
म्युचुअल फंड की समूची चेन में असेट मैनेजमेंट कंपनी से लेकर निवेशक तक म्युचुअल फंड बेचने वाले व्यक्ति या संगठन की सबसे अहम भूमिका है। लेकिन इसके बावजूद उसके स्वरूप में लगातार बदलाव होता रहा है। सालों के दौरान चीजें बहुत बदल गई हैं। अब इन व्यक्तियों और संगठनों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला टर्म एजेंट से वितरक और एडवाइजर तक पहुंच गया है। इन तीनों टर्म के लिए सम्मान और स्वीकार्यता का स्तर भी बढ़ा है। सेबी के नियमों में म्युचुअल फंड एडवाइजर और वितरक में साफ तौर पर अंतर किया गया है। लेकिन म्युचुअल फंड बिजनेस में लगे संगठनों के लिए यह फैसला करना मुश्किल भरा रहा है कि बेहतर बिजनेस कौन सा है वितरक या एडवाइजर।
पिछले दशक में एक बड़ा बदलाव यह हुआ है कि निवेशक और म्युचुअल फंड बेचने वाले दोनों के लिए यह संभव है कि वे इस चेन को पूरी तरह से बायपास करके निवेश के लिए सीधे म्युचुअल फंड से संपर्क कर सकते हैं। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। आजकल इंटरने आधारित कॉमर्स में यह बात है। यहां उत्पाद तैयार करने वाला अंतिम उपभोक्सा के साथ सीधे लेन देन करता है। म्युचुअल फंड दूसरी वित्तीय सेवाओं से इस मायने में अलग है कि इसमें एक खास स्तर की सलाह उत्पाद का अभिन्न अंग है।
और आजकल इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा बात हो रही है। ट्विटर पर तमाम पक्षों ने इस मसले पर मोर्चा संभाला हुआ है। पिछले कुछ दिनों के दौरान मैंने देखा है कि इस मामला काफी लोकप्रिय हो गया है। डी मुथुकृष्णन नाम का एक ट्विटर हैंडल @dmuthuk काफी लोकप्रिय हो गया है। उनके ट्वीट से पता चलता है कि वे पहले म्युचुअल फंड वितरक थे और आजकल वे निवेशक हैं। और आजकल वे म्युचुअल फंड वितरक कैसे काम करते हैं इस पर काफी बातें कह रहे हैं।
आप म्युचुअल फंड वितरक को बाइपास करते हुए सीधे म्युचुअल फंड में निवेश करके निवेशक सालाना ०.7 फीसदी बचत करता है। और अगर यह रकम सालों के हिसाब से जोड़ी जाए तो यह बड़ी बचत बन जाएगी। अब सवाल यह उठता है कि क्या वितरक या एडवाइजर सर्विसेज निवेशक को इससे ज्यादा फायदा करा सकती हैं। इस बात में कोई शक नहीं कि वे ऐसा कर सकती हैं। वास्तव में मुथुकृष्णन का कहना है कि सबसे अहम बात यह है कि क्या एडवाइजर निवेशक को निवेश बनाए रखने और बुरे समय में भी निवेश जारी रखने के लिए प्रेरित कर सकता है। लेकिन यह निवेशक को एक जोखिम भरे फंड से दूसरे जोखिम भरे फंड की यात्रा कराने के ठीक विपरीत है। एडवाजर को परखने को लेकर मुथुकृष्णन की सलाह काफी दिलचस्प है। अगर कोई म्युचुअल फंड बेचने के लिए आपसे संपर्क करता है तो आप उससे पूछें आपकी कितनी रकम कितने समय से इस फंड में है। उससे इसका सबूत मांगें। यह वास्तव में बहुत अच्छी सलाह है। नासिम निकोलस तालेब भी कुछ ऐसा रिकमेंड करते हैं। फाइनेंशियल एडवाइजर को चुप रहने के लिए कहें और उससे कहें अपना पोर्टफोलियो दिखाओ।
लेकिन मैं इसमें एक छोटी सी बात जोड़ना चाहता हूं। यह बात वितरक विरोधी भावना के उलट है। जानकार निवेशकों को हर कदम पर सलाह की जरूरत नहीं है। हालांकि जिन लोगों ने पहला कदम ही नहीं उठाया है। यानी निवेश नहीं किया है वे ऐसा तब तक नहीं करेंगे जब तक कि कोई वितरक या एडवाइजर उनको ऐसा करने के लिए प्रेरित न करे। अगर सलाह बहुत अच्छी नहीं है फिर बड़ी संख्या में म्युचुअल फंड निवेशक वितरकों और एडवाइजर की वजह से निवेशक बने हैं। पहला कदम सबसे मुश्किल होता है और यहां पर वितरको या एडवाइजर की मदद बहुत अहम हो जाती है।
जो नई स्थिति पैदा हुई है उसके साथ समस्या यह है कि छोटे निवेशकों को म्युचुअल फंड निवेश में लाने के लिए कोई आर्थिक रूप ये वहनीय बिजनेस मॉडल नहीं बचा है। और इस समस्या को तुरंत समाधान की जरूरत है।

