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₹10 का फ़ंड सस्ता लग सकता है, पर है नहीं: NAV के भ्रम को समझिए

म्यूचुअल फ़ंड का NAV उसकी क़ीमत नहीं बताता, तो फिर आपको असल में किस बात पर ध्यान देना चाहिए

म्यूचुअल फ़ंड का NAV उसकी क़ीमत नहीं बताता, तो फिर आपको असल में किस बात पर ध्यान देना चाहिएAnand Kumar/AI-Generated Image

सारांशः कम NAV सस्ता लगता है. सस्ता है नहीं और कभी था भी नहीं. यह लेख बताता है कि फ़ंड के NAV का उससे मिलने वाले रिटर्न से कोई लेना-देना क्यों नहीं है, ₹10 के NFO जान-बूझकर उस क़ीमत पर क्यों लॉन्च किए जाते हैं और अगर कोई आपको कम NAV के नाम पर फ़ंड बेच रहा है तो इसे सावधानी का संकेत क्यों मानना चाहिए.

क़रीब पांच-छह साल पहले, मेरे एक पड़ोसी ने अपने म्यूचुअल फ़ंड इन्वेस्टमेंट्स को लेकर मुझसे मदद मांगी. मैंने उनका पोर्टफ़ोलियो देखा तो पाया कि उनका एक मिड-कैप फ़ंड कुछ ठीक नहीं लग रहा. मैंने उन्हें किसी दूसरे फ़ंड का नाम बताने के बजाय Value Research Online पर जाकर ख़ुद कोई विकल्प खोजने के लिए प्रोत्साहित किया.

कुछ दिन बाद उन्होंने मुझे बताया, उन्होंने तय कर लिया है कि उस मिड-कैप फ़ंड का सबसे बेहतर विकल्प एक लिक्विड फ़ंड है. जब मैंने पूछा कि वे इस नतीजे पर कैसे पहुंचे, तो उन्होंने बताया कि उस लिक्विड फ़ंड को Value Research से फ़ाइव-स्टार रेटिंग मिली है और दोनों के NAV लगभग बराबर हैं, एक ₹37 का और दूसरा ₹35 का.

जो लोग म्यूचुअल फ़ंड को समझते हैं, उनके लिए यह एक बेतुका ख़याल है, लेकिन उन्हें यह बिल्कुल स्वाभाविक लगा. ध्यान दीजिए, मैं उनका मज़ाक नहीं उड़ा रहा. वे एक सफल बिज़नेसमैन हैं जिन्होंने शुरुआत शून्य से की और सिर्फ़ 15-20 साल में सफलता हासिल की. वे पैसे को अच्छी तरह समझते हैं, वैसे ही जैसे एक एंटरप्रेन्योर समझता है. यही बात मेरे ज़हन में अटकी रह गई. अगर उन जैसा कोई इंसान इस नतीजे पर पहुंच सकता है, तो यह ग़लती अक़्ल की नहीं है. यह शब्दावली की है.

क़ीमत वाली दिक़्क़त

असल में, इसका दोष हम सब पर जाता है जो फ़ंड की बात करते वक़्त NAV (नेट एसेट वैल्यू) के बारे में बात करने का तरीक़ा अपनाते हैं. हम इसे फ़ंड की 'क़ीमत' कहते हैं, जिसे चुकाकर आप फ़ंड यूनिट 'ख़रीदते' हैं. अगर आपको ₹5 लाख की एक कार ख़रीदनी हो और आपसे कहा जाए कि कोई विकल्प खोजो, तो आप ऐसी दूसरी कारें खोजना शुरू करेंगे जिनकी क़ीमत भी क़रीब ₹5 लाख हो. अगर NAV को ग़लत तरीक़े से फ़ंड की क़ीमत कहा जाता रहेगा, तो लोग इस शब्द का जो मतलब समझते हैं, वही मानसिक मॉडल म्यूचुअल फ़ंड पर भी लागू करेंगे. इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं.

यह दिक़्क़त न्यू फ़ंड ऑफ़र यानी NFO के साथ और बड़ी हो जाती है, जो ₹10 पर लॉन्च किए जाते हैं. इसके पीछे कोई अकाउंटिंग या रेगुलेटरी वजह नहीं है. कोई फ़ंड ₹100 या ₹1,000 से भी शुरू हो सकता है. जब कोई फ़ंड ₹10 पर लॉन्च होता है और उसी कैटेगरी के पुराने फ़ंड ₹80 या ₹300 या जो भी हो, उस लेवल पर हों, तो निवेशकों के दिमाग़ में वही कार-शोरूम वाला मॉडल काम करने लगता है. नया फ़ंड सस्ता दिखता है. पुराना फ़ंड महंगा दिखता है. असल में दोनों में से कोई बात सच नहीं.

NAV फ़ंड की क़ीमत नहीं है और अगर कोई आपको कम NAV के आधार पर फ़ंड बेच रहा है, तो हो सकता है वह आपको गुमराह कर रहा हो.

सीधा-सा हिसाब

इस भ्रम को तोड़ना आसान है. मान लीजिए दो फ़ंड हैं जिनका पोर्टफ़ोलियो बिल्कुल एक जैसा है, एक का NAV ₹10 है और दूसरे का ₹500. आप दोनों में ₹5,000 निवेश करते हैं, तो पहले में आपके पास 500 यूनिट होंगी और दूसरे में 10 यूनिट. अब मार्केट चढ़ता है और दोनों पोर्टफ़ोलियो में 10 प्रतिशत का फ़ायदा होता है. आपके ₹5,000, दोनों ही फ़ंड में ₹5,500 बन जाते हैं. यहां सिर्फ़ एक चीज़ मायने रखती है, पोर्टफ़ोलियो, यानी फ़ंड मैनेजर का हुनर और क़ाबिलियत. NAV का इससे कोई लेना-देना नहीं.

NFO का भ्रम

पांच साल पहले मैंने कहा था कि इसका दोष इस बात पर है कि इंडस्ट्री, सेल्समैन और एक्सपर्ट NAV के बारे में किस तरह बात करते हैं, न कि निवेशकों पर. आज मैं इससे भी सख़्त राय रखूंगा. यह ₹10 वाले NFO का भ्रम दरअसल एक ऐसी ग़लतफ़हमी है जो म्यूचुअल फ़ंड कंपनियों और सेल्सपर्सन के काम आती है. वे जानते हैं कि ₹10 की यह 'क़ीमत' निवेशकों की सोच पर क्या असर डालती है, इसलिए यह बदलने वाला नहीं. ज़रा देखिए NFO कब लॉन्च होते हैं. ये तब आते हैं जब मार्केट पहले ही काफ़ी ऊपर जा चुका होता है, जब निवेशक ख़ुद चलकर आते हैं. यह इत्तेफ़ाक़ नहीं है. जिसने कभी कोई फ़ंड नहीं ख़रीदा, उसे ₹10 की यूनिट बेचना इस बिज़नेस में सबसे आसान सेल है.

कुछ अपवाद ज़रूर हैं. कुछ साल पहले, जब भारतीय निवेशकों को पहली बार विदेश में निवेश करने का मौक़ा मिला, तब सारे विकल्प नए फ़ंड ही थे. वे एक ऐसे मार्केट में निवेश कर रहे थे जिसकी साख पहले से साबित थी. वे फ़ंड ऑफ़ फ़ंड्स के ज़रिए निवेश कर रहे थे और जिन संबंधित फ़ंड्स में पैसा जा रहा था, उनका अपना एक इतिहास था. ऐसे मामले आगे भी हो सकते हैं. लेकिन टेस्ट वही रहता है: क्या पोर्टफ़ोलियो में ऐसा कुछ है जो किसी मौजूदा फ़ंड से नहीं मिल सकता? अगर जवाब न है, तो समझ लीजिए कि सिर्फ़ ₹10 का आंकड़ा ही बेचा जा रहा है.

चेतावनी के संकेत 

बुनियादी सोच ही ग़लत है. किसी फ़ंड में निवेश का फ़ैसला लेते वक़्त कम या ज़्यादा NAV को कोई अहमियत नहीं देनी चाहिए. असल में, यह सोच इतनी ज़्यादा ग़लत है कि इसका इस्तेमाल एक अच्छे इंडिकेटर की तरह किया जा सकता है, यह पहचानने के लिए कि कौन-सा फ़ंड सेल्सपर्सन या 'एडवाइज़र' आपको जान-बूझकर गुमराह कर रहा है. तो यह बात याद रखिए: जो कोई भी आपसे कहे कि कम NAV की वजह से यह फ़ंड चुनो, वह आपको गुमराह कर रहा है और आपको उस शख़्स या संस्था से दूर हो जाना चाहिए.

इस नियम में कोई अपवाद नहीं है.

यह आर्टिकल मूल रूप से Mint में 6 सितंबर, 2026 को प्रकाशित हुआ था.

यह भी पढ़ेंः म्यूचुअल फ़ंड निवेश में NAV कम होने का क्या मतलब है?

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