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सारांश: हर SIP निवेशक एक सवाल के साथ जीता है, यह कब काम करेगी? कब वो दिन आएगा जब मुझे हर महीने किश्त की चिंता नहीं करनी पड़ेगी और पैसा ख़ुद बढ़ता रहेगा? जवाब 45 साल के असली डेटा में है. और यह जानकार आप हैरान हो सकते हैं.
पहले पार्ट में हमने विवेक की कहानी जानी. दिल्ली के IT प्रोफ़ेशनल जिन्होंने अप्रैल 2022 में ₹10,000 की मंथली SIP शुरू की. उन्होंने देखा कि उनका XIRR 42.5% से घटकर 3.65% हो गया. लेकिन यह कोई ग़लती नहीं थी. यह बस मामूली गणित थी.
लेकिन विवेक की कहानी ने एक गहरा सवाल खड़ा किया. XIRR आख़िरकार कब ठीक होता है? और क्या ऐसा हमेशा हुआ है, हर निवेशक के लिए, भारतीय इतिहास में हर मार्केट साइकिल में?
इसका जवाब डेटा में है. और यह आपके देखे हुए किसी भी SIP उदाहरण से ज़्यादा जानकारी देने वाला है.
क्रॉसओवर पॉइंट: जब पैसा ख़ुद काम करने लगता है
हर SIP निवेशक के सफ़र में एक ऐसा पल (क्रॉसओवर पॉइंट) आता है जब कुछ बदल जाता है. उस पल तक, आपकी हर महीने की किश्त ही पोर्टफ़ोलियो को आगे बढ़ाती है. उसके बाद, जमा हुआ पैसा ख़ुद बढ़ने लगता है. वो इतना बड़ा हो जाता है कि बाज़ार का उतार-चढ़ाव उसे आसानी से नहीं हिला पाता.
इसे हम वो क्रॉसओवर पॉइंट कहते हैं, जब पहली बार पोर्टफ़ोलियो में कमाई आपके कुल जमा किए पैसे से ज़्यादा हो जाती है.
इस मोड़ से पहले आप ही इंजन हैं. हर महीने पैसा डालना, बाज़ार गिरने पर भी न रुकना, यही पोर्टफ़ोलियो को चलाता है. मोड़ के बाद जमा हुआ पैसा इंजन बन जाता है. आपकी मासिक किश्त तब भी ज़रूरी होती है, लेकिन उस समय वो मुख्य ताक़त नहीं रहती.
12% सालाना रिटर्न पर, जो आंकड़ा ज़्यादातर म्यूचुअल फ़ंड के चार्ट में दिखाया जाता है, यह क्रॉसओवर पॉइंट क़रीब 12 साल में आता है. लेकिन बाज़ार हर साल एक जैसा रिटर्न नहीं देता. कभी बहुत ज़्यादा, कभी बहुत कम, कभी नुक़सान. तो असली सवाल यह है कि अलग-अलग वक़्त पर SIP शुरू करने वालों के लिए यह मोड़ असल में कब आया?
सेंसेक्स 1979 से चल रहा है. इससे हमारे पास उन निवेशकों का क़रीब पांच दशकों का असली डेटा है, जिन्होंने अलग-अलग दौर में SIP शुरू की और भारतीय आर्थिक इतिहास में आए सभी उतार-चढ़ावों को झेला.
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45 साल के डेटा की कहानी, जो नायाब है!
नीचे दी गई टेबल आठ समूहों को दिखाती है. हर समूह के लिए तीन बातें: वो क्रॉसओवर पॉइंट आने में कितना वक़्त लगा, उस वक़्त XIRR क्या था और पांच साल बाद XIRR कहां था.
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शुरुआती साल
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क्रॉसओवर पॉइंट तक के साल | क्रॉसओवर पॉइंट पर XIRR | 5 साल बाद XIRR | बाज़ार की स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| 1980 | 5.4 साल | 25.90% | 18.50% | सामान्य |
| 1985 | 5.5 साल | 25.90% | 25.10% | सामान्य |
| 1990 | 2.1 साल | 83.80% | 14.70% | हर्षद मेहता बबल |
| 1995 | 10.6 साल | 12.50% | 15.10% | गिरावट के दशक की शुरुआत |
| 2000 | 5.7 साल | 24.60% | 20.30% | सामान्य |
| 2005 | 2.8 साल | 55.10% | 9.00% | GFC से पहले का बुल रन |
| 2010 | 11.0 साल | 12.00% | 11.60% | GFC के बाद धीमी रिकवरी |
| 2015 | 9.4 साल | 14.10% | 10.90% | शुरुआती सुस्त साल |
| सोर्स: शुरुआती साल के समूहों के हिसाब से सेंसेक्स में मंथली SIP. जिन समूहों के लिए क्रॉसओवर पॉइंट के बाद पांच साल नहीं बीते, उनके लिए 4 मार्च 2026 तक का डेटा इस्तेमाल हुआ. GFC यानी ग्रेट फ़ाइनेंशियल क्राइसिस. | ||||
इस टेबल में सबसे ज़रूरी बात कोई एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह है कि हर समूह उस क्रॉसओवर पॉइंट पर पहुंचा. हर एक पल. जिन निवेशकों ने तेज़ी, मंदी, जियोपॉलिटिकल उथल-पुथल और एक दशक तक बाज़ार के स्थिर रहने के दौरान शुरुआत की थी, वे सभी वहां पहुंच गए. मंज़िल एक ही थी पर सफ़र अलग था.
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लंबा इंतज़ार: 1995 और 2010
1995 के समूह को क्रॉसओवर पॉइंट तक पहुंचने में 10.6 साल लगे. उन्होंने उस दौर में SIP शुरू की जब सेंसेक्स सालों तक एक जगह खड़ा रहा. कोई तेज़ चढ़ाई नहीं, कोई बुल रन नहीं जो सफ़र तेज़ करता. उन्होंने अपने वक़्त की क़ीमत लंबे इंतज़ार से चुकाई.
2010 के समूह को 11 साल लगे, इस पूरी लिस्ट में सबसे ज़्यादा. उन्होंने 2008 के बड़े क्रैश के बाद शुरू किया, फिर 2010 के शुरुआती सालों में कमज़ोर बाज़ार झेला. 11 साल तक ऐसी SIP पर भरोसा रखना आसान नहीं जो कुछ देती नहीं दिख रही. लेकिन वो भी पहुंचे.
दोनों समूहों को चलते रहने की ताक़त कहां से मिली? वही जो पहले भाग में दिखा था: भारतीय बाज़ार के इतिहास में किसी भी 10 साल की SIP में नुक़सान की संभावना शून्य रही है.
जल्दी पहुंचने का नुक़सान: 1990 और 2005
टेबल में 1990 और 2005 के समूह सबसे दिलचस्प हैं. दोनों बहुत जल्दी उस क्रॉसओवर पॉइंट पर पहुंचे. और दोनों ने इसकी क़ीमत चुकाई.
1990 का समूह 83.8% XIRR के साथ सिर्फ़ 2.1 साल में क्रॉसओवर पॉइंट पर पहुंचा. यह हर्षद मेहता का दौर था, बाज़ार बहुत तेज़ी से ऊपर गया था. 1992 तक रिटर्न कंट्रीब्यूशन से ज़्यादा हो गया था. लगा कि मंज़िल आ गई.
फिर बबल फूटा. 1995 से 2004 के बीच रिटर्न वापस जमा रक़म से नीचे आ गया. जिन्हें लगा था 1992 में पहुंच गए, वो असल में अभी भी इंतज़ार में थे. असली और सटीक क्रॉसओवर पॉइंट 2004 के आसपास आया. एक दशक के भी बाद.
2005 के समूह की कहानी अलग है लेकिन सीख एक जैसी है. वो 2.8 साल में क्रॉसओवर पॉइंट पर पहुंचे, 2008 के क्रैश से पहले के बुल रन पर सवार होकर. फिर क्रैश आया. किश्तें आती रहीं जो सही था, लेकिन बढ़ता हुआ योगदान और घटता रिटर्न मिलकर उस क्रॉसओवर पॉइंट के इंतज़ार को लंबा कर गए.
इस समूह के जिन निवेशकों ने हर साल किश्त 10% बढ़ाई, उन्हें असली क्रॉसओवर पॉइंट तक पहुंचने में 13.6 साल लगे, जबकि एक जैसी किश्त वालों को 2.8 साल. वजह सीधी है: बड़ी किश्तें जमा रक़म को ऊपर उठाती रहीं, जिससे रिटर्न का आगे निकलना मुश्क़िल होता रहा.
दोनों से सबक़ एक ही है. बुलबुले जैसे रिटर्न पर आधारित क्रॉसओवर एक वादा है, कोई तय हिसाब नहीं. जो क्रॉसओवर सच में मायने रखता है वो धीरे-धीरे बनता है, गिरावट में सस्ती यूनिट ख़रीदकर, बिना जल्दबाज़ी किए कमाई जमा होने देकर, और इतना बड़ा पोर्टफ़ोलियो बनाकर कि बाज़ार की कोई भी गिरावट उसे न हिला सके.
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वक़्त के साथ पोर्टफ़ोलियो मज़बूत क्यों होता है
जैसे-जैसे SIP पुरानी होती है, कुछ ऐसा होता है जिसके बारे में ज़्यादातर निवेशक नहीं सोचते.
पोर्टफ़ोलियो अलग-अलग वक़्त पर और अलग-अलग क़ीमतों पर यूनिट जमा करता जाता है. कुछ यूनिट तब ख़रीदी गईं जब बाज़ार ऊपर था. कुछ तब जब बाज़ार नीचे था. इस तरह पोर्टफ़ोलियो कई अलग-अलग दौर की ख़रीद से बना होता है.
हर नई बाज़ार गिरावट का पोर्टफ़ोलियो पर असर धीरे-धीरे कम होता जाता है. पुरानी यूनिट, जो पहले की गिरावटों से उबर चुकी हैं, पोर्टफ़ोलियो का बड़ा और बड़ा हिस्सा बनती जाती हैं. नई गिरावट हालिया किश्तों को हिला सकती है, लेकिन उस पूरे पोर्टफ़ोलियो को नहीं जो कई साल और कई उतार-चढ़ाव देख चुका है.
पोर्टफ़ोलियो जितना पुराना होता है, उतना मज़बूत होता जाता है. इसलिए नहीं कि बाज़ार दयालु हो जाता है. बल्कि इसलिए कि पोर्टफ़ोलियो इतने उतार-चढ़ाव देख चुका होता है कि कोई एक नई गिरावट उसे नहीं तोड़ सकती.
विवेक अभी इसी प्लान पर बने हुए हैं, जो नज़र नहीं आता लेकिन काम कर रहा है. उन शुरुआती सालों में जब XIRR 9.4% दिखता है और फ़िक्स्ड डिपॉज़िट ज़्यादा समझदार लगती है. एक मज़बूत SIP पोर्टफ़ोलियो की नींव ठीक इन्हीं सालों में रखी जाती है. ऊपर से बढ़त बाद में दिखती है. लेकिन जो पोर्टफ़ोलियो यह नींव कभी नहीं बनाता, क्योंकि निवेशक मुश्क़िल वक़्त में रुक गया, उसे यह मौक़ा कभी नहीं मिलता.
एक फ़ैसला जो बड़ा फ़र्क़ बनाता है
पहले भाग का अंत ₹49 लाख के फ़र्क़ से हुआ था. उस निवेशक के बीच जो 2009 के क्रैश में टिका रहा और उस निवेशक के बीच जो डेट में चला गया और बाद में वापस आया. यह फ़र्क़ किसी बेहतर फ़ंड चुनने या सही वक़्त देखकर निवेश करने का नतीजा नहीं था. यह एक फ़ैसले का नतीजा था: बस टिके रहना.
क्रॉसओवर पॉइंट का डेटा यही बात एक अलग नज़रिए से कहता है. हर वो समूह जो मुश्क़िल सालों से, क्रैश से, उन सालों से गुज़रकर उस क्रॉसओवर पॉइंट पर पहुंचा, जब XIRR में देखने लायक़ कुछ नहीं था. जो बबल में सबसे जल्दी पहुंचे, उन्हें अक्सर उसके असली मतलब के लिए और लंबा इंतज़ार करना पड़ा.
उस क्रॉसओवर पॉइंट का कोई शॉर्टकट नहीं है. बस हर महीने आने का अनुशासन है, गणित पर भरोसा है और पैसे को इतना वक़्त देना है कि वो ख़ुद अपना इंजन बन जाए.
विवेक तीसरे साल में हैं. अभी रास्ता बाक़ी है. लेकिन नींव रखी जा रही है, एक किश्त एक वक़्त पर.
निवेश में टिके रहना वो फ़ैसला है जो आगे चलकर बड़ा फ़ायदा देता है. लेकिन टिके रहना तब आसान होता है जब पता हो कि सही फ़ंड में हैं. वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र आपके पोर्टफ़ोलियो को देखता है, जो बात मायने रखती है उसे सामने लाता है और जो नहीं रखती उसे नज़रअंदाज़ करता है. ताकि, आज आप जो मेहनत कर रहे हैं वो किसी ग़लत फ़ंड पर बर्बाद न हो.
वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र एक्सप्लोर करें!यह भी पढ़ें: पार्ट 1 - SIP रिटर्न का वो सच जो कोई नहीं बताता
ये लेख पहली बार अप्रैल 23, 2026 को पब्लिश हुआ.
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