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इस बार जल्द ख़त्म नहीं होगा मुश्किल दौर!

पिछले 30 साल से, मैं पाठकों से हर संकट का डटकर सामना करने के लिए कहता आया हूं. लेकिन अमेरिका-ईरान युद्ध इसका अपवाद है, और यहां ख़बर से ज़्यादा उसका कारण मायने रखता है.

पिछले 30 साल से, मैं पाठकों से हर संकट का डटकर सामना करने के लिए कहता आया हूं. लेकिन अमेरिका-ईरान युद्ध इसका अपवाद है, और यहां ख़बर से ज़्यादा उसका कारण मायने रखता है.Aditya Roy/AI-Generated Image

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डॉटकॉम बुलबुले के फटने से लेकर 2008 के संकट तक, नोटबंदी से लेकर कोविड क्रैश और यूक्रेन युद्ध तक, और बीच में आए हर तेल के झटके तक - डेटा हर बार इस बात की पुष्टि करता रहा है. बार-बार.

आज मैं उस परंपरा से एक क़दम पीछे हट रहा हूं.

अमेरिका-ईरान युद्ध एक ऐसी असाधारण स्थिति है, जिस पर मेरी आम सलाह लागू नहीं होती. इसकी वजह ख़बर से ज़्यादा अहम है.

ज़्यादातर संकट बाज़ार के सेंटीमेंट को नुक़सान पहुंचाते हैं. यह संकट असल चीज़ों को नुक़सान पहुंचा रहा है. फ़र्क़ छोटा लगता है, लेकिन यह सब कुछ बदल देता है.

सोचिए, ज़्यादातर मार्केट क्राइसिस दरअसल होते क्या हैं. कंपनियां लड़खड़ाती हैं. कोई सेक्टर अचानक अप्रासंगिक हो जाता है. वैल्यूएशन कमाई से आगे निकल जाते हैं. घबराहट फैलती है. क़ीमतें गिरती हैं. लेकिन फ़ैक्ट्रियां वहीं खड़ी रहती हैं. मज़दूर वहीं होते हैं. सप्लाई चेन, ग्राहक, अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता - सब बरकरार रहती है. बदलती है तो बस मनोदशा या नक़दी का प्रवाह या वह क़ीमत जो कोई भविष्य की कमाई के लिए चुकाने को तैयार है. ये तो एक मूल रूप से स्वस्थ शरीर के भीतर के उतार-चढ़ाव हैं, जो आखिरकार गुज़र जाते हैं.

पश्चिम एशिया का संघर्ष दूसरी क़िस्म का है.

जो नुक़सान हो रहा है, वह सेंटीमेंट को नहीं, बल्कि असल ढांचे को हो रहा है. अगर दुनिया की कच्चे तेल की रिफाइनिंग की क्षमता का एक बड़ा हिस्सा तबाह हो रहा है, जिसके 10-15 प्रतिशत होने का अनुमान है हालांकि इनकी पुष्टि नहीं हो सकती, तो हम किसी साइकिल में नहीं हैं. हम एक पुनर्निर्माण के चरण में हैं, जो अभी शुरू भी नहीं हुआ क्योंकि तबाही अभी रुकी नहीं है. तेल से मिलने वाले पेट्रोल, डीज़ल, खाद, प्लास्टिक जैसे तमाम इंडस्ट्रियल इनपुट्स मनोदशा बदलने से बहाल नहीं होंगे. ये तभी बहाल होंगे जब मरम्मत होगी, पाइप बिछेंगे और रिफ़ाइनरियां फिर से खड़ी होंगी. इसमें तिमाहियां नहीं, कई साल लगेंगे.

जो बात इसे और मुश्किल बनाती है, वह यह है कि एक निवेशक उत्पादन के आंकड़े, क्षमता का उपयोग, सप्लाई के पूर्वानुमान जैसे जिन संकेतों पर भरोसा करता है, वे ख़ुद इस युद्ध की चपेट में हैं. हम उन पर भरोसा नहीं कर सकते. यह मान्यता कि आर्थिक तर्क राष्ट्रों को उनके सबसे बुरे आचरण से रोकता है, असल समय में परखी जा रही है. बाज़ार उन फ़ैसलों की क़ीमत तय करने के लिए नहीं बने हैं, जो बाज़ार से असंबद्ध कारणों से लिए गए हों.

भारतीय निवेशक के लिए यह सब कोई दूर की बात नहीं है. भारत अपनी ज़रूरत का 85 प्रतिशत से ज़्यादा कच्चा तेल आयात करता है. वैश्विक क़ीमत में हर डॉलर की बढ़ोतरी का असर कुछ समय बाद, पेट्रोल पंप पर, खाद के बिल में, सीमेंट की लागत में और इंदौर के किसी घर के रसोई के बजट में दिखता है.

ज़रा पुणे की एक रिटायर्ड महिला के बारे में सोचिए, जिसने 2008 में हर महीने ₹20,000 की SIP शुरू की और तब से हर उठापटक में डटी रही. उसका पोर्टफ़ोलियो वक़्त के साथ ठीक हो जाएगा. उसका किराने का बिल इंतज़ार नहीं करेगा.

एक ही घर को एक साथ दो जगह नुक़सान झेलना पड़ता है. इक्विटी NAV डगमगाता है. और रुपया पिछले महीने से कम ख़रीद पाता है.

एक दूसरे दर्जे का असर भी है जिसे नज़रअंदाज़ करना आसान है. उसके इक्विटी फ़ंड में शामिल कंपनियां - सीमेंट बनाने वाली, ऑटो कंपनियां, कंज़्यूमर गुड्स कंपनियां - सभी को बढ़ी हुई इनपुट लागत का सामना करना पड़ रहा है, जो जब तक तेल ऊंचा रहेगा, उनके मार्जिन को दबाए रखेगी. उसके पोर्टफ़ोलियो पर असली चोट इस हफ़्ते की सुर्ख़ियों वाला उतार-चढ़ाव नहीं होगी. यह अगले साल की कमाई में लगने वाली धीमी सेंध होगी.

मैं यह नहीं कह रहा कि आप पोर्टफ़ोलियो बेचकर भाग जाएं. यह तो वही ख़बर-आधारित प्रतिक्रिया होगी, जिसके ख़िलाफ़ मैं दशकों से तर्क देता रहा हूं. मैं बस यह कह रहा हूं कि रिकवरी की अपनी उम्मीदों में थोड़ा बदलाव करें.

यह चार्ट पर एक गहरा या लंबा V नहीं होगा. यह धीमी और असमान रिकवरी होगी. कच्चा तेल हफ़्तों नहीं, सालों तक ऊंचा रह सकता है. महंगाई तय वक़्त पर कम नहीं होगी. बाज़ार जिन ब्याज दर कटौतियों की उम्मीद कर रहा है, उनके समय पर होने की उम्मीद कम हैं. बीच में लागत में, महंगाई में, विकास में और उन लोगों की बचत में काफ़ी नुक़सान हो चुका होगा - जिनका इस सब से कोई लेना-देना नहीं था.

जो उम्मीद की बात मैं हमेशा आख़िर में करता हूं, इस बार वह ज़रा कमज़ोर है.

हर सुबह एक अरब भारतीय अपनी ज़िंदगी में जुट जाते हैं. वे उत्पादन करते हैं. वे खपत करते हैं. वे बचाते हैं. वे ख़र्च करते हैं. यही भारत की उस रफ़्तार का असली स्रोत है, जो होर्मुज़ जलडमरूमध्य में क्या हो रहा है, इस पर निर्भर नहीं करती.

यह किसी युद्ध का पूरा जवाब नहीं है. लेकिन यही वह एक बुनियाद है, जो लंबी अवधि के भारतीय निवेशक के लिए अभी भी टिकी हुई है.

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