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SEBI: ऑनलाइन विवादों का अब 21 दिन जल्दी होगा समाधान, पर असली सवाल कोई नहीं पूछ रहा

हर रेगुलेटरी प्रस्ताव तीन शब्दों में लिपटकर आता है: तेज़, पारदर्शी, निवेशक-हितैषी. SEBI का ODR वाला यह बदलाव भी अलग नहीं. पर असली कहानी इन तीन शब्दों में नहीं, उस दिशा-बदलाव में है जो कोई नहीं देख रहा.

हर रेगुलेटरी प्रस्ताव तीन शब्दों में लिपटकर आता है: तेज़, पारदर्शी, निवेशक-हितैषी. SEBI का ODR वाला यह बदलाव भी अलग नहीं. पर असली कहानी इन तीन शब्दों में नहीं, उस दिशा-बदलाव में है जो कोई नहीं देख रहा.Mukul Ojha

सारांशः SEBI ने शेयर बाज़ार में निवेशकों के झगड़े निपटाने के ऑनलाइन तरीक़े (ODR) में बड़े बदलाव का प्रस्ताव रखा है, जिस पर उसने 13 अगस्त तक लोगों की राय मांगी है. ख़बर आपको बताएगी कि इससे निपटारा 21 दिन जल्दी होगा और काम एक्सचेंज-डिपॉज़िटरी जैसी संस्थाओं के पास जाएगा. यह सब सही है. पर असली बात यह है कि SEBI चुपचाप अपने ही एक फ़ैसले को पलटता दिख रहा है, जो उसने महज़ दो साल पहले लिया था. और यही वो बात है जिस पर रुककर सोचना चाहिए.

जब कोई नियामक अपना ही बनाया रास्ता महज़ दो साल में पलट दे, तो एक बार रुककर पूछना चाहिए, आख़िर वो पहला रास्ता कहां चूक गया. SEBI के ताज़ा ODR (ऑनलाइन डिस्प्यूट रिज़ॉल्यूशन) प्रस्ताव में ठीक यही हो रहा है, पर इस पर कोई बात नहीं कर रहा.

ख़बरें आपको बताएंगी कि यह नया प्रस्ताव क्या-क्या करेगा. शिकायत का निपटारा 21 दिन जल्दी होगा. सुलह और आर्बिट्रेशन, दोनों एक ही ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर आ जाएंगे. और यह पूरा काम अब मार्केट इंफ़्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशन (MII) के हाथ में होगा, यानी स्टॉक एक्सचेंज, डिपॉज़िटरी और क्लियरिंग कॉर्पोरेशन. यह सब सच है, और काम का भी. पर यही सब असली मुद्दे से ध्यान भी हटा देता है.

और असली मुद्दा यह है: कोई व्यवस्था सच में कैसी है, यह उसके शुरू होने से नहीं, बल्कि उसके रास्ता बदलने से पता चलता है. इसलिए सही सवाल यह नहीं कि नया तरीक़ा कितना बेहतर है. सही सवाल यह है कि पुराना तरीक़ा आख़िर क्यों छोड़ना पड़ा.

"नया सुधार" कहकर जो बात छिपाई जा रही है

ज़रा पीछे चलते हैं. ODR की यह व्यवस्था आने से पहले, निवेशकों के विवाद काफ़ी हद तक एक्सचेंज के अंदर ही यानी उन्हीं MII की बनाई शिकायत समितियों और आर्बिट्रेशन पैनल में निपटते थे. फिर ODR लाया गया, और माना जाता है कि इसका एक बड़ा मक़सद यही था कि झगड़ा निपटाने के काम को इन संस्थाओं से एक क़दम दूर कर दिया जाए. इसे स्वतंत्र ODR संस्थाओं के हवाले किया गया, जिन्हें एक साझा ऑनलाइन पोर्टल आपस में जोड़ता था.

अब SEBI यह पूरा काम फिर से MII को ही सौंपना चाहता है. वही प्लेटफ़ॉर्म चलाएंगे, वही झगड़ा सुलझाने वाले लोगों (सुलहकर्ता और आर्बिट्रेटर) को चुनेंगे, नियुक्त करेंगे, और उन पर नज़र भी रखेंगे.

यह कोई छोटी बात नहीं है. यह तो पूरी व्यवस्था का अपनी ही दिशा उलट लेना है. और जब कोई नियामक इतनी जल्दी अपने क़दम वापस खींच ले, तो असली सवाल यह नहीं होता कि "अब यह कितना तेज़ हुआ?" असली सवाल यह होता है कि "बीच का वो रास्ता आख़िर किस बात में नाकाम रहा?" यही वो सवाल है जो कोई नहीं पूछ रहा, और सच तो यह है कि एक निवेशक के लिए यही सबसे ज़रूरी सवाल है.

रफ़्तार वो पैमाना है जिससे सब ख़ुश हो जाते हैं

हेडलाइन में जो नंबर चमक रहा है, यानी "21 दिन की बचत", वो बनाया ही इसलिए गया है कि उस पर तालियां बजें. और बजेंगी भी. रफ़्तार बढ़ाना किसी भी नियामक के लिए सबसे सुरक्षित काम है, क्योंकि इसे नापना आसान है और इसके ख़िलाफ़ कोई कुछ बोल भी नहीं सकता. भला धीमे इंसाफ़ की मांग कौन करेगा?

पर एक निवेशक के लिए जो नंबर सच में मायने रखता है, वो इस पूरे प्रस्ताव में कहीं नहीं है. वो नंबर यह है: जब कोई छोटा निवेशक अपने ब्रोकर या किसी बिचौलिए के ख़िलाफ़ शिकायत लेकर जाता है, तो वो कितनी बार जीतता है और उसका कितना पैसा वापस मिलता है? अगर आख़िर में नतीजा वही निराशा वाला है, तो वहां तेज़ी से पहुंच जाना कोई सुरक्षा नहीं है. वो तो बस उसी बंद दरवाज़े के आगे एक छोटी क़तार भर है.

SEBI का अपना तर्क ही एक बात क़बूल कर लेता है

SEBI इस बदलाव के पीछे तर्क देता है कि MII तो "पहले से ही बिचौलियों और लिस्टेड कंपनियों पर निगरानी रखते हैं," इसलिए वो फ़ैसले लागू करवाने के लिए ज़्यादा सही जगह पर हैं.

पर ज़रा ग़ौर कीजिए, यह तर्क चुपचाप एक बात मान भी रहा है. वो यह कि इस बदलाव की असली ताक़त फ़ैसला लागू करवाने में है, निष्पक्ष होने में नहीं. जो संस्था किसी ब्रोकर पर दबाव डाल सकती है, ज़रूरी नहीं कि उसी ब्रोकर के ख़िलाफ़ झगड़े में वो सबसे निष्पक्ष फ़ैसला भी कर सके. फ़ैसला लागू करवा देना एक बात है, और झगड़े से दूरी रखकर निष्पक्ष रहना दूसरी. यह प्रस्ताव पहली चीज़ पाने के लिए दूसरी से समझौता कर रहा है.

हो सकता है यह समझौता सही ही हो. फ़ैसले अगर लागू ही न हों, तो उनका कोई मतलब नहीं और एक ऐसी बिखरी हुई व्यवस्था जिसमें कोई दम ही न हो, किसी के काम की नहीं. पर यह आख़िर है तो एक समझौता ही, और निवेशकों का हक़ है कि इसे समझौता कहकर ही बताया जाए, न कि एक "शानदार सुधार" बताकर बेचा जाए.

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सबसे छोटी शर्त, जो सबसे बड़ी बात खोल देती है

इस पूरे प्रस्ताव की सबसे बताने वाली बात उसका सबसे छोटा हिस्सा है. अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फ़ंड (AIF) के निवेशकों को छूट दी जा रही है कि वो चाहें तो इस ज़रूरी ODR को छोड़कर, अपने कॉन्ट्रैक्ट में पहले से तय किए तरीक़ों से झगड़ा सुलझा लें.

इस बात को ज़रा ठहरकर पढ़िए. जो बड़े और समझदार निवेशक हैं, जिनके पास अच्छे वकील हैं और जो अपनी शर्तें ख़ुद तय करवा सकते हैं, उन्हें अपना रास्ता ख़ुद चुनने की छूट है. और वो आम छोटा निवेशक, जिसे बचाने के लिए तो यह ODR बना ही था, उसके हिस्से में आता है वही एक बंधा-बंधाया रास्ता.

यह कोई घोटाला नहीं है. बड़े निवेशकों को अपनी शर्तें तय करने की आज़ादी देना ठीक ही है. पर यह चुपचाप बता देता है कि यह बंधा-बंधाया सिस्टम असल में है किसके लिए. जब सबसे ज़्यादा ताक़तवर लोग ही सबसे पहले उस कमरे से निकलने की छूट पा जाएं, तो पूछना बनता है कि आख़िर वो कमरा कितना अच्छा है.

एक बात की तारीफ़ भी बनती है. SEBI ने सुझाया है कि ट्रस्ट के स्ट्रक्चर वाले AIF निवेशकों को जो क़ानूनी सुरक्षा मिलती है, वही अब कंपनी या LLP के ज़रिए आने वाले निवेशकों को भी मिले. यानी फ़ंड का स्ट्रक्चर चाहे जो हो, सुरक्षा सबको एक जैसी. यह वैसी ही अच्छी सफ़ाई है जो नियामकों को और ज़्यादा करनी चाहिए.

असल में देखने लायक़ क्या है

13 अगस्त के बाद जब SEBI लोगों की राय पढ़ेगा, तब भी उसकी भाषा नहीं बदलेगी. वो तब भी तेज़, पारदर्शी और निवेशक-हितैषी ही रहेगी. इसलिए आख़िरी स्ट्रक्चर को इन तीन बातों पर परखिए, जिनका ज़िक्र किसी सरकारी बयान में नहीं मिलेगा:

  • पहली, पैनल कितना आज़ाद है. अगर आर्बिट्रेटर और सुलहकर्ता, दोनों को MII ही चुनेंगे और नियुक्त करेंगे, तो कौन रोकेगा कि यह पूल धीरे-धीरे ऐसे लोगों की तरफ़ न झुक जाए जो इन्हीं संस्थाओं के अपने भागीदारों के साथ सहज हों? यहां प्लेटफ़ॉर्म से ज़्यादा यह मायने रखता है कि लोग चुने कैसे जाते हैं.
  • दूसरी, नतीजे सामने आते हैं या नहीं. अगर SEBI यह साबित करना चाहता है कि यह वाक़ई निवेशक के हक़ में है, तो वो नाम छिपाकर यह आंकड़ा छाप सकता है कि निवेशक कितनी बार जीते और उन्हें कितना पैसा वापस मिला, बदलाव से पहले और बाद में. सिर्फ़ तरीक़े की नहीं, नतीजों की पारदर्शिता ही असली कसौटी है.
  • तीसरी, वो ताक़त जिसका वादा है. पूरा तर्क इसी पर टिका है कि MII फ़ैसले लागू करवा सकते हैं. अगर बिचौलियों के ख़िलाफ़ आए फ़ैसले साफ़ तौर पर और जल्दी लागू नहीं हुए, तो इस बदलाव ने अपनी निष्पक्षता भी गंवा दी और बदले में कुछ पाया भी नहीं.

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आख़िरी बात

इनमें से कोई बात इस प्रस्ताव को बुरा नहीं ठहराती. हो सकता है यह एक ऐसी व्यवस्था को समेटने का समझदारी भरा क़दम हो, जो कुछ ज़्यादा ही बिखर गई थी. पर निवेशक का भला 21 दिन वाली हेडलाइन पर ख़ुश होने से नहीं होगा. उसका भला इस बात को समझने से होगा कि यह असल में एक दांव है, यह दांव कि नज़दीकी से मिलने वाली ताक़त, उस निष्पक्षता से ज़्यादा क़ीमती साबित होगी जो दूरी से मिलती.

यह दांव सही भी बैठ सकता है. पर वो बैठता है या नहीं, बस यही नापने लायक़ बात है. और ठीक यही वो सवाल है, जिसे पूछने से वो 21 दिन वाली हेडलाइन आपको रोकना चाहती है.

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