
पिछले सप्ताह मैंने लिखा था कि हर निवेशक के लिए अपनी रकम का एक हिस्सा फिक्स्ड इनकम में निवेश करना जरूरी है। मैंने इस बात पर जोर दिया था कि जब आप अपनी कुल रकम का बहुत छोटा हिस्सा यानी 5 या 10 फीसदी फिक्स्ड इनकम में निवेश करते हैं तो इससे आपको सुरक्षा का भ्रम होता है लेकिन यह आवंटन किसी बड़ी गिरावट की सूरत में आपको सुरक्षा देने में सक्षम नहीं होगा।
मेरा तर्क था कि पहली बात तो हर निवेशक को कुछ रकम फिक्स्ड इनकम में जरूर निवेश करनी चाहिए और दूसरा यह रकम कितनी हो इसकी कैलकुलेशन को बहुत जटिल बनाने की जरूरत नहीं है। निवेश में जोखिम और सुरक्षा को लेकर आपका जो रवैया उसके आधार पर आप फिक्स्ड इनकम में निवेश के लिए एक तिहाई, आधा, या दो तिहाई हिस्सा चुन सकते हैं और यह काफी है। इसको लेकर आपको बहुत माथापच्ची करने की जरूरत नहीं है।
इस सप्ताह हम अगले चरण के बारे में बात करेंगे कि इक्विटी अलॉकेशन कितना होना चाहिए। तार्किक आधार पर तो इक्विटी में निवेश का अनुपात भी एक तिहाई, आधा या दो तिहाई होना चाहिए। हालांकि देखने में ऐसा लगता है कि यह निवेश के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है। लेकिन इस पर ज्यादा चिंता करने की जरूरत इसलिए नहीं है क्योंकि आप युवा के तौर पर निवेश की शुरूआत करते हैं तो आम तौर पर आपके पास बहुत ज्यादा रकम नहीं होती है।
आजकल बहुत से युवा इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम यानी ईएलएसएस में छोटी एसआईपी के साथ इक्विटी निवेश में हाथ आजमाते हैं। इस तरह से उनको एक अच्छी रकम बनाने में कुछ साल लगते हैं। इस दौरान उनका फोकस टैक्स बचाने पर होता है। और जाहिर है कि यह काम निवेश के पहले साल से ही शुरू हो जाता है। ऐसे में फिक्स्ड इनकम आवंटन पर बहुत जोर देने और एक तिहाई रकम फिक्स्ड इनकम में निवेश करने के लिए एक और फंड की तलाश करने का कोई मतलब नहीं है।
मेरा मानना है कि समय के साथ जैसे जेसे आपका निवेश बढ़ता जाता है उसी हिसाब से आपके लिए फिक्स्ड इनकम आवंटन की जरूरत बढ़ती जाती है। आवंटन कितना होना चाहिए यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना जोखिम महसूस करते हैं। आपको यह सवाल अपने आप से पूछना चाहिए कि जोखिम किस तरह का है। इक्विटी मार्केट कितना गिरेगा। इस सवाल का जवाब देना असंभव है। लेकिन मैं आपको यह नियम बता सकता हूं। आपको हर एक दशक में इक्विटी निवेश की वैल्यू में 50 फीसदी तक गिरावट के लिए तैयार रहना चाहिए। यह वैल्यू अगले दो तीन साल में रिकवर करेगी।
आप कल्पना करिए कि आपके इक्विटी निवेश के साथ ऐसा हो रहा है। क्या आप निवेश के वैल्यू में बड़ी गिरावट को बर्दाश्त कर सकते हैं। अगर जवाब न है तो इक्विटी निवेश कम रखिए। जैसे जैसे आपकी उम्र, कैरियर और निवेश आगे बढ़ता है तो उम्मीद की जाती है कि फिक्स्ड इनकम आवंटन बढ़ना चाहिए। इसका कोई तय नियम नहीं है। मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूं जो रिटायरमेंट के बाद भी 50 फीसदी इक्विटी अलॉकेशन से खुश हैं। वे अब किसी तरह की कमाई नहीं कर रहे हैं लेकिन जीवन भर इक्विटी में निवेश के अनुभव की वजह से उनको भरोसा है कि वे क्या कर रहे हैं। वे जानते हैं कि निवेश की वैल्यू में बड़ी गिरावट आती है लेकिन यह फिर और मजबूती के साथ वापसी करती है। वहीं तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। बहुत से युवा ऐसे हैं जो निवेश की वैल्यू में गिरावट की कल्पना से भी डर जाते हैं।
अंत में सवाल अपनी मनोदशा के आंकलन और यह जानने का है कि कौन सी चीज आपको असहज बना रही है और कौन सी चीज आपको डरा रही है। फाइनेंशियल एडवाइजर आपको एक फार्मूले के आधार पर सही असेट अलॉकेशन का एक अनुपात दे देंगे। लेकिन मेरा मानना है कि इसका कोई मतलब नहीं है। क्योंकि इसके बारे में सबसे सही जवाब आपका दिमाग ही े सकता है। अपने आप को जान कर ही आप अपने लिए मजबूत फाइनेंशियल प्लान तैयार कर सकते हैं।






