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सारांशः पिछले दो हफ़्ते से हज़ारों लोग सचमुच बेहतरीन रिसर्च कर रहे हैं. Excel शीट, बारीक शर्तें, सेटलमेंट की वो तारीख़ें जो किसी ट्रांज़ैक्शन को अगले फ़ाइनांशियल ईयर में धकेल देती हैं. ये सब एक क्रेडिट कार्ड के नियम बदलने पर हो रहा है. अब इन्हीं लोगों से पूछिए कि उनका फ़ंड हर साल उनसे कितना वसूलता है.
पिछले क़रीब दो हफ़्ते से इंडिया का पर्सनल फ़ाइनांस इंटरनेट एक ऐसी बहस में डूबा हुआ है, जिसका मार्केट, निवेश या रिटायरमेंट से कोई लेना-देना नहीं है. एक बड़े बैंक ने अपने एक प्रीमियम क्रेडिट कार्ड के नियम बदल दिए हैं. आगे से ये कार्ड सिर्फ़ उन ग्राहकों के पास रहेगा जो या तो जमकर ख़र्च करते हैं या बैंक के साथ बड़ी 'रिलेशनशिप वैल्यू' बनाए रखते हैं. बाक़ी सबका कार्ड बंद या डाउनग्रेड कर दिया जाएगा. इस पर प्रतिक्रिया ग़ज़ब की रही है. इनमें सैकड़ों मेसेज तक लंबे-लंबे थ्रेड, सुबूत के तौर पर घुमाए जा रहे रिलेशनशिप मैनेजर के ईमेल के स्क्रीनशॉट और RBI में शिकायत करने की बातें शामिल हैं.
इस गुस्से का कुछ हिस्सा जायज़ है. अगर कोई बैंक सालाना फ़ीस वसूल ले और साल पूरा होने से पहले ही ग्राहकों से कहे कि आप इस क्लब के लायक़ नहीं हैं, तो उसने एक ऐसे वादे के पैसे लिए हैं जिससे वो अब पीछे हट चुका है.
लेकिन मैं आपको इस बारे में लिखना नहीं चाहता.
मुझे जिस बात ने हैरान किया, वो थी इसमें लगाई जा रही मेहनत का स्तर. अगर आप वो थ्रेड पढ़ें, तो आपको ऐसा स्तर मिलेगा जो किसी अच्छी इन्वेस्टमेंट रिसर्च टीम के लायक़ है. लोगों ने अपने ख़र्च को ट्रैक करने के लिए एक्सेल शीट बना ली हैं. उन्हें पता है कि कौन-कौन सी कैटेगरी गिनी जाती है और सेटलमेंट कैसे किसी ट्रांज़ैक्शन को अगले फ़ाइनेंशियल ईयर में धकेल सकता है. उन्होंने सारी बारीक शर्तें पढ़ी हैं और समझी भी हैं. ये उस सवाल पर लगातार चलने वाला आंकड़ों से भरा विश्लेषण है, जो उनके लिए बहुत अहम है.
अब इन्हीं लोगों में से किसी एक से पूछिए कि उनके म्यूचुअल फ़ंड का एक्सपेंस रेशियो क्या है या उनका पोर्टफ़ोलियो इक्विटी और फ़िक्स्ड इनकम में कैसे बंटा है. मैंने ऐसे प्रयोग किए हैं और मुझे जवाब पता है.
इसकी वजह बेवक़ूफ़ी या आलस नहीं है. क्रेडिट कार्ड का प्रोग्राम एक ऐसे गेम की तरह बनाया जाता है जिसका फ़ायदा फ़ौरन मिलता है. आप कोई जुगाड़ लगाते हैं, उसी महीने फ़ायदा मिल जाता है (असल में वो आपसे और ख़र्च करा लेता है). तब आपको लगता है कि आपने कुछ जीत लिया. निवेश में ऐसा कोई रोमांच नहीं है. इस हफ़्ते नतीजा देने वाले गेम और 20 साल में नतीजा देने वाले गेम में से चुनने को कहा जाए, तो लोग तेज़ गेम चुनेंगे. फ़ाइनांशियल इंडस्ट्री यह बात अच्छी तरह जानती है.
सुस्त गेम का हिसाब लगाना भी फ़ायदे का काम है. ₹50 लाख के पोर्टफ़ोलियो पर, साल का 0.5 प्रतिशत लेने वाले फ़ंड और 1.5 प्रतिशत लेने वाले फ़ंड के बीच का फ़र्क़ पहले ही साल में ₹50,000 है. चूंकि ये रक़म कभी निवेश ही नहीं होती, इसलिए हर अगले साल ये फ़ासला बढ़ता जाता है. दो हफ़्ते की वो मेहनत, अगर अपने फ़ंड की लागत और एसेट एलोकेशन पर लगाई जाए, तो वो उन सारे रिवॉर्ड पॉइंट से ज़्यादा क़ीमती है जो आप ज़िंदगी भर में कमाएंगे.
बैंक के ख़ुद के नोटिस में कार्डहोल्डर्स से कहा गया कि ये कार्ड एक प्रोडक्ट नहीं, बल्कि एक रिश्ते का आईना है. बात बिल्कुल सही है और दिक़्क़त भी बिल्कुल यही है. रिश्ता वो चीज़ है जिसे सामने वाला कभी भी ख़त्म कर सकता है.
तो इनमें से असल में आपका क्या है? पॉइंट, टियर, लाउंज एक्सेस और रिलेशनशिप स्टेटस आपकी संपत्ति नहीं हैं. लॉयल्टी प्रोग्राम इसीलिए होता है कि सामने वाला ज़्यादा पैसा कमा सके और शर्तें इसी बात को पक्का करने के लिए लिखी जाती हैं.
म्यूचुअल फ़ंड में आपकी यूनिट और किसी कंपनी में आपके शेयर आपके हैं. आपको कभी ऐसा ईमेल नहीं आएगा कि पर्याप्त सक्रियता न बनाए रखने के चलते आपको बाहर कर दिया गया है. कोई स्कीम मर्ज हो सकती है या बंद हो सकती है, लेकिन पैसा आपका ही रहता है और आपके पास लौट आता है. वैल्यू घटेगी-बढ़ेगी, लेकिन वो मार्केट का चलना है, किसी बैंक का आपसे हक़ छीनना नहीं.
मैं आपसे ये नहीं कह रहा कि अपने कार्ड काटकर फेंक दें. मैं अपना कार्ड लगभग रोज़ इस्तेमाल करता हूं. लेकिन ये फ़ायदे उस ख़र्च का हल्का-फुल्का साइड इफ़ेक्ट होने चाहिए जो आप वैसे भी करते. अगर आप ख़ुद को बैंक के तय किए किसी टारगेट तक पहुंचने के लिए मेहनत करते पाएं, तो समझ लीजिए कि यही वक़्त है उस ऊर्जा को अपने पोर्टफ़ोलियो की तरफ़ मोड़ने का. उसे आपसे कोई छीन नहीं सकता. लेकिन उसकी अनदेखी ज़रूर हो सकती है.
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