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साइज़ मायने नहीं रखता, अक्सर

लंबे समय से, ये आम धारणा रही है कि बड़े फ़ंड बेहतर होते हैं. आख़िर कितना सच है ये?

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अपने-आप में, म्यूचुअल फ़ंड के साइज़ की बहुत अहमियत नहीं होनी चाहिए, और आमतौर पर होती भी नहीं है. हालांकि, निवेशकों में इसके ठीक उलट एक गहरा पूर्वाग्रह होता है. वैसे बात जब फ़ाइनेंशियल सर्विस (और कई दूसरे व्यवसायों) की आती है, तो कस्टमर साइज़ पसंद करते हैं. लोगों को लगता है कि एक बड़ी दुकान, एक बड़ी रिटेल चेन या एक बड़ा न्यूज़पेपर बेहतर सामान या सर्विस देता है. इसका तर्क ये दिया जाता है कि एक बिज़नस तभी बड़ा होता है जब उसके कस्टमर ख़ुश होते हैं. हालांकि, हर मामले में सच ये हो भी सकता है या नहीं भी.

मगर, म्यूचुअल फ़ंड के मामले में निश्चित ही ये सच नहीं है. निवेशक अक्सर मानते हैं कि म्यूचुअल फ़ंड का साइज़ महत्वपूर्ण होता है. यहां, साइज़ का मतलब एक फ़ंड द्वारा प्रबंधित किया जाने वाला धन है. इस विश्वास का कोई वास्तविक आधार नहीं है. कोई अंतर्निहित मज़बूत कारण नहीं है कि एक बड़ा फ़ंड एक छोटे फ़ंड से बेहतर होता है. अगर एक छोटे फ़ंड का उसी तरह के बड़े फ़ंड की तुलना में बेहतर ट्रैक रिकॉर्ड है, तो हर हाल में निवेशकों को छोटा फ़ंड चुनना चाहिए. बेशक़, निवेशक सिर्फ़ विश्वास के आधार पर 'बड़ा होना अच्छा है' नहीं मानते, बल्कि इसलिए भी ऐसा समझते हैं क्योंकि बड़े फ़ंड्स बेचने वाले इस विश्वास को बढ़ावा देते हैं, क्योंकि इससे उन्हें अपने फ़ंड को किसी दूसरे बेहतर प्रदर्शन करने वाले फ़ंड के मुक़ाबले आगे दिखाने के ज़्यादा मौक़े मिल जाते हैं.

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क्या इस विचार में कोई सच्चाई है? दरअसल, वैल्यू रिसर्च डेटा दिखाता है कि छोटे फ़ंड्स की तुलना में, बड़े फ़ंड्स का अपेक्षा बेहतर प्रदर्शन का अनुपात है. हालांकि, ये कोई मज़बूत ट्रेंड नहीं है और हमेशा ऐसा होता हो, ऐसा भी नहीं है. अभी भी कई घटिया बड़े फ़ंड हैं और कई बढ़िया छोटे फ़ंड भी हैं. एक निवेशक के तौर पर, आपको कारण (cause) और प्रभाव (effect) के भ्रम जाल में नहीं पड़ना चाहिए. याद रखें, आपस में संबंध होने का मतलब कार्य-कारण (causation) नहीं है.

जिन फ़ंड्स का अच्छा प्रदर्शन का लंबा ट्रैक रिकॉर्ड होता है, वे बड़े होते जाते हैं क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा निवेशक पैसा उनमें डालते हैं, और इस पैसे को बढ़ने में लंबा समय लगने लगता है. यानी, वे अच्छे थे, इसलिए वे अंततः बड़े हो गए. हालांकि, इसका उलटा सच नहीं है. और आप यूं ही एक बड़ा फ़ंड नहीं चुन कर ये नहीं कह सकते कि क्योंकि ये बड़ा है, ये अच्छा ही होगा. इसी तरह, आप अच्छे प्रदर्शन वाले छोटे फ़ंड को चुन कर ये नहीं कह सकते कि इसका प्रदर्शन मायने नहीं रखता और आपको इसमें निवेश नहीं करना चाहिए क्योंकि ये छोटा है.

अच्छे प्रदर्शन के अलावा, ऐसे कई कारण हैं जो किसी फ़ंड को बड़ा बना सकते हैं या उसे छोटा रख सकते हैं. दरअसल, किसी बड़ी फ़ंड कंपनी की मार्केटिंग क्षमता या फ़ंड डिस्ट्रीब्यूटरों के बीच उसकी पैरेंट कंपनी की पहुंच और असर इसके सबसे बड़े कारण हैं. इसके अलावा भी कई दूसरे फ़ैक्टर भी हो सकते हैं. मिसाल के तौर पर, ऐसे कई इक्विटी फ़ंड हैं, जिन्होंने पहले दिन से ही बड़ी शुरुआत की, क्योंकि मार्केट के चरम पर उनके NFO का बहुत प्रचार किया गया था. इनमें से कुछ का प्रदर्शन बहुत ख़राब रहा, लेकिन फिर भी वे बड़े हैं.

इससे भी महत्वपूर्ण ये है कि फ़ंड इंडस्ट्री में कई अपेक्षाकृत छोटे इक्विटी फ़ंड हैं, जिन्होंने लंबे समय तक अच्छा प्रदर्शन किया है और निश्चित ही देखने लायक़ हैं. जब भी कोई निवेशक ऐसे फ़ंड में निवेश करना चाहता है, या जब मेरे जैसा कोई विश्लेषक उनकी प्रशंसा करता है, तो बड़े फ़ंड बेचने वाले लोग इस विचार पर नाक-भौं सिकोड़ने के साथ बात ख़ारिज कर देते हैं. उनका विरोध होता है, "लेकिन आप ₹5,000 करोड़ के फ़ंड की तुलना ₹500 करोड़ के फ़ंड से नहीं कर सकते!". ये भ्रामक है. निवेशक के लिए, ये मायने नहीं रखता कि कोई फ़ंड छोटा है या कोई फ़ंड कंपनी फ़ंड इंडस्ट्री की रैंकिंग में नहीं आती है. अगर किसी फ़ंड का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा है और वैल्यू रिसर्च से उसे हाई रेटिंग मिली है, तो साइज़ मायने नहीं रखता.

तो क्या इसका मतलब ये है कि ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है जिसमें फ़ंड का साइज़ मायने रखता हो? नहीं, ऐसी परिस्थितियां हैं, और दिलचस्प बात ये है कि कुछ तरह के बड़े इक्विटी फ़ंड के लिए साइज़ एक नुक़सानदेह हो सकता है. मिसाल के तौर पर, स्मॉल और मीडियम-कैप स्टॉक पर ध्यान केंद्रित करने वाले फ़ंड को शायद उतने स्टॉक न मिलें जिनमें वे निवेश कर सकें. शेयर मार्केट के नेगेटिव दौर में इन फ़ंड्स को तेज़ी से घटती वैल्यू के साथ-साथ ख़राब लिक्विडिटी की दोहरी मार झेलनी पड़ सकती है. छोटी कंपनियों में निवेश करने का फ़ायदा और नुक़सान दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं—इसका फ़ंड के साइज़ से कोई सीधा संबंध नहीं है. दूसरी ओर, सेबी के हाल ही में नियमों में किए गए बदलावों का मतलब है कि बड़े फ़ंड्स के ख़र्च कम हैं और ये अपने आप में रिटर्न में थोड़ी बढ़ोतरी कर सकता है.

कुल मिला कर इसका सार ये है कि जहां कुछ फ़ैक्टर साइज़ से प्रभावित होते हैं, वहीं कई दूसरे नहीं होते. सभी बातों पर विचार करने के बाद, निवेशकों को ज़्यादा ध्यान इस पर देना चाहिए कि ट्रैक रिकॉर्ड क्या है और उनके अपने निवेश लक्ष्यों के लिए क्या सही है और क्या नहीं.

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