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अच्‍छा और खराब अनुभव

अनुभवी और गैर अनुभवी निवेशक के बीच अंतर सफलता के अनुभव का नहीं है बल्कि यह असफलता का है

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एक पुरानी कहावत है कि अनुभव सबसे अच्‍छा शिक्षक है। निश्चित तौर पर यह सच है लेकिन यह कहावत एक जटिलता छिपाती है - बुरा अनुभव एक अच्‍छा शिक्षक है वहीं अच्‍छा अनुभव बुरा शिक्षक है। एक दिन मैंने किसी का ट्वीट पढ़ा कि बाजार में तेजी का दौर आने पर हर व्‍यक्ति का आईक्‍यू 30 अंत बढ़ जाता है जो कि समस्‍या की ओर इशारा करता है।

अगर कोई निवेश शुरू करता है और कई महीनों और सालों तक उसका सफर अच्‍छा रहता है व बाजार बढ़त पर है तो उसे कोई अनुभव नहीं मिलेगा। वास्‍तव में उसे नकारात्‍मक अनुभव होगा। इस लिहाज से वह निवेश शुरू करने के समय की तुलना में और खराब निवेशक बनेगा।

जब कोई निवेश शुरू करता है और इसके बाद अच्‍छा दौर ही रहता है तो उसे वास्‍तविकता को लेकर सही नजरिया नहीं मिलता है। आप निवेश करते रहते हैं और रकम बढ़ती रहती है तो आप इसे सामान्‍य मान लेते हैं। इस तरह से कोई भी अपने आप को जीनियस समझ सकता है कि यह मानना शुरू कर सकता है कि चीजें इसी तरह से होंगी। और फिर बुरा दौर आता है। यह बुरा दौर कितना बुरा है इसके आधार पर निवेशक को लगने वाला झटका भी छोटा, बड़ा या बहुत बड़ा हो सकता है। हालांकि, आप इससे बच नहीं सकते हैं। यह हर निवेशक की जिंदगी में आता और आम तौर पर कई बार आता है।

सैद्धांतिक तौर पर सभी इक्विटी निवेशक जानते हैं कि ऐसा दिन आएगा। हालांकि, सिद्धांत हमको वह चीज कभी नहीं सिखा सकता जो एक आदमी का अनुभव सिखाता है। एक दिन आपके निवेश की वैल्‍यू 10 लाख है। कुछ दिन के बाद इसकी वैल्‍यू 9 लाख है और इसके बाद आठ लाख। इसके बाद शायद सात लाख। यही वह समय है जब अनुभव आपको सिखाना शुरू करता है। ठीक पुराने दौर के एक शिक्षक की तरह जो आपको बेंच पर खड़ा करता है और बेंत निकालता है।

इसके बाद क्‍या होता है यह कई चीजों पर निर्भर करता है। पहला, कितने लंबे समय से आप निवेश कर रहे हैं और आपका मुनाफा कितना है ? अगर आपने 5 लाख रुपए निवेश किए हैं और यह बढ़ कर 10 लाख हो गया है और इसकी वैल्‍यू घट कर 8 लाख पर आ जाती है। तो यह उस हालात से काफी अलग होगा जहां किसी ने एक निश्चित रकम निवेश की है और आधी रकम गायब हो जाए। यहां चीजों को बढ़ा चढ़ा कर नहीं बताया जा रहा है। 2007- 2009 में बहुत से लोगों के साथ ऐसा हुआ है। एक खास तरह के निवेशक 2007 के आखिरी महीनों में इक्विटी या इक्विटी फंड की ओर आकर्षित हुए। इसके बाद ऐसे निवेशक किसी भी तरह से मौका नहीं गंवाना नहीं चाहते है और उन्‍होंने बड़ी रकम कुछ निवेश विचारों में निवेश कर दी। इसमें से कुछ निवेश ने 60-70 फीसदी रकम गवां दी और कुछ निवेश दोबारा कभी ऊपर नहीं आए।

इस दौड़ में जीतने वालों ने, जिन्‍होंने अनुभव से सीखा और बाजार में बने रहे, लंबी अवधि में शानदार रिटर्न हासिल किया। इन लोगों में दो चीजें कॉमन थीं।

1- इन लोगों ने सामान्‍य समय में निवेश शुरू किया और थोड़ा थोड़ा निवेश जारी रखा और अपने निवेश को बढ़ने दिया।
2- इन लोगों ने मामूली गुणवत्‍ता के निवेश चुनने को लेकर ध्‍यान दिया। इसका मतलब है कि अगर निवेश की वैल्‍यू गिर गई तो आखिरकार निवेश ने रिकवरी दर्ज की और दोबारा बढ़त हासिल की। कोई स्‍थाई नुकसान नहीं हुआ।

अगर ये दो चीजें हुई तो निवेशक दोबार लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है। यह एक वास्‍तविक लाभ है। हम सभी जब निवेश शुरू करते हैं तो कुछ ऐसी चीजें करतें हैं जिनका कोई तर्क नहीं है और अपने अनुभव में बाजार में पहली बड़ी गिरावट का सामना करते हैं। यह मायने नहीं रखता है। जब आपके निवेश के सफर में दूसरी या तीसरी बड़ी गिरावट आती है तो पहली गिरावट का अनुभव काफी काम आता है।

निवेश से जुड़े पहले संकट में आपको जिन भी चीजों का सामना करना पड़ता है ओर वह इसके बाद आने वाले संकट के लिए ट्रेनिंग की तरह होता है। इसका फायदा आपको आने वाले संकट में मिलता है। मेरा मतलब है कि इसका फायदा उठाइये न कि सिर्फ बाजार में बने रहिए। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि पहले संकट में, आप अपना सारा समय यह सोचने में लगाते हैं कि आप बाजार से निकल लें या बने रहें। दूसरे संकट के समय से आप यह जान पाएंगे कि यह समय निवेश करने का है जब तक कि आप सही निवेश चुनते हैं।

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