनमें 2 फ़ाइव-स्टार और 6 फ़ोर-स्टार फ़ंड्स शामिल हैं. वहीं मल्टी-कैप कैटेगरी में 27 एक्टिव फ़ंड्स हैं जिनमें 1 फ़ाइव-स्टार और 4 फ़ोर-स्टार प्रदर्शन करने वाले फ़ंड्स  शामिल हैं.

हालांकि हमारी रेटिंग एक बेहतरीन शुरुआत है, लेकिन चुनाव करते समय सिर्फ़ स्टार्स पर निर्भर न रहें. उन फ़ंड्स को प्राथमिकता दें जिन्होंने लगातार अपने बेंचमार्क को तीन से पांच साल में मात दी हो. रोलिंग रिटर्न देखें क्योंकि वही असली स्थिरता दिखाते हैं, न कि सिर्फ़ एक बार का भाग्यशाली प्रदर्शन.

अगर खुद रिसर्च करने का समय नहीं है तो हम आपकी मदद कर सकते हैं.

वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र एक व्यक्तिगत गाइड है जो आपके लक्ष्यों, समय और रिस्क के मुताबिक़ सही म्यूचुअल फ़ंड पोर्टफ़ोलियो तैयार करता है. यह सिर्फ़ अच्छे फ़ंड्स की लिस्ट नहीं देता बल्कि वो फ़ंड्स चुनने में मदद करता है जो आपके फ़ाइनेंशियल गोल्स से मेल खाते हैं. दशकों के डेटा और स्वतंत्र एनालेसिस पर आधारित ये प्लेटफ़ॉर्म आपकी वेल्थ को स्थिर और समझदारी से बढ़ाने में मदद करता है.

फ़ंड एडवाइज़र पर आज ही ग़ौर करें!

ये भी पढ़ें: दूसरा फ़ंड जो हर लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर के पास होना ही चाहिए!

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