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अजब सोच मंहगाई पर

यू.एस. में मंहगाई का ज़्यादा होना भारत के इक्विटी निवेशकों के लिए अच्छी ख़बर नहीं है। कम से कम कुछ अर्से के लिए तो नहीं ही है।

अजब सोच मंहगाई पर

क्या मंहगाई ख़राब है? चाहे वो कोई भी हो, ग़रीब हो या पढ़ा-लिखा अर्थशास्त्री, इस सवाल का जवाब उन सभी का एक ही होगा, हां। पर क्या महंगाई, अमीरों के मुक़ाबले ग़रीबों के लिए ज़्यादा बुरी है? इस सवाल का जवाब भी तय लगता है और इसपर भी कोई दो राय नहीं दिखाई देती।
हालांकि, ऐसा लग रहा है, जैसे दूसरे सवाल के जवाब को लेकर कुछ लोगों का नज़रिया अलग है। पॉल क्रुगमैन बड़े अर्थशास्त्री हैं जिन्हें कुछ साल पहले ही अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनके योगदान पर नोबेल मिला था। कुछ दिनों पहले उन्होंने ये ट्वीट किया: “मंहगाई ख़ासतौर पर ग़रीबों का नुकसान करती है” इसमें कुछ सच झलकता है-सुन कर लगता है, ये बात सही होनी चाहिए। मगर मुझे इसमें कोई तथ्य या व्यवस्था नज़र नहीं आती (Inflation especially hurts the poor" has truthiness - it sounds like it should be true. But I don't see either evidence or a mechanism). उनकी इस बात के साथ कुछ दूसरी बातें और ग्राफ़ वगैरह भी हैं, जिनसे वो इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि इसमें न तो कोई तथ्य है और न ही व्यवस्था का कोई आधार उन्हें दिखाई देता है। हालांकि इस ट्वीट में, जो बात साफ़ तौर पर दिखाई देती रही है, वो ये कि पॉल ग़रीब नहीं हैं, वो कभी ग़रीब नहीं रहे हैं और न ही किसी दूसरे ग़रीब इंसान को उन्होंने क़रीब से देखा है।

अजीब बात ये है कि क्रूगमैन यू.एस. में अकेले शख़्स नहीं हैं, जिसका मंहगाई को ले कर नज़रिया अचानक बदल गया है। पिछले कुछ हफ़्तों से ऐसे विचार यू.एस. मीडिया में काफ़ी छाए रहे हैं। इसी विषय पर CNN बिज़नस ने लंबा-चौड़ा विश्लेषण किया, कि “क्यों असलियत में मंहगाई आम अमेरिकी के लिए अच्छी हो सकती है और अमीरों के लिए बुरी”। अगर आप गूगल करें ‘इन्फ़ेलशन-गुड-यू.एस.’ (Inflation good US), तो आपको इस विषय पर कई लेख और ट्वीट मिल जाएंगे। मंहगाई को लेकर सकारात्मकता की ये लहर अचरज में डालने वाली है, और जिस तरह से प्रभावशाली लोगों की आवाज़ें एक सुर में ये कह रही हैं, ये संदेह खड़ा करता है।
आप पूछ सकते हैं, इस सब से आपका और मेरा क्या वास्ता है, जो इस पेज पर अपने निवेश के बारे में बात करने आए हैं। इसका जवाब है, ‘बहुत कुछ।’ यू.एस. में ऐतिहासिक रूप से ऊंची मंहगाई दर को लेकर, वहां की सरकार और सैंट्रल बैंक क्या करता है, ये हमारे निवेश में बड़े स्तर पर उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता ला सकता है (या नहीं भी)। चलिए देखते हैं ये कैसे हो सकता है। ये बात हम जानते हैं, जहां लंबे समय में स्टॉक के दाम बुनियादी बातों से तय होते हैं, वहीं कम समय में लीक्विडिटी काफ़ी असर रखती है। अगर ग्लोबल इकॉनोमी में कहीं भी बहुत ज़्यादा पैसा झोंका जाए, तो ये क़रीब-क़रीब दुनिया के हर एसेट मार्केट में दामों को बढ़ा देगा।

जैसा की सच है, यू.एस. करंसी छापने की होड़ लगी हुई है। 2008 में, देश में करंसी की सप्लाई यू.एस.$7.5 ट्रिलियन थी। 2019 तक, ये इस स्तर के दो-गुने से ऊपर हो चुकी थी। अब वो बढ़ कर $21 ट्रिलियन हो गई है। पिछले साल के आखिर में, किसी ने कैलकुलेट किया था, कि 20 प्रतिशत से ज़्यादा डॉलर जो चलन में हैं, उन्हें पिछले दस महीनों में ही छापा गया है। मैं यक़ीन से कह सकता हूं कि ये आंकड़ा अब और बढ़ गया होगा।

हालांकि, अब लगता है जैसे कर्ज़ अदा करने का वक़्त आ गया है। इस वक़्त जहां यूनाइटेड स्टेट्स में मंहगाई 30-साल के ऊंचे स्तर पर है, हो सकता है आने वाले कुछ हफ़्तों और महीनों में पूंजी की बहुतायत धीरे-धीरे कम होती जाएगी। इससे भी ज़्यादा, यू.एस. की घरेलू राजनीति पर एक सरसरी नज़र डालें तो ये साफ़ नज़र आता है कि मंहगाई को निर्णायक तौर पर और तेज़ी से क़ाबू में लाना, अब बाइडेन सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता है, फिर मार्केट पर इसका असर चाहे जो भी हो। यू.एस. में ये एक नई तरह की स्थिति है, कम से कम 1980 के दशक की शुरुआत से अब तक ऐसा नहीं हुआ है। क्रुगमैन जैसे लोगों ने कई साल इसी बहस में बिताए हैं कि मंहगाई नहीं आएगी, और जब आ गई है, तो वो जी-जान से ये बताने में जुट गए हैं कि इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

इसके बावजूद, इस बात की काफ़ी संभावना है कि यू.एस. मार्केट में आमतौर पर पैसे की कमी का दौर दिखाई देगा और क्योंकि ये यू.एस. में होगा, दुनिया भर में भी यही देखने को मिल सकता है। इससे भी बड़ी बात ये है कि किसी भी सरकार को इस पर कोई बड़ी आपत्ति नहीं होगी। पैसे की अधिकता, कमोबेश दुनिया की हर अर्थव्यवस्था के, हर हिस्से में ‘लीक’ कर गई है और मंहगाई हर किसी की मुश्किल बनने जा रही है।
मोटे तौर पर, भारत के लिए इसका मतलब होगा, भारतीय स्टॉक बाज़ार में कम पूंजी का आना (inflow) या शायद कुल मिला कर ज़्यादा पूंजी का बाहर चले जाना (outflow). इस बात पर शायद ही कोई शक़ हो कि इसका नतीजा उतार-चढ़ाव में नहीं दिखेगा। हालांकि, ये भी मानने वाली बात है कि भारतीय बाज़ार ऐसे झटकों के लिए अब पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं। बड़े स्तर पर घरेलू निवेश, ख़ासतौर पर इक्विटी SIPs और EPFO के चलते, अब भारतीय बाज़ार में सुरक्षा की एक परत बन गई है, जो पहले नहीं थी। हां, कुछ गतिरोध आ सकते हैं, मगर जो निवेशक अपने निवेश की क्वालिटी पर ध्यान देंगे, और इक्विटी के कम दामों का फ़ायदा उठाने से नहीं चूकेंगे, वो बेहतर स्थिति में रहेंगे।

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