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क्या मैं हर साल ₹1.25 लाख की LTCG छूट का इस्तेमाल कर सकता हूं?

टैक्स-फ़्री लिमिट हर साल 1 अप्रैल को रिन्यू होती है

टैक्स-फ़्री लिमिट हर साल 1 अप्रैल को रिन्यू होती हैUjjal Das/AI-Generated Image

पाठक का सवाल: साल के किस महीने से ₹1.25 लाख की लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स छूट दोबारा लागू होती है? - राजन पी ए

आपने इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड या शेयरों से कुछ मुनाफ़ा बुक किया है और अब आप सोच रहे हैं कि ₹1.25 लाख की लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स छूट दोबारा कब उपलब्ध होगी. क्या यह आपकी पहली बिक्री के एक साल बाद मिलती है? या यह किसी ख़ास महीने में ही रीसेट होती है?

जवाब बिल्कुल सीधा है. यह छूट हर फ़ाइनेंशियल ईयर की शुरुआत में, यानी 1 अप्रैल को रीसेट होती है. इसका संबंध फ़ाइनेंशियल ईयर से है, जो 1 अप्रैल से 31 मार्च तक चलता है, न कि उस तारीख़ से जब आप अपना निवेश बेचते हैं या जिस दिन आपकी होल्डिंग को एक साल पूरा होता है.

हर फ़ाइनेंशियल ईयर में, लिस्टेड इक्विटी शेयरों, इक्विटी-ओरिएंटेड म्यूचुअल फ़ंड और तय बिज़नेस ट्रस्ट (REITs और InvITs) से मिलने वाला पहला ₹1.25 लाख का फ़ायदा लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स से मुक्त होता है.

दो नियम, जिनमें लोग अक्सर उलझ जाते हैं

यह उलझन इसलिए पैदा होती है क्योंकि निवेशक अक्सर दो अलग-अलग नियमों को आपस में मिला देते हैं.

पहला है होल्डिंग पीरियड. लिस्टेड इक्विटी शेयरों और इक्विटी-ओरिएंटेड म्यूचुअल फ़ंड के लिए, आपका मुनाफ़ा तभी लॉन्ग-टर्म माना जाता है जब आपने उस निवेश को एक साल से ज़्यादा समय तक होल्ड किया हो.

दूसरा है सालाना छूट. हर फ़ाइनेंशियल ईयर में, आपका ₹1.25 लाख का फ़ायदा लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स से मुक्त होता है.

ये दोनों नियम अलग-अलग मक़सद पूरे करते हैं. होल्डिंग पीरियड यह तय करता है कि आपका मुनाफ़ा लॉन्ग-टर्म की श्रेणी में आता है या नहीं. छूट यह तय करती है कि उस लॉन्ग-टर्म मुनाफ़े में से एक फ़ाइनेंशियल ईयर में कितना हिस्सा टैक्स-फ़्री है.

यह छूट काम कैसे करती है

₹1.25 लाख की छूट को लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स के लिए एक सालाना टैक्स-फ़्री लिमिट समझिए. यह लिमिट उस साल के आपके मुनाफ़े पर लागू होती है, वह भी उसी अवधि में हुए घाटे को घटाने के बाद. अगर फ़ाइनेंशियल ईयर के दौरान आपका कुल नेट लॉन्ग-टर्म गेन इस लिमिट के भीतर रहता है, तो आपको कोई LTCG टैक्स नहीं देना पड़ेगा. टैक्स सिर्फ़ ₹1.25 लाख से ऊपर के नेट गेन पर ही देना होता है.

मान लीजिए आप दिसंबर 2026 में इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड बेचते हैं और आपको 1 लाख रुपये का लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन होता है. चूंकि FY 2026-27 के लिए आपका कुल LTCG ₹1.25 लाख की छूट सीमा से कम है, इसलिए पूरा ₹1 लाख टैक्स-फ़्री है.

अब मान लीजिए कि आप 31 मार्च से पहले कोई और इक्विटी नहीं बेचते. जब 1 अप्रैल 2027 को नया फ़ाइनेंशियल ईयर शुरू होता है, तो आपकी छूट अपने आप रीसेट हो जाती है.

अगर आप फिर मई 2027 में और निवेश बेचकर ₹1 लाख का एक और लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन कमाते हैं, तो वह रक़म भी टैक्स-फ़्री होगी, क्योंकि यह FY 2027-28 के लिए मिलने वाली नई ₹1.25 लाख की छूट के दायरे में आती है.

यानी, एक फ़ाइनेंशियल ईयर में छूट का इस्तेमाल करने से अगले साल की छूट न तो कम होती है और न ही आगे बढ़ती (कैरी फ़ॉरवर्ड होती) है. यह हर 1 अप्रैल को नए सिरे से शुरू होती है.

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अगर आपका मुनाफ़ा ₹1.25 लाख से ज़्यादा हो जाए तो?

यह छूट फ़ाइनेंशियल ईयर के लिए आपके नेट इलिजिबल लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स पर लागू होती है, न कि हर अलग-अलग बिक्री पर.

मान लीजिए FY 2026-27 के दौरान आपकी सभी योग्य इक्विटी निवेश से नेट LTCG ₹2 लाख है. इसमें से पहले ₹1.25 लाख टैक्स फ़्री हैं. बाक़ी बचे ₹75,000 पर ही लागू LTCG टैक्स दर से टैक्स लगेगा.

तो, भले ही आपने साल भर में कई बार रिडेम्शन किया हो, यह आपका कुल मिलाकर नेट लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन ही तय करता है कि आपने छूट की सीमा पार की है या नहीं.

बड़ा रिडेम्शन प्लान करते वक़्त

अगर आप कोई बड़ा निवेश भुनाने की सोच रहे हैं, तो आपकी बिक्री का समय आपकी टैक्स देनदारी पर असर डाल सकता है.

मान लीजिए आपको क़रीब ₹2 लाख का मुनाफ़ा होने की उम्मीद है. अगर आपका फ़ाइनेंशियल प्लान इजाज़त देता है, तो निवेश का एक हिस्सा 31 मार्च से पहले और बाक़ी हिस्सा 1 अप्रैल के बाद बेचने से मुनाफ़ा दो फ़ाइनेंशियल ईयर में बंट सकता है. इससे आप दोनों सालों में ₹1.25 लाख की छूट का इस्तेमाल कर पाएंगे और आपकी कुल टैक्स देनदारी घट सकती है.

लेकिन यह तभी काम करता है जब यह आपके गोल के अनुसार हो. टैक्स कभी भी किसी निवेश को ख़रीदने, रखने या बेचने की वजह नहीं होना चाहिए. अगर कोई फ़ंड या स्टॉक अब आपके फ़ाइनेंशियल गोल या एसेट एलोकेशन के हिसाब से ठीक नहीं बैठता, तो सिर्फ़ टैक्स बचाने के लिए उसकी बिक्री टालना अक्सर फ़ायदे से ज़्यादा नुक़सान करता है. टैक्स प्लानिंग तभी सबसे बेहतर काम करती है जब वह आपकी निवेश स्ट्रैटेजी का साथ दे, न कि उसे तय करे.

टैक्स के नियमों को समझ लेना फ़ैसले का बस एक हिस्सा है. असल मुश्किल सवाल यह है कि क्या यह बेचने का सही वक़्त है और इसका आपके बाक़ी पोर्टफ़ोलियो पर क्या असर होगा. फ़ंड एडवाइज़र आपको ये फ़ैसले लेने में मदद करता है.

हर रिडेम्शन को एक बड़े प्लान का हिस्सा बनाइए.

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यह भी पढ़ेंः विरासत में मिले म्यूचुअल फ़ंड पर टैक्स कैसे लगता है?

ये लेख पहली बार जुलाई 23, 2026 को पब्लिश हुआ.

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