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बिड़ला की एंट्री से केबल कंपनियों के शेयर दहल गए हैं?

पिछली बार जब ऐसा हुआ था, तो लीडर को दो साल तक नुक़सान झेलना पड़ा था

पिछली बार जब ऐसा हुआ था, तो लीडर को दो साल तक नुक़सान झेलना पड़ा थाAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांश: आदित्य बिड़ला की केबल्स एंड वायर्स बिज़नेस में एंट्री ने बड़ी और स्थापित कंपनियों को चिंता में डाल दिया है. यह स्टोरी बताती है कि यह सेल-ऑफ़ डाउनग्रेड नहीं बल्कि डी-रेटिंग है और यह देखने लायक है कि क्या पेंट वाली कहानी यहां भी दोहराई जाएगी.

आदित्य बिड़ला ग्रुप ने भारत के वायर्स एंड केबल बिज़नेस में चुपचाप एंट्री नहीं की है. इसने अपने नए ब्रांड 'Ultravolt' के साथ धमाकेदार शुरुआत की है. इसका मक़सद है अगले पांच साल में इंडस्ट्री के दो सबसे बड़े खिलाड़ियों में शामिल होना. सिर्फ़ इस ऐलान ने ही Polycab, Havells, KEI और RR Kabel जैसे स्थापित नामों पर दबाव बना दिया है.

सुनने में यह जितना दिलचस्प लगता है, उतने ही इस बात के संकेत मिलते हैं कि कुछ बड़ा और टिकाऊ बदलाव हो चुका है. इसे समझने के लिए पहले यह देखना ज़रूरी है कि आदित्य बिड़ला ने दो साल पहले एक और सुस्त लेकिन मुनाफ़े वाली इंडस्ट्री में क्या किया था.

एक जानी-पहचानी कहानी

2024 में आदित्य बिड़ला ग्रुप ने 'Birla Opus' के साथ पेंट मार्केट में एंट्री की थी और इसके पास इतना पैसा था कि कोई प्रतिद्वंद्वी उसका मुक़ाबला नहीं कर सकता था.

यहां ध्यान देने वाली बात यह है: Birla Opus को जीतने की ज़रूरत नहीं थी. उसे न तो लीडर को हराना था और न ही सबसे बड़ा शेयर हासिल करना था. सिर्फ़ उसकी मौजूदगी ही इतनी काफ़ी थी कि मौजूदा कंपनियां अपने पेंट की क़ीमत मनमाने तरीक़े से नहीं बढ़ा सकती थीं. 

दशकों से बेताज बादशाह रही Asian Paints को अगले दो साल अपना मार्केट शेयर और मार्जिन गिरते हुए देखने पड़े. कोई एक बड़ी हार नहीं हुई, बल्कि धीरे-धीरे उस प्राइसिंग पावर का नुक़सान हुआ जो उसे हमेशा हासिल रही थी. यही वजह है कि वायर्स एंड केबल्स वाली एंट्री पर नज़र रखना ज़रूरी है.

ख़तरा बराबर नहीं है

वायर्स एंड केबल असल में एक बिज़नेस नहीं है. सुनने में भले ही एक लगता हो. हाउस वायर एक कंज़्यूमर प्रोडक्ट है, जो इलेक्ट्रीशियन और रिटेलर्स के ज़रिए बिकता है. यह ज़्यादातर कॉपर होता है जिस पर बस एक ब्रांड का नाम लगा होता है, इसलिए यह क़ीमत, उपलब्धता और पहचान के आधार पर मुक़ाबला करती है. मार्केट में घुसने के लिए यह सबसे आसान सेगमेंट है, और Ultravolt की शुरुआत ठीक यहीं से हो रही है. हाई-वोल्टेज और स्पेशलाइज़्ड केबल्स की लड़ाई अलग है. यह टेक्नोलॉजी, सर्टिफ़िकेशन, कस्टमर अप्रूवल और लंबे समय से बने भरोसे के दम पर जीती जाती है और इनमें से किसी को भी पैसे के दम पर जल्दी हासिल नहीं किया जा सकता. इस सीढ़ी में ऊपर बैठी कंपनियां साधारण हाउसिंग वायर बेचने वालों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा सुरक्षित हैं.

कंपनी केबल्स एंड वायर्स रेवेन्यू, FY26 (₹ करोड़) कुल रेवेन्यू में हिस्सा (%)
Polycab 25,179 87
KEI Industries 11,221 96
RR Kabel 8,764 90
Havells 8,677 39
Finolex Cables* 5,490* 87
*Finolex के आंकड़े सिर्फ़ इलेक्ट्रिकल केबल्स के हैं, इसकी अलग कम्युनिकेशन-केबल्स यूनिट को शामिल नहीं किया गया है

फिर भी सेल-ऑफ़ इस लॉजिक के हिसाब से नहीं हुआ. लगभग हर मौजूदा कंपनी की वैल्यू घटी. जिन शेयरों की क़ीमत सबसे ज़्यादा थी और जिनसे ग्रोथ की सबसे ज़्यादा उम्मीद थी, उन्हें सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ. इस ग्रुप में सबसे सस्ता ट्रेड कर रहा Finolex इसका अपवाद रहा और इसकी क़ीमत गिरने की बजाय बढ़ी.

मार्केट किसी की अगले साल की कमाई का अनुमान नहीं घटा रहा था. मार्केट उस प्रीमियम को वापस ले रहा था जो उसने उस ग्रोथ के लिए चुकाया था जिसे सब लोग तय मान बैठे थे. यह एक डी-रेटिंग है, डाउनग्रेड नहीं. असल में, डी-रेटिंग से उबरना मुश्किल होता है, क्योंकि यह एक अच्छी तिमाही से नहीं पलटती. यह तभी सुधरती है जब वह वजह फिर से साबित हो जाए जिसके चलते प्रीमियम मिला था, यानी इंडस्ट्री की पुरानी प्राइसिंग पावर. और फ़िलहाल यही चीज़ शक के घेरे में है.

बढ़त कहीं और है

Ultravolt के पास शुरुआत से एक असली बढ़त है. वायर बनाने में सबसे बड़ा ख़र्च कॉपर का होता है और ग्रुप अपनी मेटल्स यूनिट Hindalco के ज़रिए ख़ुद कॉपर बनाता है. जिस बिज़नेस में मेटल ही लागत का सबसे बड़ा हिस्सा हो, वहां अपनी सप्लाई होने का मतलब है ज़्यादा भरोसेमंद सोर्सिंग और कॉपर की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव से कुछ हद तक बचाव.

लेकिन इससे एक क़दम ऊपर जो बढ़त है, वह है डिस्ट्रिब्यूशन. Ultravolt 5,000 से ज़्यादा UltraTech Building Solutions आउटलेट्स के ज़रिए लॉन्च हो रहा है, इसका टारगेट एक लाख से ज़्यादा रिटेलर्स तक पहुंचना है और यह 40,000 से ज़्यादा इलेक्ट्रीशियन को ट्रेनिंग भी दे रहा है, यानी वो लोग जो असल में तय करते हैं कि घर में कौन-सी वायर लगेगी. इसी डिस्ट्रिब्यूशन की ताक़त ने Birla Opus को इतनी तेज़ी से पेंट की दुकानों तक पहुंचाया था और अब इसका रुख़ इलेक्ट्रिकल सेक्शन की तरफ़ है.

मुक़ाबला शुरू होने से पहले ही सप्लाई ज़्यादा

एक और सीधी-सादी चुनौती भी सामने है और लॉन्च का तरीक़ा ख़ुद इसका इशारा दे रहा है. ग्रुप इसे इलाक़े-दर-इलाक़े नहीं फैला रहा. यह पहले दिन से ही पूरे देश में उतर रहा है, इसके पीछे ₹1,800 करोड़ का निवेश है और गुजरात का एक ही प्लांट है जो हर साल क़रीब 1.1 मिलियन किलोमीटर वायर और लाइट-ड्यूटी केबल बना सकता है.

अब इसकी तुलना मार्केट लीडर से करें. Polycab के पास क़रीब 6 मिलियन किलोमीटर की केबल-एंड-वायर कैपेसिटी है, और FY26 में इसने इसका लगभग 79 प्रतिशत इस्तेमाल किया. नई कंपनियों की सप्लाई आने से पहले ही इंडस्ट्री के पास एक्स्ट्रा कैपेसिटी मौजूद है और मौजूदा कंपनियां और ज़्यादा कैपेसिटी जोड़ने पर भारी ख़र्च कर रही हैं. डिमांड स्थिर तो है लेकिन बहुत तेज़ नहीं, ऐसे में अगले दो-तीन साल में यह सेक्टर उस रफ़्तार से कैपेसिटी बढ़ा सकता है जितनी मार्केट खपा नहीं पाएगा, चाहे जीत किसी की भी हो.

क्या बदला है और क्या नहीं

डिमांड की कहानी अब भी पूरी तरह बरक़रार है. ग्रिड में निवेश, कंस्ट्रक्शन और डेटा सेंटर के बूम से आने वाले सालों में यह मार्केट डेढ़ गुना तक बढ़ सकता है. हिस्सेदारी बड़ी होगी, इस पर किसी को कोई संदेह नहीं है.

बदलाव यह है कि अब यह भरोसा कम हो गया है कि कोई एक कंपनी इतने बड़े बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी और आज जैसा मुनाफ़ा आगे भी बनाए रख पाएगी. इस भरोसे को अब सही साबित करना पहले से मुश्किल है. जब बाज़ार को भविष्य की ग्रोथ पर कम भरोसा होता है, तो वह शेयर की क़ीमत नीचे कर देता है. लेकिन सिर्फ़ क़ीमत गिरने का मतलब यह नहीं है कि शेयर सच में सस्ता हो गया है.

इन्वेस्टर्स के लिए ज़रूरी है कि वे यह देखें कि Ultravolt अपने शुरुआती डीलरों को कितना मार्जिन दे रहा है, और यह भी कि जिन कंपनियों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ा है, उनके वायर मार्जिन में वाक़ई कोई बदलाव आता है या नहीं. एक नाटकीय हफ़्ते के शोर से नहीं, बल्कि यही बताएगा कि क्या पेंट वाली कहानी यहां भी दोहराई जा रही है.

यह भी पढ़ेंः आदित्य बिड़ला समूह नए बाज़ारों में क्यों आग़ाज़ कर रहा है?

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