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सारांशः ऑप्शंस ट्रेडिंग में 10 में से 9 लोग पैसा गंवाते हैं. फिर भी लाखों लोग हर दिन इसमें कूदते हैं. SEBI ने एक नया फ़्रेमवर्क लाया जो ट्रेडर्स को राहत देगा. लेकिन जोख़िम वैसा ही रहेगा. हम बताएंगे क्यों यह फ़्रेमवर्क अच्छा है, क्यों काफ़ी नहीं है, और आम निवेशक को इससे क्या सीखना चाहिए.
एक तरफ़ SEBI है जो बाज़ार को सुरक्षित बनाना चाहता है. दूसरी तरफ़ लाखों निवेशक हैं जो ऑप्शंस में रातोंरात अमीर होने का सपना लेकर आते हैं. और बीच में है एक ऐसा बाज़ार जो एक झटके में सब कुछ ले सकता है.
SEBI ने 25 मई 2026 को एक नया प्रस्ताव रखा. ट्रेडर्स के लिए राहत है. लेकिन क्या यह आम निवेशक के लिए भी सही है?
स्ट्राइक प्राइस क्या होती है और समस्या क्या थी?
पहले यह समझते हैं कि स्ट्राइक प्राइस होती क्या है.
ऑप्शंस कॉन्ट्रैक्ट में स्ट्राइक प्राइस वो तय क़ीमत होती है जिस पर आप किसी शेयर या इंडेक्स को ख़रीदने या बेचने का अधिकार लेते हैं. जैसे आपने तय किया कि निफ़्टी अगर 22,000 पर आए तो बेचेंगे. तो 22,000 आपकी स्ट्राइक प्राइस है.
समस्या तब आती है जब बाज़ार बहुत तेज़ी से ऊपर या नीचे जाता है. मौजूदा स्ट्राइक प्राइस उस नई क़ीमत से बहुत दूर हो जाती हैं. और एक्सचेंज नई स्ट्राइक प्राइस उतनी जल्दी नहीं जोड़ता. इस बीच ट्रेडर्स के पास उनकी ज़रूरत के हिसाब से कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं होता. ट्रेडिंग रुक जाती है. नुक़सान बढ़ता है.
SEBI ने क्या प्रस्ताव रखा है?
SEBI ने तीन बड़े बदलाव सुझाए हैं.
- पहला: जब भी बाज़ार तेज़ी से ऊपर या नीचे जाए, एक्सचेंज को उसी दिशा में फ़ौरन नई स्ट्राइक प्राइस जोड़नी होंगी. यानी बाज़ार जहां है, उसके क़रीब हमेशा कॉन्ट्रैक्ट उपलब्ध रहेंगे.
- दूसरा: एक्सचेंज को हर वक़्त एक तय संख्या में इन-द-मनी और आउट-ऑफ़-द-मनी कॉन्ट्रैक्ट रखने होंगे. इससे ट्रेडर्स को हमेशा विकल्प मिलते रहेंगे.
- तीसरा: जो स्ट्राइक प्राइस बाज़ार से बहुत दूर चली गई हों और जिनमें कोई ट्रेडिंग नहीं हो रही, उन्हें हटाया जाएगा. इससे ऑप्शंस चेन साफ़ रहेगी और उलझन कम होगी.
यह फ़्रेमवर्क इक्विटी, करेंसी और कमोडिटी, तीनों डेरिवेटिव्स बाज़ारों पर लागू होगा. SEBI ने 15 जून 2026 तक जनता की राय मांगी है.
इस प्रस्ताव के फ़ायदे
- बाज़ार में निरंतरता: तेज़ उतार-चढ़ाव में भी ट्रेडिंग नहीं रुकेगी. ज़रूरी कॉन्ट्रैक्ट हमेशा मिलेंगे.
- ख़रीद-बिक्री आसान: ज़्यादा कॉन्ट्रैक्ट उपलब्ध होंगे तो ख़रीदने और बेचने में आसानी होगी.
- ऑप्शंस चेन साफ़: बेकार स्ट्राइक प्राइस हटाने से उलझन कम होगी और ट्रेडर्स को सही कॉन्ट्रैक्ट जल्दी मिलेगा.
- सबके लिए: यह फ़्रेमवर्क सिर्फ़ इक्विटी नहीं, करेंसी और कमोडिटी डेरिवेटिव्स पर भी लागू होगा.
इस प्रस्ताव की सीमाएं
- जोख़िम ख़त्म नहीं होगा: ज़्यादा स्ट्राइक प्राइस मिलने से ऑप्शंस ट्रेडिंग सुरक्षित नहीं हो जाती. बाज़ार की अनिश्चितता वैसी ही रहेगी.
- नए ट्रेडर्स के लिए और जटिल: ज़्यादा स्ट्राइक प्राइस यानी ज़्यादा विकल्प. नए और कम अनुभवी ट्रेडर्स के लिए यह और उलझन भरा हो सकता है.
- नुक़सान की गुंजाइश बनी रहेगी: SEBI के अपने आंकड़े बताते हैं कि ऑप्शंस में 10 में से 9 रिटेल ट्रेडर्स पैसा गंवाते हैं. यह फ़्रेमवर्क उस आंकड़े को नहीं बदलेगा.
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हम ऑप्शंस की सलाह क्यों नहीं देते?
वैल्यू रिसर्च में हमारा नज़रिया बड़ा सीधा सा है. वही निवेश सही है, जो समझ आए, आसान हो, जिसमें जोख़िम उठाने की ताक़त हो और जो सालों में असल वेल्थ बनाए.
ऑप्शन ट्रेडिंग बिल्कुल इसके विपरीत चलती है.
SEBI के आंकड़े इसकी सबसे बड़ी गवाही हैं.
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साल
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नुक़सान उठाने वाले ट्रेडर्स (%) | कुल नुक़सान |
|---|---|---|
| FY22 से FY24 (3 साल) | 93% | ₹1.8 लाख करोड़ से ज़्यादा |
| FY24 | 91.10% | ₹52,400 करोड़ |
| FY25 | 91% | ₹1,05,603 करोड़ |
| सोर्स: SEBI studies 2024, 2025 | ||
FY25 में हर ट्रेडर को औसतन ₹1.1 लाख का नुक़सान हुआ. FY24 से FY25 में यह नुक़सान 41% बढ़ गया. हालात सुधरे नहीं, बिगड़े.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि 43% ट्रेडर्स 30 साल से कम उम्र के हैं. और ज़्यादातर की सालाना आमदनी ₹5 लाख से कम है. जो सबसे कम झेल सकते हैं, वो सबसे ज़्यादा जोख़िम उठा रहे हैं.
और जो 9% फ़ायदे में रहे? उनमें से ज़्यादातर बड़े संस्थान हैं जिनके पास करोड़ों रुपये के कंप्यूटर सिस्टम हैं जो एक सेकंड के हज़ारवें हिस्से में ट्रेड करते हैं. आम निवेशक उनसे मुक़ाबला नहीं कर सकता.
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तो फिर क्या करें? म्यूचुअल फ़ंड SIP क्यों बेहतर है?
ऑप्शंस और SIP की दुनिया में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है.
ऑप्शंस में हर दिन फ़ैसला करना होता है. बाज़ार किस दिशा में जाएगा, कब जाएगा, कितना जाएगा, यह सब सही समझना होता है. एक भी अंदाज़ा ग़लत हुआ तो पैसा गया.
SIP में कुछ नहीं करना होता. हर महीने तय रक़म लगती है. बाज़ार गिरे तो ज़्यादा यूनिट मिलती हैं. बाज़ार चढ़े तो निवेश बढ़ता है. कम्पाउंडिंग धीरे-धीरे काम करती है. और 10-15-20 साल में नतीजा दिखता है.
SIP के तीन बड़े फ़ायदे हैं. पहला, अनुशासन: हर महीने अपने आप पैसा लगता है. दूसरा, कम्पाउंडिंग: समय के साथ पैसा ख़ुद बढ़ता है. तीसरा, जोख़िम कम: लंबे समय में बाज़ार हमेशा ऊपर जाता है, छोटी गिरावट मायने नहीं रखती.
आम निवेशक के लिए सबक़
SEBI का यह फ़्रेमवर्क ट्रेडर्स के लिए अच्छा क़दम है. बाज़ार और बेहतर होगा. लेकिन यह ऑप्शंस को सुरक्षित नहीं बनाता.
हम हमेशा कहते हैं कि डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग की होड़ हर साल आम निवेशकों को और ग़रीब बनाता है. यह नाटक हर साल नए कपड़ों में होता है. कभी कोई नया ट्रेंड आता है, कभी कोई नया टिप्स वाला YouTube चैनल. लेकिन नतीजा वही रहता है. नुक़सान.
FY22 से FY24 के तीन सालों में 93% रिटेल ट्रेडर्स को नुक़सान हुआ. तीन साल में औसतन हर ट्रेडर को ₹2 लाख का नुक़सान. FY25 में 91% ट्रेडर्स नुक़सान में रहे. एक साल में एक ट्रेडर का औसत नुक़सान ₹1.1 लाख. और यह नुक़सान FY24 से FY25 में 41% बढ़ा.
यह खेल बराबर का नहीं है. जो 9% फ़ायदे में रहे वो बड़े संस्थान हैं जिनके पास अरबों रुपये के सिस्टम हैं. ये सिस्टम एक सेकंड के हज़ारवें हिस्से में ट्रेड करते हैं. आम निवेशक अपने फ़ोन पर बैठकर इनसे जीत नहीं सकता.
इसके बजाय ₹5,000 की मासिक SIP अगर 2005 में शुरू होती और 15% सालाना रिटर्न मिलता तो 2025 में यह रक़म ₹67 लाख से ज़्यादा होती. बिना किसी ट्रेडिंग के. बिना किसी स्ट्राइक प्राइस के. बिना रातों की नींद खोए.
अगर ऑप्शंस में नए हैं तो पहले इसे अच्छी तरह समझें. बिना समझे इसमें पैसा लगाना सबसे बड़ी ग़लती है. और अगर मक़सद लंबे समय में दौलत बनाना है तो म्यूचुअल फ़ंड SIP कहीं बेहतर रास्ता है.
वैल्यू रिसर्च की राय
ऑप्शंस की दुनिया जटिल है और जोख़िम बहुत बड़ा. SEBI का यह फ़्रेमवर्क बाज़ार को बेहतर बनाएगा लेकिन ऑप्शंस को सुरक्षित नहीं. दौलत बनाने का असली रास्ता म्यूचुअल फ़ंड SIP है. सादा, समझदार और साबित. सही फ़ंड चुनने के लिए वैल्यू रिसर्च फ़ंड एडवाइज़र आपके गोल और जोख़िम के हिसाब से मदद करता है.
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ये लेख पहली बार मई 27, 2026 को पब्लिश हुआ.
Disclaimer: यह कंटेंट सिर्फ़ जानकारी के लिए है और इसे निवेश सलाह या रेकमेंडेशन नहीं मानना चाहिए.
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