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डेटा एनालेटिक्स से धोखाधड़ी की पहचान का तरीक़ा

वित्तीय लेनदेन के डेटा का रचनात्मक विश्लेषण, महत्वपूर्ण जानकारियां दे सकता है।

वित्तीय लेनदेन के डेटा का रचनात्मक विश्लेषण, महत्वपूर्ण जानकारियां दे सकता है।

सोशल मीडिया के आने के साथ एक अच्छी बात हुई है कि फ़ाईनेंशियल सर्विस में ओवर-सेलिंग या ग़लत जानकारी के आधार पर सेल्स के मुद्दे पर पहले से कहीं ज़्यादा बातचीत होने लगी है। इंश्योरेंस या म्यूचुअल फ़ंड ग़लत तरीक़े से बेचे जाने के बारे कोई एक व्यक्ति सवाल उठाता है तो उसपर तमाम ‘मेरे साथ भी’ जैसे जवाबों की झड़ी लग जाती है। इससे हर किसी को एहसास हो जाता है कि ऐसी घटनाएं अक्सर होती रहती हैं। जैसा की हमेशा होता है, ऐसे कई या शायद ज़्यादातर केसों में नियमों का कोई सीधा-सीधा उल्लंघन नहीं होता। दरअसल, बेचे जा रहे फ़ाईनेंशियल प्रॉडक्ट्स या स्कीमें ऐसी होती हैं जो क्लांयट के हितों को ध्यान में रखने वाले किसी भी फ़ाईनेंशियल एडवाईज़र की नज़र में सही नहीं होंगी। या फिर ये प्रॉडक्ट कुछ इस तरह के होते हैं जो सिर्फ़ ज़ुबानी वादों और आश्वासनों के आधार पर बेच कर, बाद में आसानी से नकारे जा सकते हों।

इनमें से बहुत कम ही केस कार्यवाही करने लायक़ शिकायतों के स्तर तक पहुंच पाते हैं। और जो शिकायतों तक पहुंचते भी हैं, उनमें से भी गिने-चुने केस ही संतोषजनक रूप से किसी नतीजे तक पहुंच पाते हैं। इससे भी ज़्यादा अफ़सोसनाक बात है कि इन गिनती के केसों में, ग़लत-बयानी का शिकार हुए कस्टमर्स को मसले सुलझाने के लिए बहुत ज़्यादा मशक़्क़त करनी पड़ती है और उन्हीं लोगों से मदद लेनी पड़ती है, जो अच्छी तरह से जानते हैं कि क्या कुछ चल रहा है। साफ़ है, ओवर-सेल करने वालों को अच्छी तरह पता है कि ऐसे कसटमर कम ही होंगे जो असल में शिकायतें दूर करने के लिए जद्दोजहद करेंगे।

हालांकि, इन केसों को देखने पर साफ़ हो जाता है कि ज़्यादातर लोग एक पैटर्न फ़ॉलो करते हैं। कुछ गिनी-चुनी तकनीके, क़रीब-क़रीब सभी कस्टमर्स पर आज़माई जाती हैं। म्यूचुअल फ़ंड के केस में, सेबी के एंट्री-लोड ख़त्म करने से पहले फ़ंड होल्डिंग्स को ख़रीदने-बेचने का अंतहीन सिलसिला जारी था, ताकि ज़्यादा-से-ज़्यादा कमीशन बनाया जा सके। यूलिप के केस में, एजेंट ये कह कर पॉलिसियां बेचने की कोशिश करते कि कस्टमर तीन साल बाद उन्हें रिडीम कर सकते हैं-ऐसा करना एजेंट के कमीशन को ज़्यादा-से-ज़्यादा बढ़ा देता और कस्टमर के रिटर्न को कम-से-कम कर देता।

इस तरह के चलन की पहचान और इसका हल, अब भी पुलिस-कम्पलेन जैसी तथाकथित ‘आदर्श’ व्यवस्था में उलझा हुआ है। जब किसी एक कस्टमर को पता लगता है कि उसके साथ धोखा हुआ है, तो वो सेबी या इंश्योरेंस रेग्युलेटरी एंड डवलपमेंट अथॉरिटी से शिकायत करता है। इस स्थिति में, एक तरह की जांच बैठती है और अगर ऐसे सुबूत मिल जाते हैं जिनसे साबित हो जाए कि कुछ ग़लत हुआ है, तब ही किसी तरह का एक्शन संभव हो पाता है। यानी, ये ठीक ‘पुलिस-कंप्लेन’ के सिस्टम जैसा है, मगर इस तरह की जांच और कोर्ट केस का फ़ाईनेंस की दुनिया में बहुत ही सीमित मायने रह जाता है।

जहां शिकायतों और जांच का सिलसिला जारी रह सकता है, वहीं रेग्युलेटर बड़े वित्तीय लेन-देन के असल डेटा का अनालेसिस (बिग डेटा एनेलेटिक्स) उपलब्ध कर, व्यवस्था को पारदर्शी बना सकते हैं ताकि संभावित कस्टमर्स आगाह रह सकें। इसकी एक क़ारगर मिसाल के तौर पर, कैसा रहे अगर बड़े पैमाने पर किए गए सारे ट्रांज़ैक्शन का डेटा सार्वजनिक कर दिया जाए, जिससे साफ़-साफ़ देखा जा सके कि क्या कुछ चल रहा है और वो कौन लोग शामिल हैं। इसका उदाहरण कुछ इस तरह हो सकता है कि हम-निवेश करने वाले-एक वेबसाईट पर जा सकें और हर प्रॉडक्ट या स्कीम बेचने वाले को वहां तलाश सकें। हम ये जान पाएं कि किसी प्रॉडक्ट के निवेशकों का रिटर्न-रेशियो क्या रहा और उसे बेचने में शामिल शख़्स की कमीशन से कितनी कमाई हुई। यहां हमें सारे डेटा के साथ-साथ, सारे फ़ाईनेशियल इंटरमीडियेरीज़ की रेंज और डिस्ट्रीब्यूशन की जानकारी मिल जाए। इससे ये पता लगेगा कि बैंक A अपने कस्टमर के हर 100 रुपए के रिटर्न पर औसतन 12 रुपए का कमीशन बनाता है, जबकि उसी रिटर्न पर बैंक B 36 रुपए बना लेता है। ठीक इसी तरह इंश्योरेंस के लिए, इस वेबसाईट पर मैं ये देख सकूं कि जिस एजेंट ने मुझसे संपर्क किया है, उसके 55 प्रतिशत यूलिप पहले ही लैप्स हो चुके हैं, जबकि बाक़ी के एजेंटों का औसत 32 प्रतिशत का रहा।

ये एक-दो उदाहरण ही हैं, मगर इससे ये भी संभव हो सकता है कि किसी भी तरह की ग़लत-सेल से बचने के लिए स्टेटेस्टिक्स सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हों, जो कस्टमर को इंटरमीडियेरी की पहचान करने के संकेत दे सकें। इससे एक अच्छा बेंचमार्क स्थापित होगा, जो सभी इंटरमीडियेरीज़ को बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करेगा। बड़े स्तर पर डेटा का अनालेसिस और सही सुराग की पहचान, कई आश्चर्यजन नतीजे सामने ला सकता है। जिस तरह की गोपनीयता का चलन फ़ाईनेशियल बिज़नस के सर्विस क्षेत्र में है, उससे संदेहास्पद प्रैक्टिस को चुपचाप चलाने में मदद ही मिलती है। कस्टमर्स की सीधी पहुंच जानकारियों तक हो, ये पूरी व्यवस्था को सही मायने में बेहतर करने का सबसे क़ारगर तरीक़ा है।

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