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सारांशः विदेश में निवेश करने से भारतीय निवेशकों को लंबे समय से डाइवर्सिफ़िकेशन और दुनियाभर की बड़ी कंपनियों तक पहुंच मिलती रही है, लेकिन सरकारी दख़लंदाज़ी से जुड़ा एक नया जोख़िम अब नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होता जा रहा है. हम यहां देखेंगे कि हाल में अमेरिका के क़दमों ने अंतरराष्ट्रीय निवेश की एक बुनियादी धारणा को क्यों हिला दिया है और क्यों भौगोलिक डाइवर्सिफ़िकेशन इस समस्या का पूरा हल नहीं हो सकता.
सारांशः विदेश में निवेश करने से भारतीय निवेशकों को लंबे समय से डाइवर्सिफ़िकेशन और दुनियाभर की बड़ी कंपनियों तक पहुंच मिलती रही है, लेकिन सरकारी दख़लंदाज़ी से जुड़ा एक नया जोख़िम अब नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होता जा रहा है. हम यहां देखेंगे कि हाल में अमेरिका के क़दमों ने अंतरराष्ट्रीय निवेश की एक बुनियादी धारणा को क्यों हिला दिया है और क्यों भौगोलिक डाइवर्सिफ़िकेशन इस समस्या का पूरा हल नहीं हो सकता. यह लेख मेरे बाक़ी लेखों से अलग है. इस बार मैं कोई सलाह नहीं दे रहा, बल्कि सिर्फ़ अपनी एक आशंका दर्ज कर रहा हूं और इसका सीधा संबंध उस हर रुपए से है जो भारतीय निवेशकों ने विदेश भेजा है. जब से मैं अपने कॉलम लिख रहा हूं, विदेश में निवेश का तर्क हमेशा साफ़ रहा है. और एक बुनियादी धारणा जो हम सब मानकर चलते हैं, वह भले ही कभी खुलकर न कही गई हो, लेकिन अब तक सच साबित होती रही है. यह धारणा थी कि कोई विदेशी सरकार आपकी कमाई पर टैक्स तो लगा सकती है, लेकिन वह आपके पैसे में सीध
ये लेख पहली बार अगस्त 31, 2026 को पब्लिश हुआ.
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