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जब ROCE से ज़्यादा हो ROE, आंकड़ों के पीछे समझिए क़र्ज़ की अहमियत

ऐसा क्यों होता है, और इसका कंपनी के लिए क्या मतलब है, आइए समझते हैं.

ऐसा क्यों होता है, और इसका कंपनी के लिए क्या मतलब है, आइए समझते हैं.Anand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः आमतौर पर ROE, ROCE से कम रहता है. पर कभी-कभी यह उलटा भी हो जाता है, और उसकी वजह होता है कर्ज़, जो शेयरहोल्डर्स का रिटर्न बढ़ा देता है. हमने 312 बड़ी लिस्टेड कंपनियों को देखा. यह लेख बताता है कि इस फ़र्क़ के पीछे क्या है और निवेशक को इन दो नंबरों से आगे क्यों देखना चाहिए.

कर्ज़ खाने में पड़ने वाले नमक जैसा है. जितना चाहिए उतना पड़े, तो स्वाद बढ़ जाता है. ज़्यादा पड़ जाए, तो बाक़ी सारा स्वाद दब जाता है.

कंपनियों के उधार लेने के साथ भी यही बात है. इसमें कोई शक़ नहीं कि कर्ज़ कंपनी का जोखिम बढ़ा देता है. पर अगर वो सोच-समझकर लिया गया हो, तो शेयरहोल्डरों की कमाई भी बढ़ा सकता है.

इसे दूसरी तरह से कहें, तो कर्ज़ का सही इस्तेमाल किसी कंपनी के ROE को उसके ROCE से कहीं ऊपर ले जा सकता है. पर ऐसा क्यों होता है, यह समझने से पहले आइए जानें कि ये दोनों नंबर असल में क्या बताते हैं.

ROE और ROCE नापते क्या हैं

ROE बताता है कि शेयरहोल्डरों के लगाए हर रुपये पर कंपनी कितना मुनाफ़ा कमाती है.

ROE = टैक्स के बाद मुनाफ़ा (PAT) ÷ शेयरहोल्डरों की औसत इक्विटी

ROCE पूरे कारोबार में लगे कैपिटल (इक्विटी और कर्ज़, दोनों को मिलाकर) पर रिटर्न देखता है.

ROCE = ब्याज और टैक्स से पहले की कमाई (EBIT) ÷ लगाया गया औसत कैपिटल

आसान शब्दों में कहें, तो ROE यह पूछता है कि कंपनी शेयरहोल्डर्स के पैसे का इस्तेमाल कितने अच्छे से कर रही है. और ROCE यह पूछता है कि कारोबार में लगे पूरे पैसे का इस्तेमाल कितने अच्छे से हो रहा है, चाहे वो पैसा शेयरहोल्डरों का हो या उधार का.

और यही फ़र्क़ यह भी बता देता है कि आमतौर पर ROCE, ROE से ज़्यादा क्यों रहता है. ROCE ब्याज चुकाने से पहले का मुनाफ़ा नापता है. और ROE वो मुनाफ़ा नापता है जो ब्याज और टैक्स, दोनों चुकाने के बाद शेयरहोल्डरों के लिए बचता है. यानी कैपिटल पर जो कमाई होती है, शेयरहोल्डरों तक पहुंचने से पहले उसका एक हिस्सा ब्याज और टैक्स खा जाते हैं.

पर कभी-कभी ROE, ROCE से आगे निकल जाता है. और जब ऐसा होता है, तो उसके पीछे अक्सर कर्ज़ ही होता है.

आंकड़े यह बात साफ़ कर देते हैं

हमने शुरुआत सभी लिस्टेड कंपनियों से की, और उनमें से बैंक, NBFC और बीमा कंपनियों को अलग कर दिया. वजह यह कि उनके लिए उधार का पैसा कोई विकल्प नहीं होता, वो उनका कच्चा माल होता है. इसलिए उन पर ROCE का पैमाना कम काम आता है. होल्डिंग कंपनियों को भी हमने अलग रखा.

इसके बाद बची कंपनियों में से हमने वो चुनीं जिनका मार्केट कैप ₹10,000 करोड़ से ज़्यादा है, और जिनका ROE और ROCE, दोनों 12% से ऊपर हैं. यह हमने दो तरह से देखा- तीन साल के औसत पर और आज के आंकड़ों पर. इसके बाद हमारे पास 312 कंपनियां बचीं. नीचे की तस्वीर बताती है कि हमें क्या मिला.

उन 312 कंपनियों में से 91% में ROCE ज़्यादा निकला, यानी वही आम बात. और सिर्फ़ 9% में, यानी 28 कंपनियों में, ROE ज़्यादा था.

और उन 28 कंपनियों पर कर्ज़ साफ़ तौर पर ज़्यादा निकला. उनका औसत डेट-टू-इक्विटी (D/E) रेशियो 0.89 गुना रहा. जबकि जिन कंपनियों में ROCE आगे था, उनका यही रेशियो सिर्फ़ 0.20 गुना था.

कर्ज़ शेयरहोल्डर्स का रिटर्न कैसे बढ़ा देता है

मान लीजिए आपने ₹100 एक ऐसे कारोबार में लगाए, जो अपने कैपिटल पर 20% कमाता है. तो साल भर में वो ₹20 बनाएगा और वो पूरे ₹20 आपके हैं.

अब मान लीजिए कंपनी आपके ₹100 के साथ ₹100 उधार भी ले आई. अब वो ₹200 पर काम कर रही है, उसी 20% की दर से. तो उसने ₹40 कमाए. और उस उधार का ब्याज ₹8 पड़ा, यानी 8% की दर से. तो सब चुकाने के बाद आपके हाथ ₹32 आए.

अब यहां ग़ौर कीजिए. कारोबार तो वही है, और वो अपने कैपिटल पर आज भी 20% ही कमा रहा है. इसलिए उसका ROCE नहीं बदला. पर आपको अपने उन्हीं ₹100 पर ₹20 की जगह ₹32 मिल रहे हैं.

यानी कंपनी ने 8% पर उधार लिया, उस पैसे को 20% कमाने वाले काम में लगाया, और बीच का फ़र्क़ आपको दे दिया. इसी को फ़ाइनेंशियल लिवरेज कहते हैं.

अब उन 28 कंपनियों में से टॉप 10 देखिए, जिनका ROE, ROCE से ज़्यादा रहा. और यह दोनों तरह से देखा गया है, तीन साल के औसत पर और आज के आंकड़ों पर.

जब ROE आगे निकल जाता है

उन 28 कंपनियों में से 10, जिनका तीन साल का औसत ROE, ROCE से ज़्यादा रहा.

कंपनी सेक्टर 3 साल का औसत ROE (%) 3 साल का औसत ROCE (%) मार्केट कैप (₹ करोड़) D/E
Aegis Vopak Terminals एनर्जी और यूटिलिटीज़ 21.9 12.3 29,140 0.62
Adani Power एनर्जी और यूटिलिटीज़ 45 25.7 3,95,818 0.82
Hindustan Petroleum Corporation एनर्जी और यूटिलिटीज़ 30.7 19.6 77,165 0.78
Schneider Electric Infrastructure एनर्जी और यूटिलिटीज़ 59.6 39.4 28,573 0.58
Titan Company कंज़्यूमर डिस्क्रेशनरी 34.1 22.6 4,47,799 1.76
Fujiyama Power Systems एनर्जी और यूटिलिटीज़ 36.2 24.9 13,541 0.88
Tilaknagar Industries कंज़्यूमर स्टेपल्स 38.2 26.8 13,680 0.05
CCL Products (India) कंज़्यूमर स्टेपल्स 17.1 13.8 14,723 0.56
Sky Gold And Diamonds कंज़्यूमर डिस्क्रेशनरी 23.3 19.2 12,006 0.89
Suzlon Energy इंडस्ट्रियल्स 44.7 38.3 64,178 0.03
इसमें वो कंपनियां हैं जिनका मार्केट कैप ₹10,000 करोड़ से ज़्यादा है, और तीन साल का औसत ROE और ROCE, दोनों कम से कम 12% था. टेबल में टॉप 10 वो कंपनियां हैं, जिनके तीन साल के औसत ROE और ROCE के बीच प्रतिशत में सबसे ज़्यादा फ़र्क़ है. D/E के आंकड़े FY25-26 के हैं और मार्केट कैप 2 सितंबर 2026 तक का है.

इस लिस्ट में एक बात ध्यान खींचती है. इन 10 में से 5 कंपनियां एक ही सेक्टर की हैं, यानी एनर्जी और यूटिलिटीज़ की. ये वो कारोबार हैं जिनमें ख़ासा ज़्यादा कैपिटल लगता है और शुरू में ही प्लांट और स्ट्रक्चर पर बड़ा पैसा लगाना पड़ता है. इसलिए इनके लिए कर्ज़ पैसा जुटाने का एक आम रास्ता बन जाता है.

पर वजह सिर्फ़ कर्ज़ ही नहीं है

ऐसी कंपनियों पर कर्ज़ आम बात है, पर हर बार वही पूरी कहानी नहीं होती. ROE को ऊपर ले जाने में कुछ और बातें भी अपना हाथ लगाती हैं.

  • पहली वजह, वो कमाई जो कारोबार से नहीं आती. जैसे बचे हुए कैश पर मिला ब्याज, ख़ाली पड़ी जगह से आया किराया, या किसी सहयोगी कंपनी के मुनाफ़े में मिला हिस्सा. ये सब शुद्ध मुनाफ़े में जुड़ जाते हैं, इसलिए ROE भी बढ़ा देते हैं. पर ये उस ऑपरेटिंग मुनाफ़े में नहीं जुड़ते, जिससे ROCE निकाला जाता है.
  • दूसरी वजह, टैक्स. आमतौर पर ROCE आगे रहने की एक वजह टैक्स ही होता है, क्योंकि ROCE टैक्स से पहले नापा जाता है और ROE टैक्स के बाद. पर यहां एक पेच है. जो कंपनी सालों के घाटे से बाहर आ रही हो, वो अपने खातों में एक डिफ़र्ड टैक्स क्रेडिट दिखा सकती है, जब उसे आगे मुनाफ़ा होने के आसार दिखने लगें. इससे उसका PAT, टैक्स से पहले के मुनाफ़े से भी ऊपर जा सकता है. यानी ROE बढ़ जाता है, और ROCE वैसा ही रहता है.

Suzlon Energy इसका उदाहरण है. उसका PAT, टैक्स से पहले के मुनाफ़े (PBT) से ज़्यादा निकला और वजह यही टैक्स का फ़ायदा रहा. जबकि उस पर कर्ज़ बहुत कम है. हालांकि यह उछाल कुछ ही समय का लगता है. जैसे-जैसे उसके पुराने घाटे इस्तेमाल होते जाएंगे, यह फ़ायदा भी ख़त्म होता जाएगा.

और तीसरी वजह, स्मॉल इक्विटी. यह अपने आप ROE को चमका देती है. सालों के घाटे कंपनी के रिज़र्व खा जाते हैं, यानी शेयरहोल्डरों का हिस्सा सिकुड़ जाता है. अब मुनाफ़ा उसी सिकुड़ी हुई इक्विटी के मुक़ाबले नापा जाता है, जो कारोबार में असल में लगी कैपिटल से कहीं छोटी है. इसलिए ROE बड़ा दिखता है.

निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है

पहली बात, अगर ROE, ROCE से कम है, तो यह कोई ख़तरे की घंटी नहीं है. यही आम बात है, और ज़्यादातर कंपनियों में यही दिखता है.

और जब ROE, ROCE से ऊपर चला जाए, तो उसकी वजह अक्सर कर्ज़ ही होती है. सोच-समझकर इस्तेमाल हो, तो कर्ज़ शेयरहोल्डरों की कमाई बढ़ा देता है. और लापरवाही से इस्तेमाल हो, तो जब बाज़ार सुस्त पड़े या कारोबार मुश्किल में आए, तो वही कर्ज़ तकलीफ़ को कई गुना कर देता है.

इसलिए जब ROE, ROCE से काफ़ी ऊपर दिखे, तो वजह पूछिए. क्या कंपनी अपने कर्ज़ का सही इस्तेमाल कर रही है? या फिर ROE की वो चमक किसी सिकुड़ी हुई इक्विटी, कारोबार से बाहर की कमाई, या एक बार मिले टैक्स क्रेडिट की वजह से है?

और यही वजह है कि इस रेशियो को किसी झटपट स्क्रीन में नहीं, बल्कि लंबे समय की सोच के साथ इस्तेमाल करना चाहिए. कोई ज़्यादा रिटर्न आपको बस एक नंबर बता देता है. पर उसके पीछे की वजह जानने से आपको यह पता चलता है कि वो नंबर पांच साल बाद भी वहां रहेगा या नहीं.

सीधे शब्दों में कहें, तो सिर्फ़ यह मत देखिए कि रिटर्न कितना ज़्यादा है. यह देखिए कि उसे ऊपर क्या ले जा रहा है.

यह भी पढ़ें: ज़्यादा ROCE किसी अच्छे शेयर की गारंटी क्यों नहीं है?

ये लेख पहली बार सितंबर 07, 2026 को पब्लिश हुआ.

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