न्यूज़वायर

Zepto का IPO टला, आपके म्यूचुअल फ़ंड ने आपके लिए किया यह काम

आपके SIP निवेश वाले फ़ंड्स ने कहा कि Zepto की क़ीमत $2.5 अरब से $3 अरब है, न कि $7 अरब जो उसके पिछले निजी निवेशकों ने चुकाए थे.

आपके SIP निवेश वाले फ़ंड्स ने कहा कि Zepto की क़ीमत $2.5 अरब से $3 अरब है, न कि $7 अरब जो उसके पिछले निजी निवेशकों ने चुकाए थे.Ujjal Das/AI-Generated Image

सारांशः निजी निवेशकों ने Zepto की एक क़ीमत का आकलन किया. लेकिन शेयर बाज़ार के निवेशकों के मन में कुछ बिल्कुल अलग था. यह फ़ासला क्विक कॉमर्स के बारे में कम, और इस बारे में ज़्यादा बताता है कि जब ख़रीदार आख़िरकार 'ना' कहने के लिए आज़ाद होते हैं, तो किसी कारोबार की असली क़ीमत कैसे तय होती है.

भारत के सबसे बड़े म्यूचुअल फ़ंड्स से पूछा गया कि Zepto की क़ीमत क्या है. उन्होंने जो जवाब दिया, वो उसका क़रीब एक-तिहाई था, जो क़ीमत उसके पिछले निजी निवेशकों ने आंकी थी. इस तरह, लिस्टिंग टाल दी गई है और रिटेल निवेशकों से यह फ़ासला भरने को कभी कहा ही नहीं गया.

बस यही पूरा सबक़ है और यह क्विक कॉमर्स पर किसी भी राय से ज़्यादा मायने रखता है. आपको किसी क़ीमत को ठुकराने का हक़ है. जबकि इस पूरी कड़ी में बाक़ी हर किसी के पास ऐसा न करने की कोई न कोई वजह है.

तो ख़बर क्या है?

Zepto ने 8 जून 2026 को अपना नया ड्राफ़्ट प्रॉस्पेक्टस दाख़िल किया, जिसमें ₹8,010 करोड़ की फ़्रेश पूंजी मांगी गई, साथ ही छह शुरुआती निवेशकों की तरफ़ से 11.35 करोड़ शेयरों का एक ऑफ़र फ़ॉर सेल भी शामिल था. कंपनी जुलाई में लिस्टिंग चाहती थी. पर जुलाई के आख़िर तक, घरेलू संस्थाएं $2.5 अरब से $3 अरब का इशारा कर रही थीं, जबकि अक्तूबर 2025 में CalPERS की अगुवाई वाले दौर में इसकी वैल्यूएशन $7 अरब मानी गई थी. Zepto ने अब क़दम पीछे खींच लिया है और अपने मौजूदा निवेशकों से इसके बजाय ₹1,000 करोड़ से थोड़ा ज़्यादा जुटाने की बात कर रही है. इसके पेपर क़रीब 21 अगस्त तक वैध रहेंगे.

वो $7 अरब कभी क़ीमत थी ही नहीं

यह तो बस एक नंबर था, जिस पर चंद लोगों के एक छोटे से समूह ने सहमति जताई थी और उन सबका फ़ायदा इसी में था कि यह नंबर बड़ा हो. संस्थापक, मौजूदा निवेशक और वो नया निवेशक जो उस हिस्से को अपने ही खातों में उसी ऊंचे आंकड़े पर दिखाता. उस कमरे में किसी ने भी कम क़ीमत की दलील नहीं दी.

 IPO की क़ीमत अलग होती है. यह पहली बार है जब ख़रीदारों के एक बड़े समूह से-जिनका कंपनी से पहले कोई लेना-देना नहीं है- यह पूछा गया कि कंपनी की क़ीमत क्या है. जवाब में क़ीमत लगभग एक-तिहाई बताई गई.

यह बाज़ार का नाइंसाफ़ी करना नहीं है. यह तो बाज़ार का ठीक से काम करना है.

घरेलू म्यूचुअल फ़ंड ने यहां आम निवेशकों का भला किया है. पुरानी शिकायत यह थी कि वो बैंकरों की रखी किसी भी क़ीमत पर मुहर लगा देते थे. ख़बरों के मुताबिक़, इस बार तो उनमें से एक ने कोई जवाबी क़ीमत देने की ज़हमत तक नहीं उठाई.

निजी निवेश जुटाने के पिछले चरण में जो क़ीमत लगी और अब शेयर बाज़ार ने जो आकलन किया है, इन दोनों के बीच का यह फ़ासला ही इस पूरे मामले से निकली सबसे काम की बात है, और यह किसी प्रॉस्पेक्टस से नहीं आई.

पांच महीनों में दो बार हुआ ऐसा

PhonePe ने मार्च 2026 में अपनी पेशकश टाल दी थी, जब ख़बरों के मुताबिक़ उसके बैंकरों ने $15 अरब की चर्चा वाली क़ीमत के मुक़ाबले $9 अरब से $10.5 अरब की सलाह दी थी. PhonePe ने इस रुकावट की वजह क़ीमत नहीं, बल्कि बाज़ार के हालात बताए और इस फ़र्क़ का सम्मान होना चाहिए.

बताई गई वजहों को एक तरफ़ रखकर देखिए कि आखिर हुआ क्या. इस साल दो बार, एक कंपनी अपने निजी आंकड़े के साथ आई, संस्थाओं ने उससे कहीं कम नंबर का इशारा किया और कंपनी ने इंतज़ार करने का फ़ैसला किया. भारत में क़रीब आधा अरब डॉलर से ज़्यादा जुटाने वाले किसी भी शख़्स के लिए, अब कसौटी बदल चुकी है. एक निजी वैल्यूएशन को अब वही माना जा रहा है जो वो असल में है, यानी बेचने वाले की शुरुआती मांग.

फ़ंड आख़िर पढ़ क्या रहे थे

Zepto का ऑपरेशंस से रेवेन्यू FY26 में दोगुने से ज़्यादा होकर ₹22,624 करोड़ हो गया, जो पहले ₹11,110 करोड़ था. पर घाटा भी बढ़कर ₹5,905 करोड़ हो गया, जो पहले ₹4,700 करोड़ था. कामकाज ने ₹3,462 करोड़ की नक़दी खा ली. खातों में मौजूद नक़दी मार्च 2026 में घटकर ₹5,681 करोड़ रह गई, जो एक साल पहले ₹7,441 करोड़ थी.

कामकाजी रिकॉर्ड सुधर रहा है. Zepto मार्च 2026 में 66 शहरों में 1,139 डार्क स्टोर चला रहा था, जबकि दो साल पहले 11 शहरों में सिर्फ़ 337 स्टोर थे. मार्च तिमाही में हर ऑर्डर पर होने वाला समायोजित घाटा घटकर ₹59.4 रह गया, जो एक साल पहले ₹142.68 था. 

दोनों बातें एक साथ सच हैं. कारोबार हर ऑर्डर के हिसाब से बेहतर हो रहा है, पर कुल मिलाकर ज़्यादा घाटा दे रहा है, क्योंकि वो जिस रफ़्तार से हर ऑर्डर का हिसाब सुधारता है, उससे तेज़ी से नए ऑर्डर जोड़ता जाता है. $7 अरब पर ख़रीदने का मतलब यह मानना है कि नक़दी ख़त्म होने से पहले दूसरा वाला रास्ता पहले वाले को पार कर लेगा. संस्थाओं ने तय किया कि क़ीमत $3 अरब है.

पेशकश की बनावट भी यही बात कहती है. Zepto रेगुलेशन 6(2) के तहत लिस्ट हो रहा है, यानी वो रास्ता जो उन कंपनियों के लिए है जो रेगुलेशन 6(1) की योग्यता की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं, जिसमें आमतौर पर तीन साल में औसतन ₹15 करोड़ के ऑपरेटिंग मुनाफ़े की शर्त होती है. 6(2) के तहत, कुल पेशकश का कम से कम 75% हिस्सा संस्थाओं को जाना चाहिए और आम निवेशकों को ज़्यादा से ज़्यादा 10%. जिस छोटे ₹5,000 करोड़ के इश्यू की बात बाद में हुई, उसमें आम निवेशकों का हिस्सा क़रीब ₹500 करोड़ होता. यह क़ीमत आम निवेशक तय कर ही नहीं रहे थे. फ़ंड कर रहे थे. अगली बार जब कोई घाटे वाला इश्यू छोटे निवेशक के लिए एक मौक़ा बताकर बेचा जाए, तो यह बात याद रखिए.

टालने से वक़्त मिलता है, कारोबार का हिसाब नहीं

Zepto ने पिछले साल क़रीब ₹5,900 करोड़ का घाटा उठाया, और वो लिस्ट हो या न हो, नक़दी जलाता रहेगा. दांव यह है कि हर ऑर्डर के बेहतर हिसाब वाला एक और साल, एक बेहतर नंबर दिला देगा. शायद दिला भी दे.

पर कंपनी को इस बीच अपना ख़र्च ख़ुद उठाना है और यहां का हिसाब बड़ा बेरहम है. कामकाज में जो ₹3,462 करोड़ की नक़दी लगी, वो हर तिमाही क़रीब ₹865 करोड़ बैठती है. जिस दौर की बात चल रही है, वो ₹1,000 करोड़ से थोड़ा ज़्यादा है. पिछले साल की रफ़्तार से, यह सिर्फ़ एक तिमाही का ख़र्च उठाता है.

आम निवेशकों के $2.5 अरब से $3 अरब का इशारा करने के बाद, निजी तौर पर क़रीब $4 अरब पर पैसा जुटाना इस बहस को ख़त्म नहीं करता. यह बस इसे आगे टाल देता है.

इसके नीचे एक और मुश्किल समस्या है. जो चीज़ें हर ऑर्डर का हिसाब सुधारेंगी, वही चीज़ें बढ़त को धीमा भी करेंगी: कम नए स्टोर, कम छूट, ज़्यादा डिलीवरी चार्ज, कसा हुआ मार्केटिंग ख़र्च. इनमें से हर एक हर ऑर्डर का घाटा घटाती है. और हर एक उस बढ़त की रफ़्तार को भी घटाती है, जिस पर यह वैल्युएशन टिकी थी. अगली दो-तीन तिमाहियां बताएंगी कि यह सौदा कहानी को तोड़े बिना हो सकता है या नहीं.

तीन नियम जो हर दौर में टिके रहते हैं

एक IPO एक बिक्री है, और मौक़ा बेचने वाला चुनता है. कोई कंपनी तब लिस्ट नहीं होती जब उसके अपने मैनेजरों को शेयर सस्ते लगते हों. सबूत का बोझ ख़रीदार पर होता है.

क़ीमत को परखिए, बनावट को नहीं. भारत में ज़्यादातर लोग ऑफ़र फ़ॉर सेल को दोष देते हैं, मानो पुराने शेयरधारकों का बेचना ही कोई बीमारी हो. पिछले तीन साल की कुछ सबसे अच्छी लिस्टिंग काफ़ी हद तक ऑफ़र फ़ॉर सेल ही थीं, और कुछ सबसे ख़राब लिस्टिंग पूरी तरह फ़्रेश इश्यू. इन्हें अलग करने वाली बात यह है कि कारोबार जो कमाई कर सकता है, उसके मुक़ाबले आप क़ीमत कितनी चुकाते हैं.

कोई जल्दबाज़ी नहीं है. एक अच्छा कारोबार अगले 20 साल तक किसी भी मंगलवार को बिकने के लिए मौजूद रहेगा. लिस्टिंग का फ़ायदा चूक जाने का डर, प्राइमरी बाज़ार की सबसे महंगी भावना है.

आप जिस बाज़ार में पैसा लगा रहे हैं

हम भारत के हर पब्लिक इश्यू पर नज़र रखते हैं. 4 दिसंबर 2024 और 31 जुलाई 2026 के बीच, 563 इश्यू बाज़ार में आए, जिनमें से 396 SME प्लेटफ़ॉर्म पर थे और 167 मेनबोर्ड पर. साल 2025 में, 107 मेनबोर्ड इश्यू ने ₹1,83,258 करोड़ जुटाए, जिनका औसत आकार ₹745 करोड़ था, और इनके साथ 271 SME इश्यू ने ₹12,691 करोड़ जुटाए, जिनका औसत ₹39 करोड़ था. 2026 में अब तक, 42 मेनबोर्ड इश्यू ₹66,868 करोड़ जुटा चुके हैं, और इनके साथ 108 और SME इश्यू आए हैं.

एक भारतीय निवेशक को क़रीब हर चार में से तीन ट्रेडिंग दिन पर एक नई कंपनी पेश की गई. इतनी रफ़्तार से कोई भी कारोबारों को परख नहीं सकता, हम भी नहीं. इसका एकमात्र बचाव यह है कि इनमें से ज़्यादातर को बिना किसी अपराधबोध के ठुकरा दिया जाए.

इसी डेटा से: 2025 में मेनबोर्ड IPO में बिके सभी शेयरों का 45% हिस्सा ऑफ़र फ़ॉर सेल था और 107 में से 17 इश्यू पूरी तरह ऑफ़र फ़ॉर सेल थे, जिनमें कंपनी तक एक रुपया भी नहीं पहुंचा. 2026 में यह आंकड़ा 47% है. इससे वो इश्यू बुरे नहीं हो जाते. यह बस आपको बताता है कि अभी प्राइमरी बाज़ार ज़्यादातर है क्या, यानी शुरुआती शेयरधारकों के लिए नए शेयरधारकों को बेचने का एक रास्ता.

स्रोत: वैल्यू रिसर्च प्राइमरी मार्केट डेटाबेस, 4 दिसंबर 2024 से 31 जुलाई 2026 तक खुलने वाले इश्यू.

कुछ भी अर्ज़ी लगाने से पहले चार जांचें

योग्यता का रास्ता पहले पन्ने पर ढूंढिए. रेगुलेशन 6(2) का मतलब है कि कंपनी उन कसौटियों पर खरी नहीं उतरी, जो एक आम लिस्टिंग के लिए ज़रूरी हैं. यह एक तथ्य है, कोई फ़ैसला नहीं, पर इसे सबसे पहले जान लीजिए.

ख़रीद की लागत ढूंढिए, और उसके दोनों रूप पढ़िए. कवर पेज पर हर बेचने वाले शेयरधारक की औसत लागत होती है. Nexus Ventures VI की ₹3.91 प्रति शेयर है, Contrary की ₹3.98, Nexus Ventures VII की ₹23.65. ये पूरी ज़िंदगी के औसत हैं, यह मानकर कि प्रेफ़रेंस शेयर पूरी तरह बदल दिए गए हैं. 'Basis for Offer Price' वाले हिस्से में एक दूसरा आंकड़ा होता है, यानी पिछले अठारह महीनों की भारित औसत ख़रीद लागत, जो दिखाती है कि हाल में क्या पैसा चुकाया गया, न कि 2021 में. दोनों पढ़िए, और पूछिए कि इनमें फ़र्क़ क्यों है.

देखिए कि कारोबार ने कामकाज से नक़दी बनाई है या नहीं. समायोजित मुनाफ़ा नहीं, स्टोर-स्तर का योगदान नहीं. नक़दी. यह दोबारा तैयार किए गए कैश फ़्लो स्टेटमेंट में होती है.

संस्थाओं की बोली पर नज़र रखिए. रेगुलेशन 6(2) के तहत, जब तक संस्थाएं 75% हिस्सा न लें, इश्यू पूरी तरह नाकाम हो जाता है और पैसा वापस चला जाता है. वो प्राइस बैंड तय नहीं करतीं. वो यह तय करती हैं कि वो क़ीमत टिकेगी या नहीं. एंकर निवेशकों को दिया हिस्सा इश्यू खुलने से एक दिन पहले एक्सचेंज की वेबसाइटों पर दिखता है, और इश्यू के दौरान हर श्रेणी की बोली लाइव चलती रहती है.

अपने साथ क्या लेकर जाएं

जिन फ़ंड ने इस क़ीमत को ठुकराया, उन्हीं में आपकी SIP का पैसा लगा है. वो आपका ही काम कर रहे थे, आपके ही पैसे से, आपके ही प्रतिनिधि के तौर पर, और इस महीने उन्होंने अपनी फ़ीस वसूल कर दिखाई.

पर वो हमेशा वहां नहीं होंगे. हमारे डेटा के ज़्यादातर इश्यू SME प्लेटफ़ॉर्म पर थे, जहां बेचने वाले की क़ीमत और आपकी क़ीमत के बीच कोई बड़ी संस्थागत बोली खड़ी नहीं होती. एक ऐसे बाज़ार में जो हर चार में से तीन दिन एक नई कंपनी पेश करता हो, सीखने लायक़ हुनर सही IPO चुनना नहीं है. हुनर तो इनमें से ज़्यादातर को 'ना' कहना है.

यह भी पढ़ें: IPO में कंपनी से ज़्यादा पुराने निवेशकों का फ़ायदा

वैल्यू रिसर्च से पूछें aks value research information

कोई सवाल छोटा नहीं होता. पर्सनल फ़ाइनांस, म्यूचुअल फ़ंड्स, या फिर स्टॉक्स पर बेझिझक अपने सवाल पूछिए, और हम आसान भाषा में आपको जवाब देंगे.


टॉप पिक

31 जुलाई की ITR डेडलाइन मिस करने से क्या-क्या नुक़सान हो सकते हैं?

पढ़ने का समय 6 मिनटआकार रस्तोगी

अपने गोल्स को ख़ुद से बचाइए

पढ़ने का समय 4 मिनटधीरेंद्र कुमार

Manipal Hospitals IPO: साइज़ में सबसे बड़ी, पर रिटर्न में पीछे

पढ़ने का समय 9 मिनटLekisha Katyal

बहुत ज़्यादा फ़ंड हो गए हैं? बेचने की जल्दबाज़ी मत कीजिए

पढ़ने का समय 3 मिनटआशुतोष गुप्ता

क्या मैं हर साल ₹1.25 लाख की LTCG छूट का इस्तेमाल कर सकता हूं?

पढ़ने का समय 4 मिनटउज्ज्वल दास

स्टॉक पॉडकास्ट

updateनए एपिसोड हर शुक्रवार

AI क्रांति जो वाक़ई काम की है

AI पर लगाए जा रहे खरबों रुपयों को भूल जाइए. असली क्रांति वह है जिसे आप अभी, मुफ़्त में, ख़ुद शुरू कर सकते हैं.

These are advertorial stories which keeps Value Research free for all. Click here to mark your interest for an ad-free experience in a paid plan

दूसरी कैटेगरी