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सारांशः टैक्स छूट अक्सर हमारे निवेश के फ़ैसलों को उतना प्रभावित करती है जितना हम सोचते भी नहीं. यह लेख बताता है कि नए टैक्स रिज़ीम में यह आदत कैसे बदली है और टैक्स को निवेश की क्वालिटी से पहले रखना अब भी क्यों नुक़सान पहुंचा सकता है.
हर कुछ महीने में एक ऐसी ख़बर चलती है जिसे हममें से ज़्यादातर लोग जलन और हैरानी के साथ पढ़ते हैं. किसी ने गुरुग्राम के उन टावरों में से किसी एक में फ़्लैट ख़रीदा है, जिन्हें डेवलपर हमेशा अरालियाज़, कैमेलियाज़, मैगनोलियाज़ और अब डेलियाज़ जैसे फूलों के नाम पर रखता है. यह इतनी बड़ी रक़म होती है कि उससे एक पूरा गांव ख़रीदा जा सकता है. सबसे ताज़ा मामला देश के सबसे मशहूर शेयर बाज़ार से जुड़े इनवेस्टर्स में से एक का था, एक ऐसा नाम जिसे आप में से ज़्यादातर लोग पहचान लेंगे, जिन्होंने एक फ़्लैट के लिए तक़रीबन ₹120 करोड़ चुकाए. आम इंसान की पहली प्रतिक्रिया यह मानने की होती है कि इसके पीछे ज़रूर कोई चतुर टैक्स वाली वजह होगी, इस सोच के साथ कि इतना पैसे वाला कोई भी शख़्स टैक्स एडवाइज़र से सलाह लिए बिना कुछ नहीं करता.
शायद कोई टैक्स से जुड़ी वजह हो भी, लेकिन मेरा अपना मानना यह है कि इसका टैक्स से कम और उस सबसे पुरानी वजह से ज़्यादा लेना-देना है, यानी यह जताने की चाह कि इंसान ज़िंदगी में कामयाब हो गया है.
यहां ज़रा सोचिए कि टैक्स क़ानून में क्या मिलता है. अगर आप शेयर बेचकर उसका पैसा घर ख़रीदने में लगाते हैं, तो आपके कैपिटल गेन का कुछ हिस्सा टैक्स से बच सकता है, लेकिन इसमें छूट की अधिकतम सीमा ₹10 करोड़ है, जो 120 करोड़ के फ़्लैट के सामने बस एक छोटी सी रक़म भर है. टैक्स वाले को चकमा नहीं दिया गया है, उस शख़्स ने बस एक बहुत महंगा घर ख़रीदा है, जैसा अमीर लोग हमेशा करते हैं.
मैं यह बात इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मेरे लिखने के ज़्यादातर सालों में, आम बचत करने वालों को जो टैक्स वाली ग़लती सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुंचाती थी, वह इससे उलट थी. हर फ़रवरी में एक जैसा नज़ारा दिखता था, एक बचतकर्ता जिसने पूरे साल इस मसले को नज़रअंदाज़ किया होता, उसे आख़िरी वक़्त पर डेडलाइन याद आती और मार्च के आख़िरी पखवाड़े में वह एक भारी कमीशन वाली एंडोमेंट पॉलिसी या महंगाई से बस थोड़ा ऊपर रिटर्न देने वाली पांच साल की डिपॉज़िट ख़रीद लेता और फिर ख़ुद को यह कहकर तसल्ली देता कि कम से कम उसने कुछ टैक्स तो बचा लिया. मैं हमेशा यही बात कहता रहा कि कोई भी निवेश पहले एक निवेश के तौर पर सही साबित होना चाहिए और टैक्स बचाना सिर्फ़ एक इत्तेफ़ाक़ होना चाहिए.
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हालांकि, यह समस्या अब ख़ुद ही सुलझ गई है. नया टैक्स रिज़ीम, जो अब डिफ़ॉल्ट है और जिसे लगभग चार में से तीन टैक्सपेयर्स चुन रहे हैं, ने इस तरह की डिडक्शन ख़त्म कर दी हैं. जहां 80C के पीछे भागने की ज़रूरत ही नहीं है, वहां मार्च में ख़राब प्रोडक्ट ख़रीदने की भी कोई वजह नहीं बचती. सरकार ने किसी का बर्ताव नहीं बदला, उसने बस चारा हटा दिया, और यह उतना ही कामयाब रहा.
लेकिन इसके पीछे की सोच उस डिडक्शन के साथ ख़त्म नहीं हुई है. टैक्स को निवेश के फ़ैसले पर हावी होने देने की यह आदत बस वेल्थ की सीढ़ी पर एक पायदान ऊपर खिसककर उस एक टैक्स यानी कैपिटल गेन्स टैक्स की तरफ़ हो गई है जो अब भी असर डालता है, जिस पर मिलने वाली छूटें नए रिज़ीम में भी बरकरार हैं. हालांकि, इनसे सबसे ज़्यादा नुक़सान कैमेलिया-डेलिया वाले लोगों को नहीं, बल्कि उनसे कुछ कम अमीर लोगों को होता है. एक ऐसा शख़्स है जिसने इक्विटी में अच्छा पैसा बनाया है, जिसके पास एक लिक्विड और डाइवर्सिफ़ाइड पोर्टफ़ोलियो है, लेकिन उसे यह समझा दिया जाता है कि वह इसे बेचकर एक ऐसे फ़्लैट में लगा दे जिसे आगे बेचना आसान नहीं होगा, क्योंकि बचने वाला टैक्स उसे सड़क पर पड़ा मिला हुआ पैसा जैसा लगता है.
और एक ऐसा शख़्स भी है जो ₹50 लाख को पांच साल के लिए एक सरकारी बॉन्ड में लॉक कर देता है, जिस पर सिर्फ़ 5 प्रतिशत रिटर्न मिलता है और जिसका हर रुपया टैक्स के दायरे में आता है, बस इसलिए कि वह 12.5 प्रतिशत का वो टैक्स न चुकाए जिसे वह एक बार चुकाकर भूल सकता था. दोनों ही मामलों में उसके हाथ ख़राब एसेट लगती है, क्योंकि यहां भी टैक्स बचाने की सोच पूरे फ़ैसले पर हावी हो गई.
सही रास्ता वही है जिसकी मैं हमेशा वकालत करता रहा हूं, टैक्स को उसका हक़ दें, उससे ज़्यादा कुछ नहीं. किसी भी फ़्लैट, बॉन्ड या पॉलिसी के बारे में यह सवाल पूछें कि अगर रातों-रात टैक्स छूट ख़त्म हो जाए, तो भी क्या आप उसे लेना चाहेंगे. अगर जवाब हां है, तो उसे ख़रीदें और मिलने वाली छूट को एक बोनस मानें. अगर जवाब न है, तो कोई भी छूट उस एसेट के बोझ के लायक़ नहीं है. जहां तक डेलियाज़ वाले साहब की बात है, उन्हें शांति से रहने दें. उन्होंने फूल के नाम वाला एक ख़ूबसूरत नज़ारे वाला घर ख़रीदा है, जो एक बहुत पुरानी और बहुत इंसानी बात है, और बस इतना ही.
यह कॉलम पहली बार ET Wealth में प्रकाशित हुआ था.
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