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सारांश: बाज़ार 18% गिरा और XIRR 39 पॉइंट टूट गया. दोस्त का फ़िक्स्ड डिपॉज़िट चमक़ने लगा. SIP बंद करना बेहतर लगा. पर 30 साल का डेटा कहता है कि यही वो पल था जब अगले दशक के लिए रिटर्न बंट रहा था, लेकिन सिर्फ़ उनके लिए जो टिके रहे. जानिए XIRR असल में क्या बताता है और क्यों 10 साल की SIP में नुक़सान की संभावना शून्य है.
अप्रैल 2022. दिल्ली के IT प्रोफ़ेशनल विवेक ने आख़िरकार वो काम किया जो वो सालों से टाल रहे थे. एक फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड में ₹10,000 की मंथली SIP. ऑटो-डेबिट चालू. बस हो गया.
पहले साल के अंत तक उनका XIRR, यानी उनके निवेश पर सालाना रिटर्न, क़रीब 42 प्रतिशत दिखा. उन्होंने स्क्रीनशॉट लिया और व्हाट्सऐप पर शेयर किया. दोस्तों ने पूछा कौन-सा फ़ंड है.
फिर बाज़ार गिरा. BSE 500 TRI अपने शिख़र से क़रीब 18 प्रतिशत नीचे आया. लेकिन विवेक का XIRR 18% नहीं गिरा. यह 39 पॉइंट गिरा, 42.5% से सीधे 3.65% पर. बाज़ार की असली गिरावट से दोगुने से भी ज़्यादा.
उन्होंने कोई ग़लती नहीं की. फ़ंड नहीं डूबा. तो फिर हुआ क्या?
XIRR नए निवेशकों से झूठ भी बोलता है और सच भी
XIRR एक सवाल का जवाब देता है: मैंने जो पैसा जब-जब लगाया, और आज मेरा पोर्टफ़ोलियो जितने का है, उसे देखते हुए मेरा सालाना रिटर्न कितना बनता है?
यह साधारण रिटर्न से अलग है. XIRR हर किश्त की तारीख़ को ध्यान में रखता है. दो साल पहले लगाया गया रुपया और पिछले महीने लगाया गया रुपया एक जैसा नहीं माना जाता. पुराने रुपये को बढ़ने के लिए ज़्यादा वक़्त मिला है.
SIP के शुरुआती सालों में यही एक परेशानी खड़ी करता है जिसके बारे में कोई नहीं बताता.
जब SIP नई होती है, हर महीने की किश्त कुल जमा रक़म का बड़ा हिस्सा होती है. जब बाज़ार चढ़ता है तो हाल की किश्तें, जो ज़्यादा क़ीमत पर ख़रीदी थीं, पोर्टफ़ोलियो पर हावी होती हैं. XIRR इन्हें देखकर बहुत ज़्यादा दिखता है. जब बाज़ार गिरता है तो यही किश्तें घाटे में होती हैं और XIRR को नीचे खींचती हैं. कैलकुलेशन सही है. बस तस्वीर अधूरी है.
जैसे-जैसे पोर्टफ़ोलियो बड़ा होता है, हर नई किश्त का असर कम होता जाता है. XIRR धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है. लेकिन पहले दो-तीन सालों में यह बहुत ऊपर-नीचे हो सकता है. और इस उछल-कूद का यह मतलब बिल्कुल नहीं कि निवेश काम नहीं कर रहा.
विवेक का सफ़र देखिए:
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पड़ाव
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XIRR | स्थिति |
|---|---|---|
| 17 महीने, पीक | 42.50% | बुल रन का पीक |
| 24 महीने, बॉटम | 3.65% | गिरावट का बॉटम |
| 36 महीने, आंशिक रिकवरी | 9.40% | बाज़ार स्थिर हो रहा है |
| सोर्स: BSE 500 TRI में मासिक SIP, मार्च 2023 से फ़रवरी 2026. महीने के अंत की NAV इस्तेमाल की गई. | ||
फ़ंड ने अपना काम किया. बाज़ार ने वही किया जो बाज़ार करते हैं. XIRR की कैलकुलेशन सही थी. बस किसी ने समझाया नहीं.
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वो मोड़ जब पैसा ख़ुद काम करने लगता है
हर SIP का चार्ट दिखाता है कि ₹10,000 महीना, 12 प्रतिशत सालाना रिटर्न, 20 साल में करोड़ों बन जाते हैं. यह सच है. लेकिन यह नहीं बताता कि वो शुरुआती साल कैसे लगते हैं.
हर SIP निवेशक के सफ़र में एक मोड़ आता है जब पोर्टफ़ोलियो में रिटर्न पहली बार आपके कुल जमा किए पैसे से ज़्यादा हो जाता है. इससे पहले आपकी हर महीने की किश्त ही पोर्टफ़ोलियो को आगे बढ़ाती है. इसके बाद जमा हुआ पैसा ख़ुद काम करने लगता है. आपकी किश्त उस इंजन का ईंधन बन जाती है जो पहले से चल रहा होता है.
12 प्रतिशत सालाना रिटर्न पर यह मोड़ आमतौर पर क़रीब 12 साल में आता है. लेकिन बाज़ार एक जैसा रिटर्न नहीं देता. तो असली सवाल यह है कि लोगों को असल में कितना इंतज़ार करना पड़ा?
सेंसेक्स के क़रीब पांच दशकों का डेटा इसका जवाब देता है. जिन्होंने भी SIP शुरू की, चाहे बाज़ार चढ़ रहा हो या गिर रहा हो, सभी उस मोड़ पर पहुंचे. सफ़र अलग था. मंज़िल एक थी.
दो समूह बहुत जल्दी पहुंचे, 1990 में हर्षद मेहता के बुल रन के दौरान और 2005 में. लेकिन जब बबल फूटा तो कमाई वापस जमा रक़म से नीचे आ गई. असली और टिकाऊ मोड़ बाद में आया, जब बाज़ार ठीक हुआ. फूले हुए रिटर्न पर बना मोड़ पक्का नहीं होता.
जो सबसे ज़्यादा इंतज़ार में रहे, जिन्होंने 1995 और 2010 में सपाट बाज़ार में शुरू किया, उन्हें 10 साल से ज़्यादा लगे. लेकिन वो भी पहुंचे.
XIRR क्या नहीं दिखाता
विवेक के 3.65 प्रतिशत XIRR ने जो नहीं दिखाया वो यह है: गिरावट के दौरान हर महीने की किश्त कम क़ीमत पर यूनिट ख़रीद रही थी. वो सस्ती यूनिट अब उनके पोर्टफ़ोलियो में बैठी हैं. जैसे-जैसे बाज़ार उबरेगा, ये यूनिट कम क़ीमत से बढ़ेंगी, यानी शिख़र पर ख़रीदी गई यूनिट से ज़्यादा बढ़ने की गुंजाइश है.
जिस गिरावट ने XIRR बर्बाद किया उसी ने आगे के रिटर्न के लिए बेहतर नींव बनाई. हर यूनिट की औसत लागत अब उससे कम है जब XIRR 42.5% दिख रहा था. पोर्टफ़ोलियो असल में ज़्यादा मज़बूत है, भले ही आंकड़ा बुरा लगे.
यह तसल्ली देने की बात नहीं है. SIP ऐसे ही काम करती है.
30 साल का डेटा क्या कहता है
टिके रहने की सबसे बड़ी दलील कोई थ्योरी नहीं है. यह है:
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रिटर्न का दायरा
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1 साल | 5 साल | 10 साल | 20 साल |
|---|---|---|---|---|
| नुक़सान | 25.40% | 1.10% | 0% | 0% |
| 0 से 10% सालाना | 16.90% | 19.50% | 3.30% | 0% |
| 10 से 20% सालाना | 10.50% | 48.00% | 66.40% | 83.70% |
| 20% से ज़्यादा सालाना | 47.20% | 31.40% | 30.30% | 16.30% |
| सोर्स: एक औसत फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड के रेगुलर प्लान में रोलिंग SIP अवधियां, अक्टूबर 1996 से मार्च 2026. | ||||
एक साल में नुक़सान की संभावना 25.4% है. लेकिन 10 साल तक टिके रहने पर नुक़सान की संभावना बिल्कुल शून्य रही है. मतलब, पिछले तीन दशकों में जिसने भी 10 साल तक फ़्लेक्सी-कैप SIP चलाई, डॉट-कॉम बस्ट हो, 2008 का संकट हो या कोविड क्रैश, किसी ने पैसा नहीं गंवाया. एक भी नहीं.
10 से 20 प्रतिशत सालाना कमाने की संभावना, जो महंगाई से आगे रहकर असली वेल्थ बनाती है, 10 साल में 66.4% और 20 साल में 83.7% है.
बीच में रुकने की क़ीमत
जो निवेशक सबसे बुरे वक़्त में निकल जाता है वो एक साथ दो ग़लतियां करता है: महंगी यूनिट पर नुक़सान पक्का कर लेता है और सस्ती यूनिट ख़रीदना बंद कर देता है जो अगली रिकवरी का काम करती है.
आंकड़े देखिए. जिस निवेशक ने 2009 की सबसे बड़ी गिरावट पर इक्विटी छोड़कर डेट फ़ंड में पैसा लगाया, उसके पास मार्च 2026 तक क़रीब ₹45 लाख थे. जो टिका रहा उसके पास ₹94 लाख. फ़र्क़ ₹49 लाख. दो बिल्कुल समझ में आने वाले डर के पलों की क़ीमत, ठीक सबसे बुरे वक़्त पर उठाए गए.
बाज़ार के सबसे बुरे दिन SIP की ज़िंदगी के सबसे डरावने दिन होते हैं. लेकिन यही वो दिन होते हैं जब अगले दशक का रिटर्न उन लोगों को मिल रहा होता है जो अभी भी वहां हैं.
विवेक आज कहां हैं
तीन साल. XIRR 9.4 प्रतिशत. पहले साल के उस स्क्रीनशॉट के सामने यह फीका लगता है.
लेकिन इतिहास कहता है कि यह धीरे-धीरे 10 से 20 प्रतिशत के बीच आ जाएगा. इसलिए नहीं कि विवेक कुछ ख़ास करते हैं. इसलिए नहीं कि बाज़ार मेहरबान हो जाता है. बल्कि इसलिए कि पोर्टफ़ोलियो का वो हिस्सा जो बाज़ार के हर उतार-चढ़ाव से हिलता है वो धीरे-धीरे छोटा होता जाता है. और जो हिस्सा पूरा एक साइकल देख चुका है वो बड़ा होता जाता है.
वो किसी चीज़ का इंतज़ार नहीं कर रहे. कुछ हो रहा है, अदृश्य तरीक़े से, और बिल्कुल सही वक़्त पर.
निवेश में टिके रहने की सबसे मुश्क़िल बात यह नहीं है कि बाज़ार गिर रहा है. सबसे पेचीदा यह है कि पता नहीं चलता कि सही फ़ंड में हैं या नहीं. वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र आपके फ़ंड्स पर नज़र रखता है और सिर्फ़ तभी बताता है जब सच में कुछ बदलाव की ज़रूरत हो. ताकि आप टिके रहें, सिर्फ़ उम्मीद के साथ नहीं, बल्कि पूरे भरोसे के साथ.
आज ही फ़ंड एडवाइज़र एक्सप्लोर करें!यह भी पढ़ें: सैलरी कम हो तो भी SIP से बन सकती है असली वेल्थ, जानें कैसे?
ये लेख पहली बार अप्रैल 22, 2026 को पब्लिश हुआ.


