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स्टॉक चुनने का सही तरीक़ा क्या है?

₹19,000 करोड़ का AUM संभालने वाली फ़ंड मैनेजर का 3-बकेट फ़्रेमवर्क आपके काम आ सकता है

₹19,000 करोड़ का AUM संभालने वाली फ़ंड मैनेजर का 3-बकेट फ़्रेमवर्क आपके काम आ सकता हैVinayak Pathak/AI-Generated Image

सारांशः शेयर बाज़ार में सही स्टॉक चुनने का कोई जादुई फ़ॉर्मूला नहीं होता, लेकिन HSBC Mutual Fund की फ़ंड मैनेजर चीनू गुप्ता का 3-बकेट फ़्रेमवर्क इस काम को आसान बना सकता है. दिलचस्प बात ये है कि अभी उन्हें फ़ाइनेंशियल सेक्टर में ऐसे ही टर्नअराउंड मौक़े नज़र आ रहे हैं. आख़िर एक प्रोफ़ेशनल फ़ंड मैनेजर अपने पोर्टफ़ोलियो को कैसे बनाती है और आम निवेशक इससे क्या सीख सकते हैं? यही इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है.

शेयर बाज़ार में निवेश करना हो तो सबसे पहले सवाल उठता है कि शेयर कैसे चुने जाएं? एक ऐसा पोर्टफ़ोलियो कैसे बनाया जाए जो हर दौर में मज़बूती के साथ खड़ा रहे? HSBC Mutual Fund में Fund Manager – Equities चीनू गुप्ता (Cheenu Gupta) ने वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन को दिए एक इंटरव्यू में कहा- वक़्त के साथ स्टाइल मैच्योर होता है और एक जगह स्थिर होता है. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ है. मैं पोर्टफ़ोलियो को तीन बकेट में देखती हूं.

₹19,100 करोड़ का AUM संभालने वाली फ़ंड मैनेजर ने यहां अपनी 3-बकेट स्ट्रैटेजी साझा की है और उनका मानना है कि यही तरीक़ा बाज़ार की हर करवट में काम आता है.

पहली बकेट: स्थिरता के लिए (20%)

पोर्टफ़ोलियो का 20 प्रतिशत हिस्सा उन कंपनियों में लगाया जाता है जो मुश्किल वक़्त में भी टिकी रहती हैं. इनका काम बड़ा रिटर्न देना नहीं, बल्कि पोर्टफ़ोलियो को संभाले रखना है. बाज़ार जब गिरे, तो यही हिस्सा आपको घबराहट से बचाता है.

दूसरी बकेट: ग्रोथ के लिए (50%)

पोर्टफ़ोलियो का सबसे बड़ा हिस्सा - 50 प्रतिशत - उन कंपनियों में जाता है जो अपनी इंडस्ट्री या अपने साथियों से तेज़ रफ़्तार से बढ़ रही हों. चीनू गुप्ता ख़ास तौर पर उन कंपनियों को पसंद करती हैं जिनके पास कोई सुरक्षा घेरा यानी मोट (Moat) हो. लेकिन वे यह भी कहती हैं कि मोट हमेशा के लिए नहीं होता. एक ख़ास दौर में यह मोट बनता है, चाहे बिज़नेस मॉडल में बदलाव हो, रेगुलेटरी बदलाव हो या प्रोडक्ट में कोई अपग्रेड. इस दौर में ये कंपनियां तुलनात्मक रूप से तेज़ ग्रोथ का मज़ा लेती हैं. इसका मक़सद ऐसी कंपनियां खोजना होता है, जिनकी कमाई की विज़िबिलिटी अच्छी हो, कमाई टिकाऊ हो और स्केल करने की क्षमता हो.

तीसरी बकेट: टर्नअराउंड के लिए (30%)

बचा हुआ 30 प्रतिशत उन कंपनियों या सेक्टरों के लिए होता है जो किसी वजह से दबाव में हैं, लेकिन पलटने की क्षमता रखते हैं. यह साइकिल की वजह से हो सकता है. हॉस्पिटैलिटी, ट्रैवल, हॉस्पिटल सेगमेंट या कमर्शियल व्हीकल स्पेस जैसी इंडस्ट्री में साइकिल के पलटते ही वैल्यूएशन आकर्षक हो जाती है. कभी-कभी किसी रेगुलेटरी बदलाव से भी सेक्टर टर्नअराउंड में आ जाता है. स्टील सेक्टर पर सेफ़गार्ड ड्यूटी इसका अच्छा उदाहरण है. कुल मिलाकर पोर्टफ़ोलियो का दो-तिहाई हिस्सा ग्रोथ-ओरिएंटेड है और एक-तिहाई वहां लगाया है जहां लॉन्ग-टर्म अल्फ़ा बनाने की संभावना दिखती है.

अभी कहां दिखता है मौक़ा?

चीनू गुप्ता के मुताबिक़, ख़ासकर लेंडिंग स्पेस सहित फ़ाइनेंशियल सेक्टर अभी दिलचस्प है. एसेट क्वालिटी और लोन ग्रोथ दोनों ठीक हैं, फिर भी मैक्रो चिंताओं की वजह से वैल्यूएशन में कमी आई है. यह वही कॉम्बिनेशन है जो तीसरे बकेट के लिए सही बैठता है.

इक्विटी के बारे में उनका नज़रिया मध्यम और लॉन्ग-टर्म के लिए पॉज़िटिव है. निकट भविष्य में कच्चे तेल की ऊंची क़ीमतें थोड़ी अनिश्चितता बनाए रख सकती हैं, लेकिन शुरुआती बिंदु अच्छा है.

गोल्ड और सिल्वर के बारे में उनकी राय है कि ये पोर्टफ़ोलियो का ज़रूरी हिस्सा बन गए हैं, लेकिन डेढ़ साल की बड़ी तेज़ी के बाद अब एकमुश्त बड़ा दांव लगाने की बजाय धीरे-धीरे जोड़ते रहना बेहतर है.

आम निवेशक के लिए सबक़

चीनू गुप्ता का यह फ़्रेमवर्क एक प्रोफ़ेशनल फ़ंड मैनेजर का नज़रिया है, लेकिन इसकी सोच आम निवेशक भी अपना सकते हैं. पोर्टफ़ोलियो में सिर्फ़ एक तरह की कंपनियां न रखें. कुछ टिकाऊ हों, कुछ तेज़ बढ़ने वाली और कुछ ऐसी हों जो अभी दबाव में हैं लेकिन पलट सकती हैं. बाज़ार का हर दौर अलग होता है, लेकिन एक सोचा-समझा स्ट्रक्चर हर दौर में काम आता है.

यह भी पढ़ेंः मल्टीबैगर शेयर कैसे खोजें?

ये लेख पहली बार जून 08, 2026 को पब्लिश हुआ.

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