फंड वायर

इंडेक्स फ़ंड अब वो उधार लेना बंद कर सकता है, जिसकी कभी ज़रूरत ही नहीं थी

SEBI चाहता है कि जब कोई फ़ंड ख़रीद और बिक्री दोनों काम एक ही दिन करे, तो उसका हिसाब आपस में जोड़-घटाकर बाक़ी रक़म ही चुकाई जाए. यह एक छोटा सा तकनीकी बदलाव है, पर इंडेक्स फ़ंड वालों के लिए सबसे काम का है.

SEBI चाहता है कि जब कोई फ़ंड ख़रीद और बिक्री दोनों काम एक ही दिन करे, तो उसका हिसाब आपस में जोड़-घटाकर बाक़ी रक़म ही चुकाई जाए. यह एक छोटा सा तकनीकी बदलाव है, पर इंडेक्स फ़ंड वालों के लिए सबसे काम का है.Ujjal Das/AI-Generated Image

सारांशः मान लीजिए कोई फ़ंड एक ही दिन किसी शेयर में ₹500 करोड़ की बिकवाली करता है और ₹500 करोड़ की दूसरी ख़रीद करता है. फिर भी उसे ₹500 करोड़ कैश कहीं से लाने पड़ते हैं, क्योंकि बेचने से आया पैसा अलग से आता है. SEBI ने प्रस्ताव रखा है कि इन दोनों को आपस में काट दिया जाए. इससे आपकी NAV नहीं बदलेगी. पर जिन दिनों भारी ख़रीद-बिक्री होती है, उन दिनों में फ़ंड कम उधार लेंगे और कम पैसा बेकार रखेंगे. यह एक ख़र्च था, जो निवेशक बिना जाने चुकाते आ रहे थे.

निफ़्टी के रिबैलेंसिंग वाले दिन को ही लीजिए. दो शेयर इंडेक्स से बाहर जाते हैं और दो नए उसमें शामिल हो जाते हैं. अब हर इंडेक्स फ़ंड को उसी दिन, बाज़ार बंद होते वक़्त, बाहर जाने वाले शेयर बेचने पड़ते हैं और नए आने वाले ख़रीदने पड़ते हैं. वजह यह कि उसने अपने निवेशकों से वादा किया है कि वो ठीक अपने इंडेक्स के साथ-साथ चलेगा.

मान लीजिए एक फ़ंड ने ₹500 करोड़ के शेयर बेचे और ₹500 करोड़ के ख़रीदे. यानी कुल मिलाकर उसे एक रुपया भी कहीं से लाने की ज़रूरत नहीं. पर आज के नियमों में वो ख़रीद और वो बिक्री, दो अलग-अलग ज़िम्मेदारियां मानी जाती हैं और दोनों का पूरा-पूरा हिसाब होता है. यानी फ़ंड जो ख़रीदा उसके लिए ₹500 करोड़ चुकाता है और जो बेचा उसके लिए अलग से ₹500 करोड़ पाता है.

अब वो ₹500 करोड़ कहीं से तो आने ही हैं. इसके दो ही रास्ते बचते हैं. या तो फ़ंड इतना पैसा पहले से बेकार रखे, जिससे उसका रिटर्न घटता है. या फिर एक दिन के लिए उधार ले ले, जिसका ब्याज लगता है.

और दोनों हालत में वो ख़र्च निवेशक की जेब से जाता है. वो भी एक ऐसी कमी के लिए, जो असल में कमी ही नहीं थी. पैसा तो उसी दिन आ ही रहा था, बस अलग रास्ते से आ रहा था.

फ़ंड पूरा पैसा क्यों चुकाते हैं

इसकी जड़ 1990 के दशक में है, जब भारतीय बाज़ार उधार के पैसे और ज़ुबानी वादों पर चलता था. उस वक़्त 'बदला' का चलन था, यानी लोग शेयर ख़रीदने का सौदा कर लेते और पैसा चुकाना आगे टालते रहते. सेटलमेंट साइकिल हफ़्तों तक खिंच जाती थी और कई सौदे तो शेयर डिलीवर होने से पहले ही निपटा दिए जाते थे. 1992 और 2001 में जो क्रैश आए, वो असल में इसी पैसे के लेन-देन के संकट थे.

इसका जवाब SEBI लाया, डिलीवरी वाले सेटलमेंट के रूप में. नियम सीधा है. आपने ख़रीदा है, तो शेयर लीजिए. आपने बेचा है, तो शेयर दीजिए. और संस्थाएं एक ही दिन में ख़रीद-बेच नहीं कर सकतीं. इसे पक्का रखने के लिए हर ख़रीद का पैसा अलग से आता है, और हर बिक्री के पीछे शेयर अलग से होते हैं. यह अनुशासन बनाए रखने लायक़ है और SEBI ने इसे छेड़ा भी नहीं है.

SEBI का प्रस्ताव क्या है

SEBI के पेपर में एक उदाहरण दिया गया है. मान लीजिए कोई स्कीम एक ही सेटलमेंट साइकिल में तीन शेयरों के सौदे करती है, यानी तीनों का हिसाब एक साथ निपटना है:

शेयर
ख़रीदा बेचा कैसे निपटेगा
A ₹ 1,000 कुछ नहीं सीधी ख़रीद
B ₹ 1,000 ₹ 2,000 ख़रीदा भी और बेचा भी
C कुछ नहीं ₹ 2,000 सीधी बिक्री

आज के नियमों में इस स्कीम को ₹2,000 चुकाने पड़ते हैं और ₹4,000 अलग से मिलते हैं. पर नए प्रस्ताव में A की ख़रीद और C की बिक्री आपस में जोड़-घटा दी जाएगी. यानी स्कीम ₹1,000 चुकाएगी और ₹3,000 पाएगी. हिसाब वही रहेगा, बस पैसा इधर-उधर घुमाना नहीं पड़ेगा.

शेयर B इस छूट में नहीं आएगा. वजह यह कि उसे एक ही सेटलमेंट साइकिल में ख़रीदा भी गया और बेचा भी. यह डे ट्रेडिंग जैसा दिखता है, इसलिए पूरी तरह सेटल होता है.

इस प्रस्ताव के साथ चार शर्तें भी जुड़ी हैं.

  1. सिर्फ़ पैसा कटेगा, शेयर नहीं. जो भी शेयर ख़रीदा जाएगा, वो डिलीवर भी होगा और उसका पैसा भी चुकाया जाएगा.
  2. यह कटौती एक ही स्कीम के अंदर हो सकेगी. कोई फ़ंड हाउस एक स्कीम की ख़रीद को दूसरी स्कीम की बिक्री से नहीं काट सकेगा. हर स्कीम अपने आप में एक अलग ट्रस्ट बनी रहेगी.
  3. अगर ख़रीद, बिक्री से ज़्यादा हो गई, तो उस फ़र्क़ का पैसा स्कीम को मौजूदा उधार वाले नियमों के तहत ही जुटाना होगा.
  4. इसके तरीक़े AMFI तय करेगा. उसके साथ कस्टोडियन और क्लियरिंग कॉर्पोरेशन भी होंगे, यानी वो संस्थाएं जो शेयरों और पैसे का हिसाब संभालती हैं.

वैसे विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशकों (FPI) को यही सुविधा अप्रैल में मिल चुकी है. म्यूचुअल फ़ंड के लिए इस प्रस्ताव पर राय देने की आख़िरी तारीख़ 24 सितंबर है.

फ़ायदा किसे होगा

किसी आम दिन, जब सिर्फ़ SIP का पैसा आ रहा हो, कुछ नहीं बदलेगा. यह छूट तभी काम आती है जब कोई स्कीम एक ही सेटलमेंट साइकल में ख़रीद और बिक्री, दोनों करे. जैसे इंडेक्स के फेरबदल वाले दिन. या जब एक तरफ़ लोग पैसा निकाल रहे हों और दूसरी तरफ़ नया पैसा लगाना हो. या जब एक शेयर से निकलकर दूसरे में जाना हो.

इसलिए सबसे ज़्यादा फ़ायदा इंडेक्स फ़ंड और ETF को होगा. छोटे फ़ंड हाउसेज को अपने आकार के हिसाब से इससे भी ज़्यादा फ़ायदा होगा, असल में, उनके पास बैंकों से उधार लेने के रास्ते कम हैं. डेट स्कीमों को इससे कम ही फ़ायदा मिलेगा, क्योंकि बॉन्ड का ज़्यादातर कारोबार एक्सचेंज के बाहर ही होता है.

तो इसमें पैसा कितना बचेगा? SEBI ने यह नहीं बताया, और हम अंदाज़ा भी नहीं लगाएंगे. बचत उतनी ही है, जितना एक दिन का उधार लेने में ख़र्च होता है और वो भी साल के कुछ ही दिनों पर. इंडस्ट्री की कुल एसेट्स के सामने यह छोटी रक़म है. पर यह असली है और इससे बचा जा सकता था.

आपके लिए इसका क्या मतलब है

यह फ़ीस में कोई बदलाव नहीं है. आपका एक्सपेंस रेशियो जहां है, वहीं रहेगा.

इससे इंडेक्स फ़ंड को अपने इंडेक्स के थोड़ा और क़रीब चलने में मदद मिलनी चाहिए. यही उसका सबसे बड़ा काम भी है. रिबैलेंसिंग वाला दिन ही वो दिन होता है, जब किसी इंडेक्स फ़ंड के वादे की असली परीक्षा होती है. यह प्रस्ताव उस एक वजह को हटा देता है, जिससे वो अपने बेंचमार्क से भटक जाता था.

और यह फ़ायदा प्रतिशत पॉइंट में नहीं, बल्कि बेसिस पॉइंट में है. यानी बहुत कम. इसे निवेशकों को मिले किसी तोहफ़े की तरह पेश करना भी ठीक नहीं होगा. यह वो ख़र्च है, जो निवेशकों को कभी उठाना ही नहीं चाहिए था.

किस बात पर नज़र रखनी है

यह प्रस्ताव ख़ुद इंडस्ट्री की मांग पर आया है. ऐसे मौक़ों पर हम आमतौर पर ज़्यादा ग़ौर से देखते हैं कि फ़ायदा किसका हो रहा है. पर इस बार जवाब भरोसा देने वाला है. यहां कोई नया बिचौलिया नहीं आ रहा, कोई नई फ़ीस नहीं लग रही और उधार लेने का कोई नया रास्ता भी नहीं खुल रहा.

पर इंडस्ट्री की एक आदत है. पहले एक छोटी सी छूट मिलती है, और फिर उसे बढ़ाने की मांग आ जाती है. फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड आज इसीलिए मौजूद हैं, क्योंकि 2020 में मल्टी-कैप फ़ंड वाला नियम इसी तरह ख़त्म हो गया था.

अगली मांग यही होगी कि एक ही फ़ंड हाउस की अलग-अलग स्कीमों के बीच भी यह कटौती हो सके. और उसे बेहतर इंतज़ाम का नाम दिया जाएगा. पर असल में वो एक स्कीम का दूसरी स्कीम को उधार देना होगा. और स्कीमों को आपस में अलग रखने वाले नियम ठीक इसी को रोकने के लिए बने हैं. SEBI ने इस पेपर में उसे मना कर दिया है, और आगे भी मना करते रहना चाहिए.

आख़िरी बात

इससे इंडेक्स फ़ंड के निवेशकों को साफ़ फ़ायदा है. किसी को कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, जो आमतौर पर नियमों से जुड़ी सबसे अच्छी ख़बर होती है.

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

इन 5 इक्विटी फ़ंड को मिली परफ़ेक्ट 5-स्टार रेटिंग

पढ़ने का समय 5 मिनटख्याति सिमरन नंदराजोग

NPS की स्कीम्स अब 5 कैटेगरी में, कहीं बदल न जाए आपकी पेंशन शुरू होने की तारीख़

पढ़ने का समय 6 मिनटआकार रस्तोगी

वो ग्रोथ, जो कहीं नहीं पहुंचाती

पढ़ने का समय 4 मिनटधीरेंद्र कुमार

आपके डेट फ़ंड का नाम बदल गया है, निवेशक क्या करें?

पढ़ने का समय 4 मिनटसिद्धांत माधव जोशी

भरोसा और जटिल भाषा, निवेशकों के लिए ख़तरनाक

पढ़ने का समय 5 मिनटधीरेंद्र कुमार

म्यूचुअल फंड पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

रोज़ नहीं, साल में एक बार देखें

अपने पोर्टफ़ोलियो को रोज़ लाल-हरे रंग में देखने के बजाय, साल में सिर्फ़ एक बार ध्यान से देखना काफ़ी है

These are advertorial stories which keeps Value Research free for all. Click here to mark your interest for an ad-free experience in a paid plan

दूसरी कैटेगरी