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IRCTC का मोट बरक़रार, फिर भी आधा क्यों हो गया स्टॉक?

रेवेन्यू लगातार बढ़ रहा है, फिर भी हर रुपए पर होने वाली कमाई अब पहले से काफ़ी कम है

रेवेन्यू लगातार बढ़ रहा है, फिर भी हर रुपए पर होने वाली कमाई अब पहले से काफ़ी कम हैAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः IRCTC का रेवेन्यू और मुनाफ़ा दोनों बढ़ते जा रहे हैं, फिर भी इसका स्टॉक अपने पीक से काफ़ी नीचे ट्रेड कर रहा है. हम यहां जानने की कोशिश कर रहे हैं कि असल में क्या बदला है और निवेशकों को हेडलाइन ग्रोथ से आगे बढ़कर किसी बिज़नेस को क्यों परखना चाहिए.

आपने जब भी आख़िरी बार ट्रेन टिकट बुक की होगी, तो किराए के ऊपर एक मामूली कन्वीनियंस फ़ीस भी दी होगी. शायद आपने सीट पर खाना भी मंगाया हो, या छुट्टियों के लिए कोई रेल टूर पैकेज बुक किया हो. बिना ध्यान दिए ही आपने एक ही कंपनी के तीन अलग-अलग बिज़नेस इस्तेमाल कर लिए: IRCTC (इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज़्म कॉर्पोरेशन). और हैरानी की बात यह है कि ये तीनों बिज़नेस पैसे बनाने के मामले में एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं.

चार बिज़नेस, जिन्हें आप पहले से जानते हैं

पीटर लिंच का यह आइडिया अपने सबसे आसान रूप में है: IRCTC को समझने के लिए आपको किसी ब्रोकर के नोट की ज़रूरत नहीं. आप तो बरसों से इसके ग्राहक रहे हैं.

IRCTC चार काम करती है और चारों के लिए कोई असली मुक़ाबला नहीं है:

  • ऑनलाइन ट्रेन टिकट बेचना, जिस पर हर टिकट पर कन्वीनियंस फ़ीस मिलती है
  • ट्रेनों और स्टेशनों पर मिलने वाले खाने के ज़रिए कैटरिंग चलाना
  • 'रेल नीर' यानी पैक्ड पानी बॉटल में भरना
  • रेल टूरिज़्म पैकेज करना, जिसमें छुट्टियों और तीर्थ यात्रा के टूर शामिल हैं

सालों तक बाज़ार ने IRCTC को किसी सुस्त सरकारी रेलवे कंपनी की तरह नहीं देखा. इसे एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म माना गया, जो सरकारी फ़र्म से ज़्यादा फ़िनटेक के क़रीब था. 2021 के अपने पीक पर यह स्टॉक 200 गुना से भी ज़्यादा P/E पर ट्रेड कर रहा था. आज यह लगभग 30 गुना पर ट्रेड कर रहा है, जो हाल के सालों में भारतीय बाज़ार में देखे गए सबसे बड़े वैल्यूएशन रीसेट में से एक है.

बिज़नेस ख़ुद टूटा नहीं है. न कोई क़र्ज़ का संकट, न घाटा, न कोई घोटाला. रेवेन्यू और मुनाफ़ा, दोनों बढ़ते रहे. तो फिर बाज़ार ने इसे इतनी बुरी तरह डाउनग्रेड क्यों किया?

एक रुपया, दूसरे रुपए जैसा क्यों नहीं है

जवाब यह नहीं है कि IRCTC कितना कमाती है, बल्कि यह है कि कमाई किस हिस्से से आ रही है.

ऑनलाइन टिकटिंग में एक दुर्लभ ख़ूबी है: एक और ग्राहक को सर्व करने में लगभग कुछ ख़र्च नहीं होता. वेबसाइट पहले से बनी है, सर्वर पहले से चल रहे हैं. जब कोई और यात्री ऑनलाइन टिकट बुक करता है, तो IRCTC को उस पर लगभग कोई अतिरिक्त ख़र्च नहीं करना पड़ता, इसलिए पूरी कन्वीनियंस फ़ीस लगभग सीधे मुनाफ़े में चली जाती है. टिकटिंग हर रुपए में से 80 पैसे से ज़्यादा अपने पास रखती है. यह रेलवे बिज़नेस नहीं, बल्कि एक सॉफ़्टवेयर बिज़नेस है और यही वजह है कि बाज़ार इसके लिए पहले सॉफ़्टवेयर वाली क़ीमत चुकाता था.

बाक़ी तीनों बिज़नेस इसके ठीक उलट हैं. हर एक्स्ट्रा खाना यानी ज़्यादा फ़ूड, स्टाफ़ और लॉजिस्टिक्स. हर टूर पैकेज पर असली लागत आती है. हर पानी की बॉटल का मतलब है प्लास्टिक, पानी और ट्रांसपोर्ट. ये बिज़नेस बढ़ते तो हैं, लेकिन अपने साथ अपना ख़र्च भी घसीट कर लाते हैं, इसलिए ये हर रुपए में से मुश्किल से 10-15 प्रतिशत ही अपने पास रख पाते हैं. काम के तो हैं, पर कभी उतने असरदार नहीं.

यहां असली पेंच यह है: कुछ साल पहले टिकटिंग अकेले कुल रेवेन्यू का आधे से ज़्यादा हिस्सा लाती थी. आज यह एक-तिहाई से भी कम है और कैटरिंग चुपचाप सबसे बड़ी रेवेन्यू लाइन बन गई है. रेवेन्यू और मुनाफ़े को साथ रखकर देखें तो पूरी कहानी सामने आ जाती है.

रेवेन्यू और मुनाफ़ा कहां से आता है

ऑनलाइन टिकटिंग का IRCTC के मुनाफ़े में अब भी सबसे बड़ा हिस्सा है

बिज़नेस रेवेन्यू में हिस्सा (%) मुनाफ़े में हिस्सा (%)
कैटरिंग 46 13
इंटरनेट टिकटिंग 29 68
टूरिज़्म 17 7
रेल नीर 8 3
डेटा फ़ाइनेंशियल ईयर 26 तक का है

टिकटिंग वाली लाइन को दोबारा पढ़िए: रेवेन्यू में एक-तिहाई से भी कम हिस्सा होने के बावजूद यह लगभग दो-तिहाई मुनाफ़ा देती है. ग्रोथ अब उन बिज़नेस की तरफ़ शिफ़्ट हो गई है, जो कभी टिकटिंग जितना नहीं कमा सकते.

मोट बरक़रार रहा, मिक्स बदल गया

IRCTC ने अपना एकाधिकार नहीं खोया है; आज भी इसके पास लगभग 90 प्रतिशत रिज़र्व्ड रेलवे बुकिंग हैं. जो बदला है, वह है इसका मिक्स. ऑफ़लाइन से ऑनलाइन की जो शिफ़्ट कभी टिकटिंग को आगे बढ़ा रही थी, वह अब लगभग ख़त्म हो चुकी है; अब जीतने के लिए बहुत कम पहली बार ऑनलाइन बुक करने वाले ग्राहक बचे हैं. इसलिए हाई-मार्जिन इंजन धीमा पड़ रहा है, जबकि ग्रोथ कम-मार्जिन वाले बिज़नेस की तरफ़ खिसक रही है. पिछला साल यह फ़र्क़ साफ़ दिखाता है: कैटरिंग क़रीब 13 प्रतिशत और टूरिज़्म क़रीब 20 प्रतिशत बढ़ा, जबकि टिकटिंग, जो मुनाफ़े की सुई हिलाती है, 8 प्रतिशत से कम बढ़ी.

फ़ाइनेंशियल ईयर 21 से नापे गए ग्रोथ नंबरों से सावधान रहें: वह साल महामारी की वजह से बुरी तरह प्रभावित था, ट्रेनें मुश्किल से चल रही थीं, इसलिए उस बेस से ग्रोथ बढ़ा-चढ़ा दिखती है (रेवेन्यू लगभग 50 प्रतिशत सालाना बढ़ता दिखता है). एक ज़्यादा साफ़-सुथरे मल्टी-ईयर आंकड़े पर, चारों सेगमेंट मिलाकर क़रीब 29 प्रतिशत सालाना बढ़े; यह अब भी मज़बूत है, बस उतना धमाकेदार नहीं जितना हेडलाइन बताती है.

हर सेगमेंट का रेवेन्यू समय के साथ कैसे बढ़ा

मुनाफ़े में ज़्यादा हिस्सा होने के बावजूद, रेवेन्यू में ऑनलाइन टिकटिंग का योगदान समय के साथ घटा है

सेगमेंट FY22 FY23 FY24 FY25 FY26 FY22-26 CAGR (%) FY23-26 CAGR (%)
कैटरिंग 499 1,480 1,947 2,125 2,399 48 18
इंटरनेट टिकटिंग 1,020 1,200 1,295 1,426 1,536 11 9
टूरिज़्म 187 566 691 745 890 48 16
रेल नीर 176 315 341 379 391 22 8

मैनेजमेंट का अपना गाइडेंस ही सबसे साफ़ इशारा है: अब यह लगभग 30 प्रतिशत के EBITDA मार्जिन को टारगेट कर रहा है, जो उस समय से कम है जब टिकटिंग मिक्स पर हावी थी. कोई भी कंपनी अपनी मार्जिन की उम्मीद तब तक नीचे नहीं करती, जब तक उसे यक़ीन न हो कि मिक्स आगे भी उसके ख़िलाफ़ काम करता रहेगा. रेवेन्यू डबल डिजिट में बढ़ता रह सकता है, जबकि मुनाफ़े की ग्रोथ चुपचाप सिंगल डिजिट में फिसल सकती है.

यह भी पढ़ेंः बैलेंस शीट तो बढ़ी, क्या बिज़नेस भी बढ़ा है?

सबक़

IRCTC यहां जो सिखाती है, वह सिर्फ़ एक रेलवे स्टॉक से कहीं आगे तक जाती है.

जब आपके पास किसी ऐसी कंपनी का स्टॉक हो जो एक से ज़्यादा बिज़नेस चलाती है, तो सिर्फ़ इस आसान सवाल पर मत रुकिए, "क्या मोट अब भी बरक़रार है?" IRCTC का मोट पूरी तरह बरक़रार है, फिर भी स्टॉक आधे से ज़्यादा गिर गया. असल में, मोट कभी मुद्दा था ही नहीं.

इसके बजाय दो तीखे सवाल पूछिए:

  • बिज़नेस का कौन-सा हिस्सा सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है?
  • क्या वह हिस्सा बिना ख़र्च के स्केल करता है, या अपने साथ अपनी लागत भी लाता है?

सबसे अच्छे बिज़नेस वही होते हैं जहां ग्रोथ लगभग मुफ़्त में मिलती है, जहां एक और ग्राहक को सेवा देने में लगभग कुछ ख़र्च नहीं होता. यही वह चीज़ है जिसके लिए बाज़ार प्रीमियम क़ीमत चुकाता है और सही भी करता है. जब ग्रोथ ऐसे सेगमेंट से हटकर किसी ऐसे सेगमेंट की तरफ़ शिफ़्ट होती है जो हर नए रुपए के लिए असली पैसा ख़र्च करता है, तो कंपनी हर साल बड़ी दिखते हुए भी कम क़ीमती हो सकती है. एकाधिकार वही, गणित अलग.

निष्कर्ष

इससे यह मतलब नहीं निकलता कि IRCTC कोई ख़राब बिज़नेस है. यह एक क़र्ज़-मुक्त, कैश जनरेट के एकाधिकार वाली कंपनी है जिसका कोई मुक़ाबला नज़र नहीं आता, और इसकी अपनी अहमियत है. बस यह अब वह तेज़ प्रॉफ़िट कंपाउंडर नहीं रहा, जिसके लिए बाज़ार पहले ज़्यादा क़ीमत चुकाता था, कम से कम तब तक नहीं जब तक टिकटिंग को अपना दूसरा असली ग्रोथ इंजन नहीं मिल जाता.

तो यह रही आपके लिए इस महीने का एक्सरसाइज़: अपने पास मौजूद किसी एक ऐसी कंपनी को चुनिए जो एक से ज़्यादा बिज़नेस चलाती है. देखिए कौन-सा सेगमेंट सबसे तेज़ बढ़ रहा है, और पूछिए कि क्या वह ग्रोथ लगभग मुफ़्त में आ रही है या उसे पैदा करने में असली ख़र्च लग रहा है. अक्सर यह जवाब मोट के साइज़ से भी ज़्यादा मायने रखता है.

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यह भी पढ़ेंः इन कंपनियों ने नकदी बढ़ाई, लेकिन असली बदलाव कुछ और था

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