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फ़ंड्स में हाईप का नया चक्कर

भारत में पैसिव फ़ंड की एक लहर आ गयी है--और सही मायने में इसमें पैसिव फ़ंड के कोई फ़ायदे नहीं हैं

भारत में पैसिव फ़ंड की एक लहर आ गयी है--और सही मायने में इसमें पैसिव फ़ंड के कोई फ़ायदे नहीं हैं


इन दिनों, तरह-तरह के पैसिव फ़ंड-इंडेक्स फ़ंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फ़ंड्स (ETFs)-पर काफ़ी ज़ोर है, और ये ट्रैंड लगातार और भी ज़्यादा ज़ोर पकड़ रहा है। अगर आप फ़ाइनेंशियल अख़बार या मैग्ज़ीन पढ़ते हैं, या फिर सोशल मीडिया में फ़ाइनेंस की ख़बरों पर नज़र रखते हैं, तो आपको लगेगा कि निवेश की दुनिया में पैसिव फ़ंड्स की क्रांति होने जा रही है। ज़्यादातर एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) में पैसिव फ़ंड बढ़ते जा रहे हैं, और नए-नए पैसिव फ़ंड लॉंच करने की होड़ लगी हुई है। कुछ AMC ने तो इसी क़िस्म के फ़ंड पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित कर दिया है, और एक AMC जो लॉंच की गई है, उसका तो वादा ही 100% पैसिव फ़ंड होने का है। क्योंकि इस नई AMC-नवी-को शुरु करने वाले फ़्लिपकार्ट के संस्थापक सचिन बंसल हैं, इसलिए इसने अच्छा ख़ासा ध्यान खींचा है, जिसका नतीजा है कि चर्चाएं अब इंडैक्स और ETF की अवधारणाओं पर भी होने लगी हैं।

हालांकि, जब मैं छोटे निवेशकों से बात करता हूं, तो पैसिव फ़ंड को लेकर ये उत्साह-या रुचि-मुझे दिखाई नहीं देती है। हां, कुछ लोग ज़रूर इसके बारे में जानते हैं। ख़ासकर जो निवेश के बारे में ज़्यादा पढ़ते हैं और अनुभव रखते हैं। ऐसे लोग इसके विषय में जानते तो हैं, मगर उनमें और पैसिव फ़ंड के उत्साही लोगों के बीच एक दूरी है। ये दूरी या डिसकनेक्ट कुछ इस तरह का है; कि एक आम निवेशक पक्का आशावादी होने के साथ परिस्थितियों को अपनी आशा के मुताबिक़ ढालने की सोच रखता है। मगर दूसरी तरफ़, पैसिव फ़ंड कुछ उदासीन और एक 'ठीक ही है' क़िस्म के विकल्प को तौर पर दिखाई देते हैं। ये दो अलग तरह की सोच, एक ही धरातल पर आसानी से मिलती हुई नज़र नहीं आती है। मूल रूप से पैसिव फ़ंड का तर्क़ निवेशक को कुछ इस तरह दिखाई देगा: आप चाहे कितनी भी कोशिश करें, आप इंडैक्स से बेहतर नहीं कर सकते, तो आप कोशिश न ही करें। बस इसे स्वीकार कर लें कि आप मार्केट जितना रिटर्न ही पा सकते हैं। इस तरह का ख़याल एक आशावादी इक्विटी निवेशक के गले शायद ही उतरे। कुल मिला कर, पैसिव फ़ंड को लेकर ये उत्साह, निवेशक की ज़रूरत के हिसाब से बनाई गई निवेश योजना के बजाए, एक मढ़ी गई बौद्धिक सोच का नतीजा लगती है।

हालांकि, भारतीय म्यूचुअल फ़ंड मार्केट में पैसिव निवेश की मौजूदा लहर, इस तरह परिभाषित किए जाने लायक़ भी नहीं है। असल में ये फ़ंड और कुछ नहीं, बल्कि म्यूचुअल फ़ंड कंपनियों की एक मार्केटिंग बाज़ीगरी का नमूना हैं। क्योंकि पैविस-इन्वेस्टिंग की सार्थकता ही इसी में है, कि ऐसा निवेशक जो कई सौ, या हज़ारों एक्टिव फ़ंड के आकलन में नहीं उलझना चाहता, उसे पैसिव फ़ंड के ज़रिए निवेश का विकल्प मिल सके। इसके बजाए, पैसिव फ़ंड 'मार्केट को ख़रीदने' के विकल्प को आकर्षक बना कर बेच रहे हैं। जिस तरह से बाक़ी सब भूल कर, अगर आप सिर्फ़ निफ़्टी इंडैक्स फ़ंड में निवेश कर लें, तो इसके लिए, किस AMC-को चुनें, जैसे सवाल पर विचार करने की ज़रूरत ही नहीं है। अगर फ़ंड का साइज़ ज़रूरत के मुताबिक़ ठीक-ठाक है, और इसका ख़र्च कम है, तो ये किसी भी AMC का हो, इससे क्या फ़ंर्क़ पड़ता है।

ये बात आपको ठीक लगती है न? हालांकि यही बात म्यूचुअल फ़ंड कंपनियों के लिए एक बुरे सपने जैसी होगी। आख़िर कौन सा बिज़नस चाहेगा कि उसके सारे प्रॉडक्ट का लाईन-अप एक सा हो जाए? इससे भी बड़ी बात ये है, कि एक नए फ़ंड को बेचना कहीं ज़्यादा आसान होता है, बजाए किसी पुराने और स्थापित फ़ंड में लगातार निवेश करने वालों के समूह को तैयार करना। इतना ही नहीं, सेबी की नई फ़ंड कैटेगरी की व्यवस्था के मुताबिक़, आप कोर कैटेगरी में एक से ज़्यादा फ़ंड नहीं लॉंच कर सकते, इसलिए अब हाशिये की कुछ कैटेगरी में ये 'नयापन' नज़र आ रहा है। यही वजह है कि अब हम तेज़ी से बढ़ता हुआ ये 'स्पेशलाइज़्ड पैसिव फ़ंड' का अजायबघर देख रहे हैं। किस फ़ंड को निवेश के लिए चुना जाए, और किसे कितना महत्व दिया जाए, इसकी सारी ज़िम्मेदारी अब आपकी हो गई है। यानि एक्टिव फ़ंड में चुनाव करने का विकल्प आपके पास पहले कुछ ज्यादा ही था, तो इसके हल के तौर पर अब आपको और ज़्यादा विकल्प दिए गए हैं!

अजीब बात ये है कि जब मैं किसी एक निवेशक के असल फ़ाइनेंशियल गोल को देखता हूं, और तलाशता हूं कि वो कैसे अपने गोल हासिल करे, तो इसका जवाब कभी भी सिर्फ़, सही टाईप या सही सब-टाईप के फ़ंड के तौर पर नहीं होता है। इसके बजाए, इसका जवाब हमेशा की तरह, ये होता है कि आप ऐसे सरल और अलग-अलग तरह के (diversified funds) या संतुलित फंड (balanced funds) में निवेश करें, जिनका ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा हो। ये निवेश आप जितनी जल्दी हो सके शुरु करें, हर महीने करें, और रुकें नहीं। आपके पास अपना आर्थिक लक्ष्य हासिल करने के सवाल का जवाब, इसी बात में छुपा है कि सबसे पहले निवेश को लेकर आप अपना एक्शन दुरुस्त करें, और दुनिया भर की चिंता बाद में करें।

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