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क्या शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस आपके लॉन्ग-टर्म प्रॉफ़िट पर टैक्स घटा सकता है?

हां. एक शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस को लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन के ख़िलाफ़ सेट-ऑफ़ किया जा सकता है. आपका टैक्स वाला मुनाफ़ा घटता है, और आपका टैक्स बिल भी.

हां. एक शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस को लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन के ख़िलाफ़ सेट-ऑफ़ किया जा सकता है. आपका टैक्स वाला मुनाफ़ा घटता है, और आपका टैक्स बिल भी.Ujjal Das/AI-Generated Image

पाठक का सवाल: क्या म्यूचुअल फ़ंड के लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन को शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस के ख़िलाफ़ सेट-ऑफ़ किया जा सकता है? – संजीव सांगल

आपने एक निवेश पर मुनाफ़ा कमाया और दूसरे पर नुक़सान उठाया. आपको पूरे मुनाफ़े पर टैक्स देने की ज़रूरत नहीं है. एक शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस को उसी फ़ाइनेंशियल ईयर के किसी लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन के ख़िलाफ़ सेट-ऑफ़ किया जा सकता है, जिससे वो रक़म घट जाती है जिस पर आपको टैक्स देना होता है.

यह कैसे काम करता है

मान लीजिए आप एक इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड बेचते हैं और ₹2 लाख का लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन कमाते हैं. उसी साल, आप किसी दूसरे निवेश पर ₹60,000 का शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस दर्ज करते हैं.

आप पहले उस नुक़सान को मुनाफ़े के ख़िलाफ़ सेट-ऑफ़ करते हैं. इससे आपका लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन घटकर ₹1.4 लाख रह जाता है. 

इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड के लिए, एक फ़ाइनेंशियल ईयर में ₹1.25 लाख तक का LTCG टैक्स-फ़्री होता है. इसलिए टैक्स वाला हिस्सा सिर्फ़ ₹15,000 बचता है. मौजूदा 12.5% की दर पर, आपका टैक्स ₹1,875 बनता है.

अगर नुक़सान का सेट-ऑफ़ न होता, तो आपका नेट प्रॉफ़िट ₹2 लाख होता, जिसमें छूट के बाद ₹75,000 पर टैक्स लगता, और टैक्स बनता ₹9,375.

सेट-ऑफ़ के नियम

शॉर्ट-टर्म कैपिटल लॉस को शॉर्ट-टर्म और लॉन्ग-टर्म, दोनों तरह के कैपिटल गेन के साथ मिलाकर सेट-ऑफ़ किया जा सकता है. जबकि लॉन्ग-टर्म कैपिटल लॉस को सिर्फ़ लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन के ख़िलाफ़ ही सेट-ऑफ़ किया जा सकता है. इसे शॉर्ट-टर्म मुनाफ़े के ख़िलाफ़ नहीं जोड़ा जा सकता.

अगर आप इस साल नुक़सान का इस्तेमाल न कर पाएं तो?

अगर किसी फ़ाइनेंशियल ईयर में आपका नुक़सान आपके मुनाफ़े से ज़्यादा है, तो आप उसे आठ आकलन वर्षों तक आगे ले जा सकते हैं. पर इसका फ़ायदा उठाने के लिए, आपको अपना इनकम-टैक्स रिटर्न तय तारीख़ तक भरना होगा. आगे के सालों में जब आप उस आगे ले जाए गए नुक़सान का इस्तेमाल करेंगे, तब भी यही सेट-ऑफ़ के नियम लागू होंगे.

डेट फ़ंड पर एक बात

ये नियम इक्विटी और इक्विटी वाले म्यूचुअल फ़ंड पर लागू होते हैं. डेट म्यूचुअल फ़ंड पर टैक्स अलग तरह से लगता है. अगर आपने डेट फ़ंड की यूनिट 1 अप्रैल 2023 को या उसके बाद ख़रीदी हैं, तो उनके मुनाफ़े को आपकी आमदनी में जोड़ दिया जाता है और आपकी लागू स्लैब दर से टैक्स लगता है, चाहे आपने उन्हें कितने भी समय तक रखा हो. उन यूनिट पर LTCG और STCG वाला स्ट्रक्चर लागू नहीं होता.

सार की बात

टैक्स बिल घटाने के लिए किसी कैपिटल लॉस का इस्तेमाल करना पूरी तरह जायज़ है. पर टैक्स को आपके निवेश के फ़ैसले तय नहीं करने चाहिए. अगर कोई निवेश अब आपके पोर्टफ़ोलियो में फ़िट नहीं बैठता, तो नुक़सान दर्ज करना पैसे और टैक्स, दोनों लिहाज़ से समझदारी हो सकती है. पर किसी अच्छे निवेश को सिर्फ़ टैक्स बचाने के लिए बेच देना, आमतौर पर समझदारी नहीं होती.

अगर आप कोई नुक़सान दर्ज करते हैं, तो उसे अपने रिटर्न में ज़रूर बताइए. भले ही आप उसका इस्तेमाल तुरंत न कर पाएं, समय पर रिटर्न भरना आपके विकल्प खुले रखता है.

यह भी पढ़ें: क्या SGB पर ₹1.25 लाख की LTCG छूट लागू होती है?

ये लेख पहली बार अगस्त 04, 2026 को पब्लिश हुआ.

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