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NSDL के पास बाज़ार का सबसे बड़ा हिस्सा था. फिर निवेशकों को घाटा क्यों हुआ?

भारत में डीमैट में जमा वेल्थ का क़रीब 86% हिस्सा इसी के पास है. फिर भी यह दबदबा रिटर्न में नहीं बदला.

भारत में डीमैट में जमा वेल्थ का क़रीब 86% हिस्सा इसी के पास है. फिर भी यह दबदबा रिटर्न में नहीं बदला.Anand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः NSDL के पास भारत की डीमैट दौलत का बहुत बड़ा हिस्सा है, फिर भी उसके शेयर ने वो रिटर्न नहीं दिया जिसकी निवेशक उम्मीद कर रहे थे. यह कंपनी कमाती कैसे है, यह क़रीब से देखने पर एक बात साफ़ हो जाती है: बाज़ार में हिस्सेदारी होना, और शेयरहोल्डरों को फ़ायदा देना, दोनों एक बात नहीं है.

पिछले साल जब NSDL (नैशनल सिक्योरिटीज़ डिपॉज़िटरी लिमिटेड) बाज़ार में आई, तो बात एकदम साफ़ रखी गई थी. यह कि इस कंपनी का शेयर ख़रीदिए, और भारत के शेयर बाज़ार की बुनियाद में हिस्सेदार बन जाइए. भारतीयों के जो शेयर डीमैट खातों में पड़े हैं, उनका क़रीब 86% हिस्सा NSDL के पास ही है. इसीलिए इसके IPO का निवेशक बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे.

पर एक साल बाद तस्वीर फीकी है. शेयर अपने लिस्टिंग भाव से भी नीचे चल रहा है. और लिस्टिंग के कुछ महीने बाद उसका दाम जहां तक पहुंचा था, अब उसका आधा ही रह गया है. IPO में मिले ₹1 लाख के शेयर अगर लिस्टिंग वाले दिन बेच दिए होते, तो वो ₹1.10 लाख बनते. और आज तक रखे होते, तो भी क़रीब ₹1.04 लाख ही होते. पर ज़्यादातर रिटेल निवेशकों को शेयर मिले ही नहीं. उन्होंने लिस्टिंग वाले दिन बंद भाव पर ख़रीदा, और उनके ₹1 लाख, डिविडेंड मिलाकर भी, अब क़रीब ₹88,000 रह गए हैं. वहीं एक निफ़्टी इंडेक्स फ़ंड में यही रक़म ₹99,750 होती.

हैरानी की बात यह है कि कारोबार लगातार बढ़ने के बावजूद NSDL पीछे रहा. जैसे-जैसे निवेशकों को यह साफ़ हुआ कि यह कंपनी कमाती कैसे है, बाज़ार में उसका हिस्सा उतना फ़ायदेमंद नहीं दिखने लगा, जितना पहली नज़र में लगा था.

NSDL को पैसा कहां से मिलता है

1996 में जब शेयर काग़ज़ से डिजिटल हुए, तो NSDL वो जगह बन गई जहां यह दर्ज होता है कि कौन सा शेयर किसका है. हर सौदे का निपटारा, हर डिविडेंड और हर गिरवी, सब इसी से गुज़रता है. और यह पैसा निवेशकों से नहीं, कंपनियों से लेती है. फ़ोलियो का मतलब है किसी एक शेयरहोल्डर का रिकॉर्ड. कोई कंपनी हर फ़ोलियो पर ₹11 देती है, या फिर अपने शेयरों की क़ीमत के हिसाब से एक कम से कम फ़ीस, जो ₹5,000 से ₹75,000 के बीच होती है. इन दोनों में से जो रक़म ज़्यादा बने, वही चुकानी पड़ती है.

और यहीं असली पेच है. इस हिसाब में शेयरों की बाज़ार क़ीमत कहीं नहीं आती. अगर NSDL के पास रखे सारे शेयरों के दाम कल दोगुने हो जाएं, तो भी उसकी कमाई एक रुपया नहीं बढ़ेगी. इसलिए उसके पास रखी ₹535 लाख करोड़ की दौलत यह बताती है कि NSDL को हटाना कितना मुश्किल है, यह नहीं कि वो कितना कमा सकती है.

NSDL की कमाई कहां से आती है

FY26 (₹ करोड़)
रेविन्यू EBIT (ऑपरेटिंग मुनाफ़ा)
डिपॉज़िटरी (अकेली NSDL) 704.7 348.8
NSDL पेमेंट बैंक 746.8 20.6
डेटाबेस मैनेजमेंट 78.5 17
कुल रेविन्यू 1,530 386.4

डिपॉज़िटरी की आधी कमाई उस सालाना फ़ीस से आती है, जो बाज़ार में सौदे हों या न हों, आती ही रहती है. यह पक्की कमाई FY25 में अकेली NSDL की कमाई का 42% थी, जो FY26 में 50% हो गई. इतना ही हिस्सा पक्का होना, कारोबार को भरोसे लायक़ बनाता है.

बाक़ी कमाई बाज़ार की हलचल के साथ ऊपर-नीचे होती रहती है. और FY26 में वो नीचे गई. बाज़ार सुस्त पड़ा, तो निपटारे की फ़ीस 17% घट गई, और कॉर्पोरेट एक्शन व IPO से होने वाली कमाई 18.5%. उधर ख़र्च ऐसा है जो सौदे कम होने पर भी घटता नहीं. इसलिए बाज़ार की सुस्ती सीधे NSDL के नतीजों में दिखने लगती है. और वो इसकी भरपाई ज़्यादा फ़ीस लेकर भी नहीं कर सकती, क्योंकि यह फ़ीस SEBI तय करता है, और उसने पिछले 11 साल में इसे बदला ही नहीं.

मार्जिन का उलझा हुआ हिसाब

FY26 में NSDL का कुल EBITDA मार्जिन क़रीब 28% रहा. जबकि उसकी प्रतिद्वंद्वी CDSL (सेंट्रल डिपॉज़िटरी सर्विसेज़) का 52%. और मज़े की बात यह कि अकेली डिपॉज़िटरी का मार्जिन तो 54% के क़रीब है. ऊपर की टेबल बता देती है कि यह फ़र्क़ कहां जाता है. पेमेंट बैंक, डिपॉज़िटरी से भी ज़्यादा कमाई करता है, पर उस पर मुनाफ़ा लगभग शून्य है.

इसकी वजह यह है कि पेमेंट बैंक कर्ज़ नहीं दे सकता. यानी उसे ब्याज का वो फ़ायदा नहीं मिलता जो आम बैंकों को मिलता है, और अपनी ज़्यादातर जमा रक़म उसे सरकारी बॉन्ड में रखनी पड़ती है. बचती है सिर्फ़ फ़ीस से होने वाली कमाई. और NSDL का बैंक वो फ़ीस एजेंटों और कॉर्पोरेट साझेदारों के ज़रिए जुटाता है, जो उसका बड़ा हिस्सा कमीशन में ले लेते हैं. UPI में उतरने से यह दिक़्क़त और बढ़ी है, क्योंकि UPI के सौदों पर दुकानदारों से आमतौर पर कोई फ़ीस नहीं ली जाती. यानी काम बढ़ता है, कमाई नहीं. FY26 तक इसके पास जमा ₹521 करोड़ से सिर्फ़ क़रीब ₹36 करोड़ का ब्याज बनता है, और वो भी जमा करने वालों को उनका हिस्सा देने से पहले.

एक दूसरा दबाव भी है, पर वो कुछ समय का ही है. NSDL ने FY26 में टेक्नोलॉजी पर क़रीब ₹106 करोड़ ख़र्च किए, और FY27 में भी इतना ही ख़र्च करेगी, क्योंकि उसका पूरा टेक्नोलॉजी ढांचा नया बन रहा है. इससे डेप्रिसिएशन और उससे जुड़े ख़र्च भी बढ़ गए हैं. पर मैनेजमेंट को उम्मीद है कि यह काम पूरा होने के बाद, FY28 से यह ख़र्च घटने लगेगा.

डीमैट से मिला वो मौक़ा अब ख़त्म हो रहा है

FY26 की बढ़त ने NSDL की कहानी को उससे ज़्यादा मज़बूत दिखा दिया, जितनी वो असल में थी. सालाना फ़ीस 36% बढ़ी, पर इसकी बड़ी वजह सरकार का एक आदेश था. उसकी वजह से FY26 की पहली छमाही में क़रीब 22,000 ग़ैर-लिस्टेड कंपनियां NSDL के रिकॉर्ड में जुड़ गईं. और चूंकि NSDL यह फ़ीस उसी वक़्त वसूलती है जब कोई कंपनी जुड़ती है, इसलिए कंपनियां जुड़ीं और कमाई भी बढ़ गई. पर फिर नियम बदल गए. दिसंबर 2025 से छोटी कंपनियों की सीमा बढ़ा दी गई, जिससे और कंपनियों को इससे छूट मिल गई. नतीजा यह कि सितंबर में 11,000 से ज़्यादा कंपनियां जुड़ी थीं, और दिसंबर में सिर्फ़ 4,446. NSDL अब ख़ुद कह रही है कि यह मौक़ा काफ़ी हद तक निकल चुका है.

अब जो बचा है, वो पक्का तो है, पर छोटा है. 1.3 लाख से ज़्यादा ग़ैर-लिस्टेड कंपनियां जुड़ने की ₹15,000 फ़ीस चुका चुकी हैं. और ₹5,000 से ₹9,000 की सालाना फ़ीस से, कुल सालाना फ़ीस का लगभग आधा हिस्सा आता है. पर इनमें से ज़्यादातर कंपनियां चंद लोगों की हैं, उनके फ़ोलियो कम हैं, और वो कम से कम फ़ीस के आसपास ही चुकाती हैं. इसलिए यहां आगे बढ़ने की गुंजाइश कम बची है.

रिटेल में पिछड़ना सच है. कमाई में पिछड़ना नहीं

NSDL पर सबसे ज़्यादा यही इलज़ाम लगता है कि वो रिटेल निवेशकों की लहर पकड़ नहीं पाई. खातों की गिनती देखें, तो यह सच भी है. CDSL के पास इससे क़रीब चार गुना डीमैट खाते हैं. वजह यह कि NSDL के साथ जुड़े बैंक वाले साझेदार, नए निवेशक जोड़ने पर कम ध्यान देते रहे.

पर सिर्फ़ खातों की गिनती से NSDL का पूरा हिसाब समझ नहीं आता. NSDL के एक खाते में औसतन क़रीब ₹1.17 करोड़ रखे हैं, जबकि CDSL के एक खाते में ₹4.6 लाख. और NSDL अब अपनी पुरानी ताक़त छोड़े बिना, रिटेल की तरफ़ भी बढ़ रही है. उसने FY26 में रिकॉर्ड 21 नए डिपॉज़िटरी पार्टिसिपेंट जोड़े, जिनमें डिस्काउंट ब्रोकर भी शामिल हैं. और उसके चालू फ़ोलियो 11.5 करोड़ से बढ़कर 14 करोड़ हो गए. नए डीमैट खातों में उसका हिस्सा FY27 की पहली तिमाही में 17.6% पहुंच गया, जो एक साल पहले 15.5% था. हां, उसे यह बढ़त IPO वाली लहरों के बाद भी बनाए रखनी होगी.

आख़िरी बात

CDSL पर भी वही तय दरें लागू होती हैं, पर उसका कारोबार भारत में बढ़ते रिटेल निवेश से ज़्यादा मेल खाता है. उसके पास कहीं ज़्यादा डीमैट खाते, फ़ोलियो और सौदे हैं. वहीं NSDL के पास बड़ी और ज़्यादा क़ीमत वाली दौलत रखी है, पर वो क़ीमत सीधे कमाई में नहीं बदलती. आज NSDL कमाई के 44 गुना दाम पर मिल रही है, जबकि CDSL 61 गुना पर. यानी NSDL अब अच्छी-ख़ासी छूट पर है.

NSDL को इस जगह से हटाना अब भी मुश्किल है, पर उसकी बढ़त की सीमाएं साफ़ दिखने लगी हैं. ग़ैर-लिस्टेड कंपनियों वाली लहर गुज़र चुकी है, फ़ीस की दरें वहीं की वहीं हैं, रिटेल में बढ़त लगातार नहीं है, और पेमेंट बैंक कमाई तो जोड़ता है पर मुनाफ़ा नहीं. इसलिए अब दो सवाल अहम हैं. पहला, FY28 से टेक्नोलॉजी का ख़र्च घटने पर उसका मार्जिन सुधरेगा या नहीं. और दूसरा, नए डीमैट खातों में उसका बढ़ा हुआ हिस्सा IPO वाली लहरों के बाद भी बना रहेगा या नहीं. जब तक इनके जवाब नहीं मिलते, कारोबार तो सुरक्षित है, पर उसे यह साबित करना बाक़ी है कि वो अपनी इस मज़बूत जगह को टिकाऊ कमाई में बदल सकता है.

वैल्यू रिसर्च की राय

बाज़ार में दबदबा होना और शेयरहोल्डरों को फ़ायदा देना, दोनों एक बात नहीं होते, और NSDL की कहानी यही दिखाती है. वैल्यू रिसर्च स्टॉक एडवाइज़र ऐसे ही सवालों के साथ कारोबार परखकर आपको सही फ़ैसले तक पहुंचाता है.

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