फंड वायर

SBI चिल्ड्रन्स इन्वेस्टमेंट प्लान ने कैसे दिया 34% रिटर्न?

आइए इस स्कीम के इतने ऊंचे रिटर्न के पीछे की असल वजह जानते हैं

आइए इस स्कीम के इतने ऊंचे रिटर्न के पीछे की असल वजह जानते हैंNitin Yadav/AI-Generated Image

सारांशः SBI चिल्ड्रन्स इन्वेस्टमेंट प्लान ने ऐसे रिटर्न दिए हैं जो एक आम हाइब्रिड फ़ंड जैसे बिल्कुल नहीं लगते. असल हैरानी की बात ये है कि ये रिटर्न कैसे बने. इसके साहसिक स्टॉक विकल्प, अलग सेक्टर एलोकेशन और इक्विटी जैसे व्यवहार को ध्यान से देखने पर एक ऐसी कहानी सामने आती है जिसकी उम्मीद निवेशक आम तौर पर बच्चों की स्कीम से नहीं करते.

म्यूचुअल फ़ंड की दुनिया में लेबल अक्सर उम्मीदें तय करते हैं. एक हाइब्रिड फ़ंड से स्थिर, अनुमानित और थोड़ा उबाऊ प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है. SBI चिल्ड्रन्स बेनिफ़िट फ़ंड इन्वेस्टमेंट प्लान ने ये तय ढर्रा नहीं अपनाया.

शुरुआत से अब तक इसने लगभग 34 प्रतिशत रिटर्न दिए हैं. ये आंकड़ा किसी एग्रेसिव इक्विटी कैटेगरी जैसा दिखता है और किसी सुरक्षित बच्चों की स्कीम जैसा बिल्कुल नहीं.

ये आंकड़ा भले ही चौंकाने वाला हो, लेकिन इसकी वजह सरल हैं. फ़ंड ने जो चुनाव किए और जिन जोखिमों को अपनाया, वही इसका नतीजा हैं. पोर्टफ़ोलियो को ध्यान से देखने पर ये लेबल हाइब्रिड जैसा कम और इक्विटी जैसा ज़्यादा लगता है.

एक हाइब्रिड फ़ंड जिसने खुद को इक्विटी की तरह चलाया

ज़्यादातर एग्रेसिव हाइब्रिड फ़ंड इक्विटी और डेट में संतुलन रखते हैं. वे आम तौर पर बड़े शेयरों में निवेश करते हैं और बहुत साहसिक थीम पर दांव नहीं लगाते. SBI चिल्ड्रन्स इन्वेस्टमेंट प्लान ने अलग रास्ता चुना. जहां औसत एग्रेसिव हाइब्रिड लगभग 30 प्रतिशत मिड और स्मॉल कैप रखते थे, इस फ़ंड ने इसे 75 प्रतिशत से ज़्यादा तक बढ़ाया. इस बदलाव ने इसे स्थिरता से निकालकर तेज़ी वाले विकास पथ पर रख दिया.

इसके पोर्टफ़ोलियो में शामिल शेयर पूरी बात साफ़ करते हैं. शीला फ़ोम 4.5 प्रतिशत, शक्त‍ि पंप्स (पोर्टफ़ोलियो में 3.8 प्रतिशत वेटेज), राजरत्न ग्लोबल वायर (3.6 प्रतिशत) और ग्लैंड फ़ार्मा (2.3 प्रतिशत) जैसी कंपनियों पर फ़ंड ने भरोसा किया. इन कंपनियों ने फ़ंड के लिए क्रमशः 148 प्रतिशत, 795 प्रतिशत, 373 प्रतिशत और 166 प्रतिशत के XIRR रिटर्न दिए.

औसत एग्रेसिव हाइब्रिड लगभग 73 प्रतिशत इक्विटी में था. इस फ़ंड ने इसे 83 प्रतिशत से ज़्यादा तक बढ़ाया.

सही समय पर सही थीम को पकड़ा

पोर्टफ़ोलियो का सेक्टर मिश्रण भी यही दिखाता है. फ़ंड ने खुद को भारत के उभरते बाज़ार रुझानों से अच्छी तरह जोड़ा. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कंज़्यूमर स्टेपल्स का था जो 16.8 प्रतिशत था. इसके बाद कंज़्यूमर डिस्क्रिशनरी का 10 प्रतिशत और ऊर्जा का 9.1 प्रतिशत हिस्सा रहा. पिछले तीन वर्षों में ये सेक्टर लगभग 18 से 22 प्रतिशत रिटर्न देते रहे थे.

इन सेक्टरों में कुछ शेयरों ने खास योगदान दिया. इनमें शीला फोम (4.5 प्रतिशत), अडानी पावर (3.7 प्रतिशत), सिमेन्स एनर्जी (3.5 प्रतिशत), वी-गार्ड (2.6 प्रतिशत), EID पैरी (2.6 प्रतिशत) और थंगामयिल ज्वेलरी (2.1 प्रतिशत) शामिल थे. इनका XIRR अदानी पावर में 574 प्रतिशत से लेकर थंगामयिल में 39 प्रतिशत तक रहा.

रिटर्न काफ़ी असरदार हैं, लेकिन पोर्टफ़ोलियो का असल स्ट्रक्चर मिड और स्मॉल कैप पर आधारित विस्तार का है. ये किसी शांत हाइब्रिड फ़ंड का पोर्टफ़ोलियो नहीं बल्कि तेज़ी को पकड़ने वाला पोर्टफ़ोलियो है.

जोखिम और रिटर्न का संबंध

अब सवाल उठता है कि क्या फ़ंड ने ज़्यादा जोखिम लेकर ही ज़्यादा रिटर्न बनाया. बड़ा हिस्सा इसी वजह से आया. ये ख़ास तौर से ज़रूरी है क्योंकि बच्चों की स्कीमें आम तौर पर कम जोखिम के इरादे से चुनी जाती हैं.

फ़ंड में पांच साल का लॉक इन है. ये सुविधा फ़ंड मैनेजर को ज़्यादा जोखिम लेने की स्वतंत्रता देती है. निवेशक जल्दी पैसा नहीं निकाल सकते, इसलिए फ़ंड मिड और स्मॉल कैप में बड़े पोज़िशन ले सकता है. लगभग ₹4,700 करोड़ का कॉर्पस इसे और लचीला बनाता है क्योंकि छोटे फ़ंड ऐसे हिस्सों में आसानी से काम कर पाते हैं. बड़े हाइब्रिड फ़ंड कई बार लिक्विडिटी के कारण संघर्ष करते हैं.

इसके अलावा, ये फ़ंड एग्रेसिव हाइब्रिड के आम वैल्यूएशन से भी ज़्यादा जोख़िमभरा है. वे लगभग 30 प्रतिशत मिड और स्मॉल कैप रखते हैं. बच्चों की स्कीमें लगभग 47 प्रतिशत रखती हैं. SBI चिल्ड्रन्स इन्वेस्टमेंट प्लान दोनों से बहुत ऊपर है.

साथ ही, निवेशकों को ये समझना चाहिए कि इसका एलोकेशन न सिर्फ़ एग्रेसिव हाइब्रिड नॉर्म्स से ज़्यादा रिस्की है, जिनमें मिड-स्मॉल कैप में लगभग 30 प्रतिशत होता है, बल्कि बच्चों के सॉल्यूशन फ़ंड्स की ब्रॉडर कैटेगरी से भी ज़्यादा रिस्की है, जिनमें मिड और स्मॉल कैप में औसतन लगभग 47 प्रतिशत होता है. SBI चिल्ड्रन्स इन्वेस्टमेंट प्लान इन दोनों बेंचमार्क से कहीं ऊपर है.

इसका असर उतार-चढ़ाव में दिखता है. फ़ंड की शुरुआत से अब तक इसका स्टैंडर्ड डेविएशन 12.7 प्रतिशत रहा जबकि कैटेगरी का औसत 10.7 प्रतिशत है. इसका मतलब ये है कि फ़ंड तेज़ी से चढ़ता भी है और तेज़ी से गिरता भी है और इक्विटी की तरह व्यवहार करता है.

ये कोई चिंता की बात नहीं है. ये सिर्फ़ फ़ंड की मज़बूत लॉन्ग-टर्म परफ़ॉर्मेंस को सही संदर्भ में रखने के लिए है.

क्या ये असाधारण सफ़र आगे भी जारी रहेगा?

निवेशकों को उम्मीदों को लेकर सावधान रहना चाहिए. फ़ंड ने 2021 से 2024 के बीच मिड और स्मॉल कैप साइकल से काफ़ी फ़ायदा कमाया. इस दौरान निफ़्टी मिडकैप 150 ने 30.3 प्रतिशत और निफ़्टी स्मॉलकैप 250 ने 31.1 प्रतिशत रिटर्न दिए. इस तरह के साइकल बार-बार नहीं आते.

फ़ंड की केंद्रित और ऊंचे भरोसे वाली चयन क्षमता भविष्य में सहायता कर सकती है. लेकिन ये मानना कि वही गति हमेशा बनी रहेगी, थोड़ा ज़्यादा आशावादी होगा.

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