Anand Kumar
सारांशः कामयाब निवेश ट्रेड करने की चाहत को दबाने के बारे में नहीं है, बल्कि उसे एक दायरे में रखने के बारे में है. यहां हम एक आसान तरीक़ा बताते हैं, जो लंबे समय में वेल्थ बनाने को सट्टेबाज़ी वाले दांवों से अलग रखता है और निवेशकों को अपने मन की सुने बिना अनुशासन में रहने में मदद करता है.
पिछले महीने मैंने एक कॉलम लिखा था, 'रोज़ नहीं, साल में एक बार देखें'. मेरा कहना बस इतना था कि एक फ़ंड पोर्टफ़ोलियो, जब आप एक बार सोच-समझकर बना लें, तो सबसे अच्छा यही है कि उसे ज़्यादातर वक़्त बिना छेड़े छोड़ दें. यह बात सिर्फ़ फ़ंड पर ही लागू नहीं होती और एक पाठक ने मुझे जवाब लिखकर यह साबित भी कर दिया. हमारे स्टॉक एडवाइज़र के सब्सक्राइबर पंकज बजाज ने बताया कि वो अपना स्टॉक पोर्टफ़ोलियो ठीक इसी उसूल पर चलाते हैं, और फिर उन्होंने वो छोटी सी व्यवस्था बताई जो उन्होंने इसके इर्द-गिर्द बनाई है. उन्होंने कहा कि वो अपना लॉन्ग-टर्म वाला पोर्टफ़ोलियो किसी पोर्टफ़ोलियो ट्रैकर पर रखते तक नहीं. वो उसे अपने ही कंप्यूटर पर एक स्प्रेडशीट में रखते हैं, नतीजे आने पर हर तिमाही में एक बार उस पर नज़र डालते हैं और बाक़ी समय उसे यूं ही छोड़ देते हैं. यही उनका पूरा गंभीर निवेश है, और वो साल में चार बार इस पर ध्यान देते हैं.
फिर उन्होंने मुझे दूसरे हिस्से के बारे में बताया. वो, अपने ही शब्दों में, एक 'मार्केट कीड़ा' हैं: यानी ऐसा इंसान जिसे हर एक-दो दिन में कुछ न कुछ देखने और उस पर कुछ करने की तलब रहती है, कुछ ख़बरें चबाने को और कोई न कोई पोज़ीशन छेड़ने को. अपने इस पहलू के होने से इनकार करने के बजाय, उन्होंने इसे खेलने के लिए अपना 3% पैसा दे दिया है. उस छोटी सी रक़म से, वो रोज़ और हर हफ़्त ट्रेड करते हैं, कुछ न कुछ करने की चाहत पूरी कर लेते हैं और अपनी पसंद की हर हेडलाइन पर प्रतिक्रिया देते हैं, पर इसमें से कुछ भी उन 97% को नहीं छूता जो असल काम कर रहे हैं. उन्होंने आख़िर में एक बात कही, जो तब से मेरे ज़हन में घूम रही है: यह बात भी काफ़ी आसान है, पर इस पर टिके रहना उतना ही मुश्किल.
वो दोनों ही बातों पर सही हैं. और दिलचस्प यह कि वो ख़ुद अपने दम पर उसी नतीजे पर पहुंच गए, जिस पर मैंने एक दशक से भी पहले लिखा था. शेयरों में निवेश करने वालों के बारे में बरसों में मेरी जो समझ बनी है, वो यह है: वो लगभग सब के सब उम्मीद से भरे लोग होते हैं और उनमें से ज़्यादातर के भीतर एक जुआरी भी छिपा होता है. अगर आपमें इनमें से एक भी ख़ूबी न होती, तो आप अपना पैसा किसी FD (फ़िक्स्ड डिपॉज़िट) में रखते और कभी शेयर बाज़ार में हाथ न डालते. यानी दांव लगाने और कुछ करने की चाहत, उसी मिज़ाज का हिस्सा है जो उन्हें पहली जगह इक्विटी तक लाया. सवाल यह नहीं कि इस चाहत को कैसे मारें, बस यह है कि इसे निकलने कहां दें.
सालों पहले, 2013 में लिखे एक कॉलम में, मैंने इसका जवाब 'फ़न मनी' बताया था: यानी आपकी पूंजी का एक तय, छोटा सा हिस्सा जिसे आप समझदार होने का कोई ढोंग किए बिना निवेश करते हैं. हो सकता है इस दांव के पीछे आपकी कोई कथित वजह हो, या न भी हो, और आप अपने दिल में जानते हैं कि यह ज़्यादातर एक जुआ ही है. जो बात मायने रखती है, वो यह कि यह एक दीवार के पीछे बंद और एक हद में बंधा हो और आप इस बारे में ईमानदार हों कि यह है क्या. मैंने इसकी सलाह तो दी थी, पर साथ में यह भी क़बूल कर लिया था कि मैंने ख़ुद कभी ऐसा नहीं किया. और मुझे तो यही लगता था कि जिस तरह का इंसान फ़न मनी की तरफ़ खिंचता है, वही इंसान उस दीवार को शायद खड़ा भी न रख पाए, और उस 'फ़न' को गंभीर पैसे में यूं रिसने दे कि आख़िर में दोनों का फ़र्क़ ही मिट जाए. बजाज का ईमेल उस पुराने शक़ का जवाब है, एक ऐसे पाठक की तरफ़ से जिसने वो दीवार खड़ी रखी और मुझे बताया कि कैसे.
उनकी व्यवस्था इसलिए काम करती है क्योंकि उन्होंने ट्रेडिंग के इर्द-गिर्द जो सिस्टम बनाया है. हद पक्की और छोटी है. दोनों चीज़ें अलग-अलग जगह हैं, एक उस ट्रैकर पर जिसे वो मुश्किल से खोलते हैं, और एक जिसे वो रोज़ देखते हैं. सबसे अहम बात यह है कि उन्होंने क्या कितनी बार देखना है, यह सही तय किया है. यही वह बात है, जिसमें ज़्यादातर लोग गड़बड़ कर बैठते हैं.
ज़्यादातर निवेशक अपनी गंभीर होल्डिंग को रोज़ देखते हैं, हर छोटे उतार-चढ़ाव पर सहम जाते हैं और अपने सट्टे वाले दांवों के बारे में उम्मीद के सिवा कुछ सोचते ही नहीं. बजाज ठीक इसका उल्टा करते हैं. वो उन 3% को देखते हैं, जहां देखने से कोई ख़ास नुकसान नहीं होता और उन 97% को छोड़ देते हैं, जहां देखने से असली नुक़सान होता है. एक अच्छे निवेश को घंटे-घंटे घूरते रहना, उसे बेच बैठने के लिए ख़ुद को राज़ी कर लेने का सबसे पक्का तरीक़ा है, क्योंकि छोटी अवधि में क़ीमत आपको बेचने की कोई न कोई वजह हमेशा दे ही देती है. और यहीं से बात आती है कि हमारी जैसी सर्विस इस सब में कहां फ़िट बैठती है और मैं इस बारे में साफ़ रहना चाहता हूं.
वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र उन 97% के लिए ही बना है. हम जो देते हैं, वो वही अनुशासन वाला केंद्र है, जिससे बजाज अपनी खुजली को अच्छी तरह दूर रखते हैं. अगर आप गरम टिप, जल्दी वाले मल्टीबैगर, या इस हफ़्ते की ख़बर पर ट्रेड करने के लिए कुछ खोज रहे हैं, तो हम आपको निराश करेंगे और यह हम अपनी ही वेबसाइट पर कहते हैं.
हम ऐसा 'चुनने से पहले छांटने' के ज़रिए करते हैं. हम लिस्टेड कंपनियों की पूरी दुनिया से शुरू करते हैं और उनमें से किसी की तारीफ़ करने से पहले ही ज़्यादातर को बाहर कर देते हैं और पहली छलनी होती है गवर्नेंस और क्वालिटी की: ग़लत तरह के प्रमोटर वाली, या बिना वजह बताए कर्ज़ के ढेर वाली कोई कंपनी, अपनी ग्रोथ की कहानी सुनाए जाने से पहले ही बाहर हो जाती है. जो इस छंटाई से बच जाता है, सिर्फ़ उसी को उसके कारोबार और उसकी क़ीमत के लिए परखा जाता है.
इसमें से, हम तीन रेडीमेड पोर्टफ़ोलियो चलाते हैं (लॉन्ग-टर्म ग्रोथ, एग्रेसिव ग्रोथ और डिविडेंड ग्रोथ) और हर महीने हमारी टीम हर एक की रिव्यू करती है और अगर कुछ बदलने की ज़रूरत है तो आपको इस बारे में वजह के साथ बताती है. इस सबका ख़र्च है ₹9,990 सालाना. हर महीने अपने पोर्टफ़ोलियो की सही रिव्यू के लिए किसी को पैसे देने का मक़सद यही है कि यह आपको ख़ुद उसे देखते रहने की ज़रूरत से आज़ाद कर दे.
जब आपको पता होता है कि एक क़ाबिल तरीक़ा हर महीने फंडामेंटल्स की जांच कर रहा है और जब सच में कुछ बदलेगा तो आपको बता देगा, तो आपको ख़ुद को तसल्ली देने के लिए मंगलवार की दोपहर ट्रैकर खोलने की ज़रूरत नहीं रहती. आप तिमाही में एक बार देख सकते हैं, जैसे बजाज देखते हैं, या साल में एक बार, जैसा मैं पहली जगह कहता आ रहा था.
इसीलिए मुझे वो ईमेल इतना भाया. एक सब्सक्राइबर ने ख़ुद अपने दम पर वो दो बातें समझ ली थीं, जिन्हें निवेश की ज़्यादातर सलाह कभी एक साथ नहीं पकड़ पाती: पहली, कि हमारे भीतर का जुआरी सच में मौजूद है और उसे खुराक चाहिए; और दूसरी, कि उसे खुराक देने का तरीक़ा यही है कि उसे उस पैसे से दूर रखा जाए, जो सबसे ज़्यादा मायने रखता है.
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