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बेकार नहीं जाता संकट

कोई भी संकट आने पर आम तौर पर सुधारों को आगे बढ़ाया जाता है और इससे लंबी अवधि में फायदा होता है। लेकिन निवेशकों को सही चीज करने के लिए इसका इंतजार नहीं करना चाहिए

कोई भी संकट आने पर आम तौर पर सुधारों को आगे बढ़ाया जाता है और इससे लंबी अवधि में फायदा होता है। लेकिन निवेशकों को सही चीज करने के लिए इसका इंतजार नहीं करना चाहिए


एक अच्‍छे संकट को कभी बेकार मत जाने दो। दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान विंस्‍टन चर्चिल ने यह बात कही थी। इस बयान का मतलब है कि जब संकट का समय होता है तो आप बड़े बदलाव कर सकते हैं और बड़े कदम उठा सकते हैं। वहीं आम दिनों में इस तरह के बड़े कदमों का विरोध हो सकता है। हर तरह नियामकीय माहौल में इस तरह के कदम संकट में दौर उठाए जा सकते हैं। पिछले 30 सालों में भारत में निवेश के क्षेत्र में बड़े सुधार और कड़े नियम कानून बड़े और चिंताजनक मामले सामने आने के बाद ही बनाए गए।

उदाहरण के लिए 1992 का घोटाला ऐसा ही एक मामला था जिसने स्‍टॉक एक्‍सचेंज सिस्‍टम को आधुनिक बनाने और साफ सफाई का रास्‍ता साफ किया। इसके बाद नेशनल स्‍टॉक एक्‍सचेंज बनाया गया।

एक अच्‍छे संकट को कभी बेकार मत जाने दो का एक नकारात्‍मक पक्ष भी है। नकारात्‍मक पक्ष यह है कि अगर निवेश बाजार से जुड़ी कोई चीज संकट का सामना नहीं कर रही है और इसके संकट में फंसने की आशंका बहुत कम है तो इन क्षेत्रों में समस्‍याओं का सही तरीके से समाधान नहीं होता है। भारत का डेट फंड ऐसा ही क्षेत्र है। डेट फंड को चलाने के तौर तरीकों को काफी बेहतर बनाया गया है। हालांकि डेट फंड का कारोबार जितने बड़े पैमाने पर होता है और इसके असेट बेस को देखते हुए यहां भी समस्‍याएं हैं। उदाहरण के लिए डेट फंड में बैंकों के एनपीए की तरह की कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। जबकि डेट फंड वास्‍तविक ऑपरेशन में लोन देने का काम कर चुके हैं। यह बात नियामकीय निगरानी और फंड मैनेजमेंट की गुणवत्‍ता बताती है।

हालांकि अच्‍छी सड़कों पर भी झटके लगते हैं। पिछले 14 महीने भारत के डेट फंड के लिए अप्रत्‍याशित संकटों से भरे रहे हैं। यह संकट फ्रैंकलिन टेंपलेटन म्‍युचुअल फंड द्वारा संचालित छह फंड से जुड़ा है। किसी निवेशक के लिए शायद यह खबर नहीं है। असेट मैनेजमेंट कंपनी और कुछ हद तक सभी भारतीय डेट फंड की साख पर इसका असर काफी बुरा रहा है। वास्‍तव में, म्‍युचुअल फंड के बारे में गहरी समझ न रखने वालों से बातचीत से पता चलता है कि इस संकट ने म्‍युचुअल फंड में निवेश को लेकर आम निवेशकों के भरोसे को तगड़ा झटका दिया है।

मैं यहां इस पेज पर फ्रैंकलिन मामले की सीधे बात नहीं करूंगा। हालांकि मैं एक एक करके कुछ बातें बताउंगा जो लंबी अवधि में कुछ फंड में लिक्विडिट की समस्‍या की तुलना में काफी अहम साबित होनी चाहिए। ये बातें संकट के बाद आए सुधार के कदमों से जुड़ी हैं।

अब उन सभी बातों पर नजर डालते हैं जो बदल गई हैं और इनके संभावित असर पर भी गौर करें। स्‍टॉक एक्‍सचेंज पर बंद हो चुकी यूनिट्स की लिस्टिंग: ऐसे फंड जो बंद होने की प्रक्रिया में हैं उनके लिए लिक्विडिटी चैनल। बेहतर रिस्‍क-ओ-मीटर : सुधार के बाद आया नया रिस्‍क मीटर स्‍कीम के वास्‍तविक पोर्टफोलियो पर आधारित है। प्रत्‍येक फंड में न्‍यूनतम 10 फीसदी लिक्विड असेट में एक्‍सपोजर: असर खुद बताता है। पोर्टफोलियो का 15 दिन में डिस्‍क्‍लोजर: निवेशकों और एनॉलिस्‍ट में बेहतर समझ। बॉण्‍ड का वाईटीएम डिस्‍क्‍लोजर: निवेशक को डिलीवर की जाने वाली वैल्‍यू की वैकल्पिक कीमत मुहैया कराता है। रिस्‍क-क्‍लास मैट्रिक्‍स: ये मैट्रिक्‍स फंड के क्रेडिट रिस्‍क को देखता है। इससे पोर्टफोलियो के नेचर और वास्‍तविक जोखिम का पता चलता है। संयोग से यह यह वैल्‍यू रिसर्च के अपने स्‍टाइल बॉक्‍स मैट्रिक्‍स की तरह ही है। यह हम दशकों से बना रहे हैं। कुल मिला कर कोई भी यह कह सकता है कि संकट बेकार नहीं गया है।

मैं कहूंगा कि निवेशकों को इन सुधारों में छिपी बात को पढ़ने का प्रयास करना चाहिए। इन उपायों का संदेश यह है कि डेट फंड के सामने आए संकट के लिए असेट मैनेजमेंट कंपनी के साथ निवेशक भी जिम्‍मेदार हैं। कुछ कदम ऐसे हैं जिनको अब एएमसी से उठाने की उम्‍मीद की जा रही है। हालांकि बाकी कदम निवेशकों को ज्‍यादा जानकारी मुहैया कराने से जुड़े हैं। नए वाईटीएम या मैट्रिक्‍स नियम के बारे में सोचें। अगर निवेशक इनको इस्‍तेमाल नहीं करेंगे तो इनका क्‍या उपयोग होगा। असेट मैनेजमेंट कंपनी ये जानकारी सार्वजनिक कर देगी लेकिन यह हमारे ऊपर है कि हम इन जानकारियों का इस्‍तेमाल करते हुए निवेश के बारे में बेहतर फैसले लें।

मैं बहुत भरोसे के साथ कह रहा हूं कि समूचा डेट फंड संकट निवेशकों की सिर्फ रिटर्न पर फोकस करने की प्रवृत्ति का नतीजा है। आखिर में यह हमारी रकम है और हमें सभी उपलब्‍ध टूल का इस्‍तेमाल करना चाहिए।

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