फंड वायर

SEBI ऑक्शन को ठीक कर रहा है, मगर सही हिस्से पर ध्यान देना चाहिए

भारत के मार्केट में ऑक्शन के ज़रिए क्लोज़िंग शुरू हुए एक महीना बीतने के बाद, अब SEBI कह रहा है कि वह एक्सपायरी के दिन फ्यूचर्स और ऑप्शंस के सेटलमेंट का तरीक़ा बदलेगा, ख़राबी ऑक्शन में नहीं बल्कि ऑर्डर कैंसल करने की एक विंडो में थी

भारत के मार्केट में ऑक्शन के ज़रिए क्लोज़िंग शुरू हुए एक महीना बीतने के बाद, अब SEBI कह रहा है कि वह एक्सपायरी के दिन फ्यूचर्स और ऑप्शंस के सेटलमेंट का तरीक़ा बदलेगा, ख़राबी ऑक्शन में नहीं बल्कि ऑर्डर कैंसल करने की एक विंडो में थीUjjal Das/AI-Generated Image

सारांशः SEBI का आरोप है कि 13 अगस्त को दो पक्षों ने कैश मार्केट में सिर्फ़ ₹57 लाख लगाकर सेंसेक्स की क्लोज़िंग को 240 पॉइंट खिसका दिया और ऑप्शंस में ₹3.68 करोड़ कमा लिए. ऑक्शन की पारदर्शिता ने इसे छह दिन के भीतर पकड़ लिया. कमज़ोरी एक ऐसी विंडो में है जो किसी बड़े ऑर्डर को रखने और कुछ सेकंड बाद कैंसल करने की छूट देती है. इस विंडो को बंद किया जाना चाहिए. लेकिन SEBI ने इसके बजाय डेरिवेटिव्स के सेटलमेंट प्राइस को बदलने का इशारा किया है, जिससे एक ही मार्केट के लिए दो क्लोज़िंग प्राइस बन सकते हैं. लंबे समय के निवेशकों को कुछ नहीं करना है, लेकिन इस सुधार का बचाव किया जाना ज़रूरी है.

एक महीना पहले हमने लिखा था कि मार्केट की क्लोज़िंग अब एक ऑक्शन बन चुकी है. 30 साल तक क्लोज़िंग प्राइस पिछले आधे घंटे के ट्रेड्स का औसत होता था, यानी एक ऐसी क़ीमत जिस पर असल में किसी ने ट्रेड ही नहीं किया. 3 अगस्त से F&O सेगमेंट के स्टॉक्स में सामान्य ट्रेडिंग दोपहर 3:15 बजे रुक जाती है, सारे ऑर्डर एक ही पूल में जमा होते हैं और एक्सचेंज वह एक क़ीमत तलाशता है जिस पर सबसे ज़्यादा शेयर बिकते हैं.

हमने कहा था कि यह बदलाव अच्छा है, क्योंकि अब कोई इंडेक्स फ़ंड ठीक उसी क़ीमत पर ट्रेड कर सकता है जिस पर उसका इंडेक्स बना है. हमने एक जोख़िम की तरफ़ भी इशारा किया था. पहला दिन थोड़ा गड़बड़ रहा, लेकिन वह एक्सपायरी का दिन नहीं था. असल में, एक्सपायरी के दिन असली पैसा दांव पर लगता है.

इसमें सिर्फ़ 10 दिन लगे.

13 अगस्त को क्या हुआ

13 अगस्त को सेंसेक्स की वीकली एक्सपायरी थी. SEBI के 19 अगस्त के अंतरिम आदेश के मुताबिक़, ऑक्शन के शुरुआती दो सेकंड में एक फॉरेन पोर्टफ़ोलियो इन्वेस्टर (FPI) ने सेंसेक्स के सभी 30 स्टॉक्स में ₹66.58 करोड़ के बाय ऑर्डर लगा दिए, यह उन सेकंड्स में आए कुल बाय ऑर्डर का 99.91 प्रतिशत था और हर ऑर्डर 3 प्रतिशत की ऊपरी सीमा पर रखा गया था. इंडेक्स 362 पॉइंट उछल गया. दोपहर 3:26 बजे इस पक्ष ने सात सेकंड पहले रखे गए ₹98.12 करोड़ के ऑर्डर कैंसल कर दिए. उसके पास कॉल ऑप्शंस थे और उसने क़रीब 78,000 के स्ट्राइक पर पुट ऑप्शंस लिख रखे थे. ज़्यादा क्लोज़िंग प्राइस से दोनों तरफ़ फ़ायदा होता.

एक घरेलू ब्रोकर ने यही ट्रेड उल्टी दिशा में किया. उसने सेंसेक्स के आठ स्टॉक्स में 12.65 लाख शेयरों के सेल ऑर्डर लगाए, जिनमें ज़्यादातर रेफरेंस प्राइस से काफ़ी नीचे थे और फिर तीन सेकंड के भीतर सारे ऑर्डर कैंसल कर दिए.

SEBI का हिसाब यह है कि सेंसेक्स 78,080 पर बंद हुआ, जबकि उस दिन निफ़्टी की चाल के हिसाब से यह क़रीब 77,840 पर बंद होना चाहिए था. इस 240 पॉइंट के अंतर पर कैश मार्केट में क़रीब ₹57 लाख ख़र्च हुए. ऑप्शंस में मुनाफ़ा ₹3.68 करोड़ का हुआ, जिसे ज़ब्त कर लिया गया है. ये शुरुआती निष्कर्ष हैं और दोनों पक्षों को जवाब देने का मौक़ा मिलेगा.

कमी ऑक्शन में नहीं है

पुराने औसत सिस्टम में ये ऑर्डर हज़ारों ट्रेड्स के बीच कहीं खो जाते. ऑक्शन हर सेकंड एक इंडिकेटिव प्राइस पब्लिश करती है और इसी वजह से SEBI की निगरानी इन उछालों को पकड़ पाई. जिस पारदर्शिता की शिकायत अब ट्रेडर कर रहे हैं, असल में उसी ने इस ट्रेड को पकड़ा.

डिज़ाइन की कमी बहुत छोटी है. मार्केट ऑर्डर दोपहर 3:25 बजे फ़्रीज़ हो जाते हैं, लेकिन लिमिट ऑर्डर रैंडम क्लोज़िंग तक रखे और कैंसल किए जा सकते हैं. दोनों पक्षों ने इसी विंडो का इस्तेमाल किया. न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज क्लोज़िंग से 10 मिनट पहले कैंसलेशन फ़्रीज़ कर देता है. हॉन्ग कॉन्ग आख़िरी मिनटों में इन्हें रोक देता है. अगर भारत में यह फ़्रीज़ लिमिट ऑर्डर तक भी बढ़ा दिया जाए, तो 13 अगस्त वाला ट्रेड मुमकिन ही नहीं होगा. इसके लिए बस एक सर्कुलर में एक लाइन जोड़नी होगी.

SEBI ने इसके बजाय क्या ऐलान किया

3 सितंबर को SEBI ने कहा कि उसने ब्रोकर्स, प्रॉप्राइटरी ट्रेडर्स, विदेशी निवेशकों, म्यूचुअल फ़ंडों और, उसके अपने शब्दों में, सोशल मीडिया से भी फ़ीडबैक लिया है. जिस चिंता का ज़िक्र उसने किया, वह ऑर्डर कैंसल करने वाली विंडो नहीं थी. वह थी "CAS के ज़रिए तय होने वाली क्लोज़िंग प्राइस के आधार पर एक्सपायरी पर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट प्राइस का निर्धारण". अब एक कंसल्टेशन पेपर एक हफ़्ते के भीतर आने वाला है.

यह ऑक्शन को ठीक करने का प्रस्ताव नहीं है. यह डेरिवेटिव्स के सेटलमेंट के लिए ऑक्शन की क़ीमत का इस्तेमाल बंद करने का प्रस्ताव है, जिसका मतलब होगा एक ही स्टॉक के लिए एक ही दिन में दो क्लोज़िंग प्राइस.

आर्बिट्राज़ फ़ंड की समस्या

आर्बिट्राज फ़ंड एक स्टॉक ख़रीदता है और उसका फ्यूचर बेचता है. इस कैटेगरी में अभी क़रीब ₹3 लाख करोड़ लगे हैं और यह पूरा खेल एक ही यक़ीन पर टिका है कि एक्सपायरी पर स्टॉक और फ्यूचर एक ही क़ीमत पर मिलते हैं. यही वजह थी कि अगस्त में हमने निवेशकों से कहा था कि वे NAV में आए उछाल को नज़रअंदाज़ कर धैर्य रखें.

अगर स्टॉक की वैल्यू ऑक्शन के क्लोज़िंग प्राइस पर तय हो, लेकिन फ्यूचर का सेटलमेंट औसत क़ीमत पर हो, तो दोनों पक्ष आपस में मेल नहीं खाएंगे. फिर हर एक्सपायरी पर एक अंतर बना रहेगा और यह अंतर उस कैटेगरी में NAV के उतार-चढ़ाव के तौर पर दिखेगा, जिसे निवेशक ख़ासकर इसलिए ख़रीदते हैं क्योंकि यह उबाऊ है. दो दिन की समस्या डिज़ाइन के चलते स्थायी बन जाएगी.

इंडेक्स फ़ंड की समस्या

कई इंडेक्स फ़ंड और ETF नए इनफ़्लो के बदले निफ़्टी फ्यूचर्स रखते हैं, जब तक कि वे असली स्टॉक्स नहीं ख़रीद लेते और क्लोज़िंग पर दोनों पोज़िशन ख़त्म करते हैं. यह तरीक़ा तभी काम करता है जब फ्यूचर वहीं सेटल हो जहां इंडेक्स बंद होता है. अगर दोनों को अलग कर दिया जाए, तो जो ट्रैकिंग एरर ऑक्शन ने ख़त्म की थी, वह फिर लौट आएगी.

आपको क्या करना चाहिए

अगर आप SIP के ज़रिए निवेश करते हैं और सालों तक बने रहते हैं, तो कुछ मत कीजिए.

अगर आपके पास आर्बिट्राज़ फ़ंड है, तो जहां हैं वहीं बने रहिए. एक्सपायरी पर दोनों क़ीमतों का मिलना अब भी तय है. डेरिवेटिव्स के लिए अलग सेटलमेंट प्राइस ही वह एक बदलाव है जो आपके फ़ंड के काम करने के तरीक़े को बदल सकता है, इसलिए जब कंसल्टेशन पेपर आए तो उसे ज़रूर पढ़िए.

अगर आपके पास इंडेक्स फ़ंड या ETF हैं, तो अपने फ़ंड की रिपोर्ट में आने वाले ट्रैकिंग डिफ़रेंस पर नज़र रखिए.

अगर आप F&O में ट्रेड करते हैं, तो आपकी शिकायत में दम है. एक मैनिपुलेट किया गया प्राइस असली पैसे का सेटलमेंट तय करता है. इसका इलाज ऑर्डर कैंसलेशन को फ़्रीज़ करना है, ऑक्शन से पीछे हटना नहीं.

निष्कर्ष

क्लोज़िंग ऑक्शन को शुरू होने में दो पब्लिक कंसल्टेशन और सालों की मेहनत लगी, और इसने अपने पहले मैनिपुलेटर को छह दिन के भीतर पकड़ लिया. डिज़ाइन की कमी बस एक विंडो की है, जिसे हर बड़ा मार्केट पहले ही बंद कर चुका है. SEBI पहले भी एक पैटर्न दिखा चुका है, सबसे हाल में फ़्लेक्सी-कैप फ़ंड्स के मामले में, जहां तेज़ विरोध के सामने उसने लाइन पर टिके रहने के बजाय एक एग्ज़िट रास्ता बना दिया. सही कंसल्टेशन पेपर वह होगा जो कैंसलेशन विंडो बंद करे और एक ही क्लोज़िंग प्राइस बनाए रखे. ग़लत कंसल्टेशन पेपर उन आर्बिट्राज़ और इंडेक्स फ़ंड निवेशकों पर बोझ डाल देगा, जो कभी समस्या थे ही नहीं.

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

इन 5 इक्विटी फ़ंड को मिली परफ़ेक्ट 5-स्टार रेटिंग

पढ़ने का समय 5 मिनटख्याति सिमरन नंदराजोग

NPS की स्कीम्स अब 5 कैटेगरी में, कहीं बदल न जाए आपकी पेंशन शुरू होने की तारीख़

पढ़ने का समय 6 मिनटआकार रस्तोगी

वो ग्रोथ, जो कहीं नहीं पहुंचाती

पढ़ने का समय 4 मिनटधीरेंद्र कुमार

आपके डेट फ़ंड का नाम बदल गया है, निवेशक क्या करें?

पढ़ने का समय 4 मिनटसिद्धांत माधव जोशी

भरोसा और जटिल भाषा, निवेशकों के लिए ख़तरनाक

पढ़ने का समय 5 मिनटधीरेंद्र कुमार

म्यूचुअल फंड पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

रोज़ नहीं, साल में एक बार देखें

अपने पोर्टफ़ोलियो को रोज़ लाल-हरे रंग में देखने के बजाय, साल में सिर्फ़ एक बार ध्यान से देखना काफ़ी है

These are advertorial stories which keeps Value Research free for all. Click here to mark your interest for an ad-free experience in a paid plan

दूसरी कैटेगरी