
म्यूचुअल फ़ंड के क्षेत्र में नए बिज़नस, किसी बड़ी लहर की तरह आ रहे हैं। इनमें से कुछ तो पहले से ही मौजूद हैं, और कुछ जल्द शुरु होने वाले हैं। इसमें से कई नए बिज़नस अपने आप को फ़ंड डिस्ट्रीब्यूटर के तौर पर स्थापित कर रहे हैं, और कुछ दूसरे, एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMCs) हैं, जो अपना खुद का म्यूचुअल फ़ंड चलाएंगे। ये नए बिज़नस, सामयिक मायनों में ‘नए’ कहे जा सकते हैं। इनमें से ज़्यादातर बिज़नस, किसी-न-किसी तरह के सस्ते, और बड़े वेंचर-कैपिटल से फ़ाइनेंस किए गए हैं। इन में से तकरीबन सभी ये घोषित कर रहे हैं कि जिस बिज़नस में वो उतर रहे हैं, उसे वो पूरी तरह से बदल देंगे। यही बात कहने के लिए ये नए बिज़नस, ‘डिस्रप्ट’ और ‘पैशनेट’ जैसे शब्दों का खुल कर इस्तेमाल कर रहे हैं।
नई सोच की ऊर्जा, और पैसे की ताकत को नकारा नहीं जा सकता। हो सकता है कि अगले कुछ साल में, म्यूचुअल फ़ंड चलाने और/ या बेचने का बिज़नस, पूरी तरह से बदल जाए। हालांकि ये देखना दिलचस्प होगा कि ये आमूल-चूक परिवर्तन केवल इंडस्ट्री के लीडर-बोर्ड को ही ऊपर-नीचे करता है, या फिर म्यूचुअल फ़ंड कस्टमर भी इस बदलाव का हिस्सा बन पाते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में ज़्यादातर नए बिज़नस ने कस्टमर्स के अनुभव को सही मायने में पूरी तरह से बदल दिया है। जिन क्षेत्रों में कस्टमर्स ने सबसे ज़्यादा बदलाव महूसस किया है, इनमें - रेस्टोरेंट डिलिवरी, एप-बेस्ड कैब, पेमेंट-वॉलेट, ई-कॉमर्स, और इसी तरह के तमाम बिज़नस आते हैं। कस्टमर्स के अनुभव में ये बदलाव इतने गहरे रहे हैं कि इसे आप, एक बिल्कुल नए किस्म के अनुभव भी कह सकते हैं जो इससे पहले मौजूद नहीं था। हालांकि इनमें से से कई - या ज़्यादातर - बिज़नस अब तक आर्थिक तौर पर खुद को सफल साबित नहीं कर पाए हैं, इसलिए इन बदलावों की ये कहानी अब भी लिखी जा रही है। मगर जहां तक कस्टमर्स के अनुभव में बदलाव की बात है, वो पूरी तरह से साबित हो चुका है।
ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं है कि इस तरह के बदलाव का अनुभव, स्टार्टअप-मोड में शुरु किए गए किसी नए बिज़नस की ही उपज हों। ऐसे लगभग सभी बदलाव जिस बुनियाद पर खड़े हैं, वो है बैंकिंग और टेलीफ़ोनी/ टेलिकॉम में आए परिवर्तन, जो पहले से मौजूद बिज़नस मॉडल की पुरानी व्यवस्था में धीरे-धीरे हुए हैं। जैसे यूपीआई (UPI), जो इस पूरे बदलाव का अहम हिस्सा है, और सही मायने में एक सरकारी प्रॉजेक्ट रहा है।
कुछ बड़े बदलावों को अगर, बारीकी से बुनियादी स्तर पर देखा जाए तो पाएंगे कि ये हमेशा काम के हों ऐसा बिल्कुल ज़रूरी नहीं है। इनमें से सबसे निचले स्तर के वो बदलाव उन्हें कहा जाएगा, जो किसी मौजूदा बिज़नस के फ्री-फ्लो कैपिटल पर बहुत ज़्यादा चार्ज करते हैं और इस तरह, उस बिज़नस के बहुत से कस्टमर्स को अपनी तरफ़ खींच लेते हैं। मगर इसके बावजूद वो अपने इस बिज़नस मॉडल को मुनाफ़े में नहीं बदल पाते। क्योंकि एक बार पैसा आ जाने पर, किसी सर्विस को शुरु करना तो आसान होता है, मगर असली सवाल ये है कि क्या ये सर्विस, असलियत में कस्टमर्स का कुछ फ़ायदा करती है, या नहीं।
मज़े की बात तो ये है कि ये सब कुछ म्यूचुअल फ़ंड के साथ फ़िट भी नहीं बैठता है, और इसके कारण भी साफ़ हैं। क्योंकि कस्टमर्स के निवेश पर पर्फॉर्मेंस डिलिवर करना एक बुनियादी बात है। ये ऐसा काम नहीं है जिसमें आप पैसा झोंक कर उसे आसान बना दें। आप वैंचर के कैपिटल को खर्च कर, अपने निवेशकों के रिटर्न को न तो बढ़ा सकते हैं, और न ही उनके रिस्क को कम कर सकते हैं।
इसके अलावा एक और कारण भी है कि क्यों ये म्यूचुअल फ़ंड के साथ फ़िट नहीं बैठता, वो है कि, कस्टमर्स को ये लागत भले ही नज़र नहीं आए, और निवेश के परफॉर्मेंस के नीचे दब जाए। इसके अलावा आप बाहर की फ़ंडिंग से लागत को कम तो कर सकते हैं, और माना कि ये एक बड़ी बात है, मगर इस तरह से आप निवेशक को वो नहीं दे सकते, जो वो चाहता है। यानि अपने पैसे पर बेहतर रिटर्न, या निवेश में कम रिस्क।
मगर फिर भी ये बेहद ज़रूरी है कि ज़्यादा-से-ज़्यादा सीरियस, और बेहतर फ़ाइनेंस वाले नए बिज़नस, भारतीय म्यूचुअल फ़ंड इंडस्ट्री में शामिल हों, और ये एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMCs) के तौर पर, डिस्ट्रीब्यूटर या एडवाइज़र की तरह काम करें। हालांकि ये कहना भी गलती नहीं होगा कि ऐसे सभी नए बिज़नस एक तरह की समानता लिए हुए हैं। कमोबेश ये एक ही तरह के खेल में शामिल हैं, और बिज़नस को लेकर इनका रवैया भी एक सा है। मगर फिर भी इस तरह का बदलाव, निवेशकों के लिए अच्छा ही रहने वाला है, जब कई नए खिलाड़ी, नई सोच, बेहतर पूंजी, और कुछ कर गुज़रने की नीयत से इस क्षेत्र में दाखिल हो रहे हैं।
और कुछ नहीं तो इससे म्यूचुअल फ़ंड की पहुंच को बढ़ाने, नए निवेशकों को लाने, और नई तरह के निवेशकों को आकर्षित करने में भी मदद मिलेगी। और ये सब, बचत और निवेश के लिए एक बहुत बड़ा क़दम होगा।


