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सारांशः KEC International का रेवेन्यू और ऑर्डर बुक तेज़ी से बढ़े हैं, लेकिन प्रॉफ़िट लगभग जस का तस बना हुआ है और कैश जेनरेशन कमज़ोर बना हुआ है. यह स्टोरी पड़ताल करती है कि क्या स्टॉक की यह भारी गिरावट कंपनी के क़र्ज़, वर्किंग कैपिटल और मार्जिन की दिक़्क़तों की वजह से जायज़ है, या फिर वर्तमान में जारी बदलाव तस्वीर बदल सकते हैं.
भारत के इंफ़्रास्ट्रक्चर बूम ने निवेशकों को ऑर्डर बुक पर ध्यान देना सिखाया है. आख़िर, एक बड़ी ऑर्डर बुक का मतलब है कि इंफ़्रा कंपनी अच्छा कर रही है, है न?
लेकिन KEC International इस नियम की अपवाद है. एक मोटी ऑर्डर बुक और रिकॉर्ड इनफ़्लो के बावजूद, इसका प्रॉफ़िट बरसों से एक ही जगह अटका हुआ है. कंपनी का कहना है कि FY27 में हालात सुधर सकते हैं और अब जब पहली तिमाही के नतीजे आ चुके हैं, तो इस दावे को परखने का वक़्त है.
कंपनी के बारे में
RPG ग्रुप का हिस्सा, KEC International भारत की सबसे बड़ी EPC (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन) कंपनियों में से एक है, जो अपने T&D (ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन) बिज़नेस के लिए जानी जाती है, जिसके तहत यह देश भर में बिजली पहुंचाने वाले टावर और लाइनें बनाती है.
पिछले एक दशक में इसने रेलवे, सिविल कंस्ट्रक्शन, पानी, मेट्रो, पाइपलाइन और केबल जैसे कारोबार जोड़े हैं, जिससे इसका दायरा तो बढ़ा, लेकिन इसने KEC की बुनियादी पहचान को ही बदल दिया.
बड़ा हुआ, बेहतर नहीं
| KEC के आंकड़े सुधरे हैं, लेकिन प्रॉफ़िट ग्रोथ कहीं नहीं दिखती | FY26 | FY20 |
|---|---|---|
| रेवेन्यू (₹ करोड़) | 23,506 | 11,965 |
| EBITDA मार्जिन (%) | 7.5 | 10.1 |
| ब्याज़ लागत (₹ करोड़) | 872 | 403 |
| टैक्स के बाद प्रॉफ़िट (₹ करोड़) | 606 | 566 |
| ROCE (%) | 16.4 | 25.3 |
FY20 से FY26 के बीच, KEC के आंकड़ों में बेशक बढ़ोतरी हुई है. रेवेन्यू लगभग दोगुना हो गया, लेकिन टैक्स के बाद प्रॉफ़िट सिर्फ़ 7 प्रतिशत ही बढ़ा. EBITDA (ब्याज़, टैक्स, डेप्रिसिएशन और एमॉर्टाइज़ेशन से पहले की कमाई) ₹551 करोड़ बढ़ा, लेकिन ब्याज़ लागत भी ₹469 करोड़ बढ़ गई, जिसने ऑपरेटिंग गेन्स का ज़्यादातर हिस्सा खा लिया.
ब्याज़ के बोझ वाली एक्सेप्टेंस समेत नेट डेट भी FY25 के ₹4,558 करोड़ से बढ़कर एक साल बाद ₹6,722 करोड़ हो गया, जबकि रेवेन्यू सिर्फ़ 8 प्रतिशत बढ़ा.
EBITDA मार्जिन 10.1 प्रतिशत से गिरकर 7.5 प्रतिशत पर आ गया, और इसकी वजह यह है कि KEC कमाई कहां से करती है. FY26 के रेवेन्यू में T&D की हिस्सेदारी 67 प्रतिशत रही, जिसका सामान्य मार्जिन क़रीब 10 प्रतिशत होता है, और इसने ग्रुप के कुल ₹1,760 करोड़ के EBITDA में अनुमानित ₹1,590 करोड़ का योगदान दिया. इसका मतलब है कि बाक़ी बिज़नेस से आए ₹7,700 करोड़ के रेवेन्यू ने लगभग कुछ भी योगदान नहीं दिया.
रेलवे कभी T&D का काउंटरवेट हुआ करता था, जिसने FY21 में T&D के घाटे वाले पुराने कॉन्ट्रैक्ट को संभाला था, लेकिन अब यह अपने FY22 के आकार का महज एक-तिहाई यानी ₹1,527 करोड़ रह गया है, क्योंकि KEC ने ऐसे टेंडरों से हाथ खींच लिया जिनमें 15-20 बिडर आ रहे थे. सरकारी फंडिंग में देरी होने पर KEC ने वॉटर प्रोजेक्ट्स में भी काम की रफ़्तार धीमी कर दी, जिससे फ़िक्स्ड लागत की भरपाई अधूरी रह गई और दिल्ली व चेन्नई में चार पूरी हो चुकी मेट्रो लाइनें अभी भी हैंडओवर का इंतज़ार कर रही हैं, जिनके रखरखाव पर हर साल ₹240 करोड़ तक ख़र्च हो रहा है, जबकि कमाई कुछ भी नहीं हो रही.
वह कैश जो कभी आया ही नहीं
किसी EPC कॉन्ट्रैक्टर के लिए, रेवेन्यू बुक करना कैश जमा करने जैसा नहीं होता. असल मायने यह रखता है कि कितना रेवेन्यू कैश में बदलता है.
FY20 से FY26 के बीच, KEC ने अपने कुल EBITDA का सिर्फ़ 17 प्रतिशत ही ऑपरेटिंग कैश में बदला और बाक़ी फ़र्क़ को ज़्यादातर वर्किंग कैपिटल खा गया. इतना कैश इसी दौरान चुकाए गए ₹3,392 करोड़ के ब्याज़ को कवर करने के लिए काफ़ी नहीं था, इसलिए कंपनी को उन क़र्जों पर ब्याज़ चुकाने के लिए भी उधार लेना पड़ा, जिनसे काम को फ़ंड किया गया था. FY26 इस बात को सबसे साफ़ तरीक़े से दिखाता है, क्योंकि इसके अब तक के सबसे अच्छे साल में भी ऑपरेटिंग कैश फ़्लो माइनस ₹414 करोड़ रहा.
बढ़ता हुआ ढेर
₹6,474 करोड़ के ट्रेड रिसीवेबल्स, ₹23,506 करोड़ के रेवेन्यू के मुक़ाबले संभलने लायक़ लगते हैं, लेकिन बिल किए गए इनवॉइस, ग्राहकों पर KEC के कुल बक़ाये का सिर्फ़ एक-तिहाई हिस्सा हैं. बाक़ी हिस्सा वह काम है जो हो चुका है लेकिन अभी इनवॉइस नहीं किया जा सकता, साथ ही वह रिटेंशन मनी है जिसे क्लाइंट प्रोजेक्ट पूरा होने तक रोके रखते हैं. सऊदी के कॉन्ट्रैक्ट, जो KEC के सबसे बड़े हैं, 20 प्रतिशत रिटेन करते हैं, यही वजह है कि दो सालों में रिटेंशन 86 प्रतिशत बढ़ चुका है.
रिसीवेबल्स का बढ़ता बैकलॉग
KEC International के रिसीवेबल्स पिछले तीन सालों में लगातार बढ़े हैं
| ₹ करोड़ में, कंसॉलिडेटेड | FY26 | FY25 | FY24 |
|---|---|---|---|
| बिल किए गए रिसीवेबल्स | 6,474 | 5,051 | 4,137 |
| अनबिल्ड रेवेन्यू | 7,409 | 7,509 | 6,488 |
| रिटेंशन मनी | 4,923 | 3,670 | 2,644 |
| ग्राहकों पर कुल बक़ाया, प्रोविज़न घटाकर | 18,602 | 16,095 | 13,225 |
लगभग नौ महीने की बिक्री क्लाइंट्स के पास पड़ी है. नेट वर्किंग कैपिटल डेज़ यह मापते हैं कि किसी प्रोजेक्ट पर ख़र्च करने और पैसा वापस मिलने के बीच कितना फ़ासला है. Q1FY27 तक, KEC यह आंकड़ा 134 दिन पर बंद हुआ, जबकि इसकी प्रतिद्वंद्वी Kalpataru का यह आंकड़ा 80 दिन है. यह इंडस्ट्री के काम करने का तरीक़ा नहीं है. यह KEC के काम करने का तरीक़ा है.
रिकॉर्ड ऑर्डर बुक, लेकिन ज़्यादा बोझिल
इससे ऑर्डर इनटेक पर कोई असर नहीं पड़ा है. FY26 में रिकॉर्ड ₹25,280 करोड़ का इनफ़्लो आया और क्लोज़िंग बुक ₹36,267 करोड़ की रही. काग़ज़ पर, कुछ भी कमज़ोरी नज़र नहीं आती.
असली दिक़्क़त इसमें है कि किस तरह का काम हासिल किया जा रहा है. औसत ऑर्डर वैल्यू बढ़ाने के लिए, KEC ने अपने सामान्य ऑर्डर साइज़ को ₹350 करोड़ से बढ़ाकर ₹500 करोड़ से ज़्यादा कर दिया है. बड़े, मल्टी-ईयर प्रोजेक्ट्स को पूरा होने में ज़्यादा वक़्त लगता है और रास्ते में ज़्यादा कैश फंसा सकते हैं, क्योंकि बिलिंग प्रोजेक्ट के माइलस्टोन से जुड़ी होती है और पेमेंट का एक हिस्सा बाद के चरणों तक रोका जा सकता है. ऑर्डर बुक अब चलाने के लिए एक भारी मशीन बनती जा रही है, जो उसी संसाधन पर और ज़्यादा दबाव डाल रही है जिसकी KEC के पास पहले से कमी है: वो है कैश.
क्या सही हो रहा है
असली सुधार का काम चल रहा है. KEC कम मार्जिन वाले नॉन-T&D सेगमेंट को समेट रहा है. कुल रेवेन्यू में नॉन-T&D का हिस्सा FY24 के 47 प्रतिशत से घटकर FY26 में 32 प्रतिशत रह गया है, क्योंकि कंपनी ने कैश-निगेटिव काम के लिए बोली लगाना बंद कर दिया है.
पैसा भी नज़र आ रहा है. ओवरड्यू वॉटर रिसीवेबल्स, सऊदी रिटेंशन और पहले ही जीते जा चुके रेलवे आर्बिट्रेशन अवॉर्ड्स के ज़रिए क़रीब ₹1,000 करोड़ मिलने बाक़ी हैं. इससे इस साल ₹1,000-1,200 करोड़ का क़र्ज़ कम किया जा सकता है. हालाँकि इससे वर्किंग कैपिटल दो साल पहले वाली स्थिति में वापस आ जाएगा, लेकिन यह सिर्फ़ पुराने स्तर पर लौटना है, असली सुधार नहीं.
FY27 की पहली तिमाही सुधार के संकेत देती है, जिसमें क़र्ज़ ₹154 करोड़ कम हुआ है और रेवेन्यू ₹5,024 करोड़ पर फ़्लैट रहा है. यह फ़्लैट रेवेन्यू लाइन ही ध्यान देने लायक़ बात है, क्योंकि अकेले FY26 में ही रिटेंशन ₹1,253 करोड़ बढ़ा था. इसलिए KEC एक ऐसे बैलेंस से कैश निकालने की कोशिश कर रहा है, जो इंटरनेशनल ऑर्डर तेज़ रफ़्तार पकड़ते ही फिर से भर सकता है. यह फ़्लैट तिमाही असल में रिपेयर की क़ीमत है: फ़िलहाल, KEC ने ग्रोथ का पीछा करने के बजाय पैसा वसूलने को चुना है.
निष्कर्ष
तो, क्या KEC की डी-रेटिंग ज़रूरत से ज़्यादा हो गई है? अभी नहीं, और क़ीमत इसकी सबसे कम अहम वजह है. 22 गुना ट्रेलिंग अर्निंग्स पर, KEC, Kalpataru Projects के बराबर बैठती है और क़रीब 27 गुना पर मौजूद Skipper से नीचे है, यानी यह अपने प्रतिद्वंदियों जैसी ही क़ीमत पर है, लेकिन प्रॉफ़िट पर आधारित; ब्याज़ का बिल घट चुका है.
मार्केट को डिमांड पर शक नहीं है. ग्रिड पर होने वाला ख़र्च असली है और रिकॉर्ड ऑर्डर बुक इसे साबित करती है. इसके बजाय, निवेशक कंपनी को इसलिए सज़ा दे रहे हैं क्योंकि सात सालों के रिकॉर्ड रेवेन्यू से मुश्किल से ही कोई कैश निकला और ब्याज़ चुकाने के बाद तो कुछ भी नहीं बचा.
जिन अहम संकेतों पर नज़र रखनी चाहिए, वे हैं: पॉज़िटिव ऑपरेटिंग कैश फ़्लो, रेवेन्यू से धीमी रफ़्तार से बढ़ते कॉन्ट्रैक्ट एसेट और सुधरता हुआ प्रॉफ़िट मार्जिन. जब तक ये नहीं आते, KEC एक अनोखी स्ट्रक्चरल दिक़्क़त का सामना करता रहेगा: लगातार कैश कलेक्शन के बिना, हर नए ऑर्डर के लिए शुरुआती लागत जुटाने के वास्ते अतिरिक्त क़र्ज़ की ज़रूरत पड़ती है, जिससे आगे की ग्रोथ को बनाए रखना लगातार महंगा होता जाता है.
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KEC International जैसे स्टॉक बताते हैं कि सिर्फ़ प्रमुख आंकड़े ही सब कुछ नहीं होते. एक रिकॉर्ड ऑर्डर बुक और बढ़ता रेवेन्यू हमेशा पूरी कहानी नहीं बताते. यह समझना कि किसी कंपनी के कैश फ़्लो, मार्जिन और बैलेंस शीट की सेहत को असल में क्या चला रहा है, यही वह चाबी है जो असली टर्नअराउंड को वैल्यू ट्रैप से अलग करती है.
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