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आसान होते डिजिटल क्राइम

डिजिटल क्राइम कम करने के लिए फ़ाइनेंशियल रेग्युलेटर्स को कुछ करने की ज़रूरत है, बहुत कुछ करने की।

डिजिटल क्राइम कम करने के लिए फ़ाइनेंशियल रेग्युलेटर्स को कुछ करने की ज़रूरत है, बहुत कुछ करने की।

कुछ दिनों पहले एक ख़बर थी, दिल्ली पुलिस द्वारा बैंक फ़्रॉड करने वाले गैंग को अरेस्ट किए जाने की। इस गैंग में HDFC बैंक के तीन कर्मचारी भी शामिल थे, जो एक NRI के बैंक अकाउंट तक पहुंचने की फ़िराक़ में थे। ख़बर में इस अकाउंट को, बहुत ‘हाई-वैल्यू’ अकाउंट के तौर पर बताया गया। पैसे चुराने के लिए, इन लोगों ने इस अकाउंट की चेक-बुक हासिल कर ली, और NRI के फ़ोन नंबर से काफ़ी मिलता-जुलता नंबर भी ले लिया था। उनका इरादा, बैंक के सिस्टम में फ़ोन नंबर को बदलने का था। इसके बाद हुआ ये, कि उनके काम को बैंक के भीतर के सिस्टम ने फ़्लैग कर दिया, और पुलिस को ख़बर कर दी गई। इसके बाद एक विस्तृत इन्वेस्टीगेशन हुई, और 13 लोग अरेस्ट कर लिए गए।

जब आप इस ख़बर को पढ़ रहे हैं, तो ये एक सफल-कहानी की तरह लग रही होगी। ऐसा लगता है, कि फ़्रॉड होने से रोक लिया गया, क्योंकि बैंक के सिस्टम ने गड़बड़ी को पकड़ लिया, और फिर पुलिस ने बड़ी मुस्तैदी से इस इन्वेस्टीगेशन को अंजाम दिया। वैसे इसमें कोई शक़ भी नहीं है कि ऐसा हुआ भी, मगर हम सभी जानते हैं कि इसी तरह के ढेरों स्कैम, हर वक़्त हो रहे हैं, और शायद ही इनमें कोई पकड़ा जाता है, या शायद ही कोई केस सुलझ पाता है। इस केस में एक यही बात अलग थी, कि ये बहुत ‘हाई-वैल्यू’ अकाउंट था। असल में इसका मतलब है, कि ये बैंक के लिए हाई ‘कमर्शियल-वैल्यू’ वाला अकाउंट था। क्या ये सच नहीं, कि किसी भी कस्मटर के पास जो भी है, वो हाई-वैल्यू ही है। अगर आपके अकाउंट में ₹10,000 हैं, तो ये ₹10,000 ही आपके लिए बहुत हाई-वैल्यू होंगे।

इससे भी ज़्यादा बुरी बात ये है, कि सोफ़स्टिकेटेड फ़्रॉड बढ़ते जा रहे हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही, एक वरिष्ठ पत्रकार ने काफ़ी विस्तार से पोस्ट किया था, कि कैसे कई लाख रुपए उनके बैंक अकाउंट से चुरा लिए गए। ऐसा लगता है, कि इस केस में, एक फ़र्ज़ी ट्रैवल-पोर्टल एप के ज़रिए, उनके फ़ोन से OTP हासिल किया गया था। इस तरह के सोफ़स्टीकेटेड फ़्रॉड, कुछ वक़्त पहले तक काफ़ी कम होते थे, मगर अब ऐसा नहीं है।

हालांकि बैंकिंग-फ्रॉड, अकेले ऐसे फ़ायनेंशियल फ़्रॉड नहीं हैं, जो बढ़ रहे हैं। हाल ही में, मैंने एक स्टोरी देखी, जो NSE के 35 ब्रोकरों को सस्पेंड किए जाने के बारे में थी। इनपर आरोप था, कि इन्होंने पिछले चार साल के दौरान, अपने क्लायेंट्स के फ़ंड्स, और सेक्यूरिटीज़ का ग़लत इस्तेमाल किया। ये एक चौंकाने वाला नंबर है, क्योंकि ये नंबर, कुल ब्रोकरों का तक़रीबन 1 प्रतिशत बैठता है। आमतौर पर फ़ाइनेंशियल फ़्रॉड बहुत कम ही सामने आ पाते हैं, तो सोचना पड़ता है कि असलियत में इस क़िस्म के फ़्रॉड की समस्या कितनी गंभीर होगी। क्या ये स्थिति उन लोगों के लिए एक इमरजेंसी की तरह नहीं होनी चाहिए, जो इस मामले में कुछ सुधार लाने की स्थिति में हैं?

जहां तक बैंकिंग-फ़्रॉड का सवाल है, ये बात साफ़ है कि इसकी शुरुआत, अक्सर बैंक से कस्टमर के डीटेल लीक होने से ही होती है। मैंने जिनके बारे में सुना है, उनमें से बहुत से केस सीनियर सिटिज़न्स के साथ घटते हैं। जिन केसों के बारे में, मैं सीधे तौर पर जानता हूं उनमें से सभी में ऐसा लगता है, कि अकाउंट-होल्डर, और अकाउंट के डीटेल की जानकारी, फ़्रॉड करने वालों को पहले से ही थी। ये बात लोगों के बैंक पर भरोसे को ख़तरे में डालती है। बैंक, और RBI इसकी ज़िम्मेदारी कस्टमर पर डाल देते हैं, कि उन्होंने ही OTP दिया होगा। मगर बैंक से कस्टमर-डेटा के लीक होने पर, किसी सफल जांच, और ऐक्शन की ख़बर, कभी सुनने में नहीं आई है।

आमतौर पर, आसानी से धोखा खाने वाले बैंक के कमज़ोर सिस्टम को लेकर बैंक की ज़िम्मेदारी के बारे में चुप्पी ही रहती है। जैसे-जैसे डिजिटल-बैंकिंग बढ़ रही है, कस्टमर के लिए भी फ़्रॉड के ख़तरे बढ़ रहे हैं। इसका दोष कस्टमर के सर पर मढ़ने से, और ऊपर जिस ख़बर का ज़िक्र किया है, केवल वैसे ‘हाई-वैल्यू’ केस की सफ़ल कहानियों को ही हाइलाइट करने से, उन लाखों लोगों का भला नहीं होगा, जो चुपचाप ऐसे फ़्रॉड का शिकार बन रहे हैं।

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