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रोज़ नहीं, साल में एक बार देखें

अपने पोर्टफ़ोलियो को रोज़ लाल-हरे रंग में देखने के बजाय, साल में सिर्फ़ एक बार ध्यान से देखना काफ़ी है

अपने पोर्टफ़ोलियो को रोज़ लाल-हरे रंग में देखने के बजाय, साल में सिर्फ़ एक बार ध्यान से देखना काफ़ी हैUjjal Das/AI-Generated Image

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सारांशः एक ऐसा टूल बनाना जिसमें यह दिखे कि आप हर दिन कितने अमीर या गरीब हुए, और फिर अपना आधा समय लोगों को यह बताने में लगाना कि वे उस पर ध्यान न दें-यह एक छोटी सी विडंबना है. असल में जो चीज़ें आपके नतीजों को बेहतर बनाती हैं, वे कम हैं, उबाऊ हैं और साल में एक बार ही की जाती हैं. वे इस प्रकार हैं.

मेरे काम में एक छोटी सी विडंबना है, जिसके साथ मैंने समझौता कर लिया है. Value Research ने Portfolio Manager बनाया है, एक ऐसा टूल जो आपके हर म्यूचुअल फ़ंड और स्टॉक ट्रांज़ैक्शन को लोड करता है और हर शाम आपको दिखाता है कि उस दिन आप कितने अमीर या ग़रीब हुए. जीतने पर हरा नंबर. हारने पर लाल. और इसे बनाने में सालों लगाने के बाद, मैं अपना आधा वक़्त लोगों से यह कहने में बिताता हूं कि इसे लगभग पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दें.

यह आंकड़ा बड़ा है और स्क्रीन के सबसे ऊपर इसलिए नहीं है कि यह काम का है, बल्कि इसलिए कि यह आपकी नज़र खींचता है. आपकी ज़िंदगी की हर स्क्रीन यही करने के लिए बनाई गई है. और जैसे ही आप किसी नंबर को रोज़ बदलते देखना शुरू करते हैं, आपको लगने लगता है कि आपको कुछ करना चाहिए. नुक़सान की शुरुआत यहीं से होती है.

जो फ़ीडबैक बहुत तेज़ी से आता है, वह ज़्यादातर बेकार की हलचल पैदा करता है. जो बाते वाक़ई आपके पैसे के प्रदर्शन को बेहतर बनाते हैं, वे कम, उबाऊ और साल में एक बार होने वाली होती हैं, रोज़ नहीं.

यहां वे चार बातें हैं जो मायने रखती हैं.

पहली बात. आप कितनी रक़म लगा रहे हैं. मेरा मतलब है, हर महीने आप जो रक़म डालते हैं, उसमें से जो निकालते हैं वह घटाकर. ज़्यादातर लोगों के लिए, ख़ासकर सेविंग के पहले एक-दो दशक में, यह एक आंकड़ा किसी भी फ़ंड के चुनाव से कहीं ज़्यादा नतीजे तय करता है. मार्केट क्या करेगा, यह आपके हाथ में नहीं है. आप सिर्फ़ यह तय कर सकते हैं कि आप उसमें कितनी रक़म झोंक रहे हैं. और जिन सालों में आप यह रक़म लगातार बढ़ाते रहते हैं, बाद में आप ख़ुद को उसी के लिए शुक्रिया कहेंगे.

दूसरी बात. क्या आपका एसेट एलोकेशन अपनी जगह से हट गया है. मान लीजिए आपने सालों पहले तय किया था कि आप 75 प्रतिशत इक्विटी और 25 प्रतिशत फ़िक्स्ड इनकम रखेंगे, तो अच्छे मार्केट के लंबे दौर ने यह अनुपात अपने-आप बढ़ा दिया होगा. इक्विटी का हिस्सा बड़ा होता जाता है. आपने कुछ नहीं किया, फिर भी अब आप जितना जोख़िम लेने के लिए तैयार थे, उससे ज़्यादा जोख़िम उठा रहे हैं. साल में एक बार की जांच इसे वापस वहीं ले आती है, जहां आप इसे रखना चाहते थे. यह मार्केट टाइमिंग नहीं है. यह उस प्लान की तरफ़ लौटना है, जो आपने पहले सोच-समझकर बनाया था.

तीसरी बात. क्या आप वाक़ई डाइवर्सिफ़ाइड हैं. बहुत से लोग 10 या 15 फ़ंड रखते हैं और मान लेते हैं कि वे डाइवर्सिफ़ाइड हैं. लेकिन ये फ़ंड अक्सर एक जैसे सेक्टर्स पर टिके होते हैं, एक जैसी बड़ी कंपनियों में पैसा लगाते हैं, या पूरी तरह एक ही भौगोलिक क्षेत्र में सिमटे होते हैं. डाइवर्सिफ़िकेशन का मतलब यह नहीं कि आपके पास कितने फ़ंड हैं. इसका मतलब यह है कि उनके अंदर की होल्डिंग्स एक-दूसरे से कितनी अलग हैं. एक ऐसा टूल जो दिखाए कि आपका पैसा किसी एक सेक्टर या मुट्ठी भर नामों में सिमटा हुआ है, इसे देखने का यही एकमात्र तरीक़ा है.

चौथी बात. आपकी होल्डिंग्स पर बन रहा कैपिटल गेन्स टैक्स. थोड़ी सी पहले से सोच-समझ टैक्स के बिल को क़ाबू में रखती है. एक टूल जो इन गेन्स को ट्रैक करे और टैक्स की देनदारी को दिखाए, एक डरावने काम को महज़ 10 मिनट के काम में बदल देता है.

इन सारी बातों को एक जगह जमा करने का मक़सद आपको घूरने के लिए एक और चीज़ देना नहीं, बल्कि इसका उलटा है. अगर आपको ज़रूर देखना ही है, तो हर सुबह ऊपर वाला डरावना नंबर देख लीजिए. लेकिन साल में एक बार जांच की जाने वाली वे उबाऊ बातें ही असल में तय करेंगी कि आपकी रिटायरमेंट लाइफ़ कैसी होगी.

यह भी पढ़ेंः कहां निवेश करें, इस उलझन को छोड़िए

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