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जो आपके पास है बनाम जो नहीं है

एक इक्विटी निवेशक के लिए नए निवेशों की तलाश सबसे महत्वपूर्ण नहीं

एक इक्विटी निवेशक के लिए नए निवेशों की तलाश सबसे महत्वपूर्ण नहीं

वैल्यू इन्वेस्टिंग को लेकर एक सरल पर बड़े काम की बात है. पढ़ते ही आपको ये बात ख़ुद-ब-ख़ुद सही लगने लगेगी कि जो आपके पास नहीं है वो आपको नुक़सान नहीं पहुंचा सकता. हममें से ज़्यादातर लोग उस निवेश की चिंता में रहते हैं, जो हमने किया ही नहीं और उसके बारे में कम ही सोचते हैं जो हमने किए हुए हैं.

आपने, अपने और दूसरों के साथ हज़ार बार ऐसा होते देखा होगा, पर शायद नोटिस न किया हो. अपने निवेशों को लेकर इन दो सवालों के बारे में सोचिए.

  1. आप कौन सा स्टॉक ख़रीदेंगे?
  2. जो स्टॉक आपके पास पहले से हैं क्या उन्हें रखना फ़ायदे का सौदा है?

अगर आप पहले सवाल का जवाब ईमानदारी से नहीं तलाशते, तो आप वो स्टॉक ख़रीदने से चूक जाएंगे जो आपको ख़रीदने चाहिए थे. और अगर ऐसा स्टॉक है जो ख़रीदा जाना चाहिए मगर आप उसे नहीं ख़रीदते, तो आप संभावित मुनाफ़े से हाथ धो बैठेंगे. इसका नतीजा होगा कि जब आप उन स्टॉक्स को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जो आपके पास नहीं हैं, तो आप खेल ही नहीं खेल रहे हैं. ऐसे में न तो आपको फ़ायदा होगा और न ही नुक़सान.

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दूसरे सवाल में, ये विकल्प नहीं है. आप पहले से ही खेल में शामिल हैं. अगर आप अपने स्टॉक्स को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो आप या पैसे बना सकते हैं, या गंवा सकते हैं. इसमें कोई विकल्प नहीं. या कम-से-कम ऐसा होना नहीं चाहिए. अमल करने के लिहाज़ से लोग इस बात पर बड़ा ज़ोर देते हैं कि अब आगे उन्हें क्या ख़रीदना चाहिए, बजाए इसके कि वो चिंता करें कि अपने पहले से ख़रीदे स्टॉक को अपने पास ही रखें या नहीं.

जो आपके पास है और जो आपके पास नहीं है, इसका विरोधाभास एक फ़ंड मैनेजर की कही बात याद दिलाता है (शायद समीर अरोड़ा ने कहा था). उन्होंने कई साल पहले HDFC बैंक के शेयर ख़रीदे थे और उन्हें शानदार रिटर्न के कारण अपने पास बनाए रखा. बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि मैंने HDFC बैंक को 20 साल से नहीं, बल्कि 80 क्वार्टर से रखा हुआ है.

उनका मतलब था कि किसी स्टॉक को दशकों तक होल्ड करने के बावजूद, मनोवैज्ञानिक स्तर पर, लंबे समय के निवेश जैसी कोई चीज़ नहीं होती. हर क्वार्टर में जब नंबर आते हैं, तो हमें हर चीज़ का आकलन फिर से करना चाहिए. अगर कोई फ़ैसला लेने लायक़ बदलाव होता है, तो कुछ ही क्वार्टर में आपके विचार बदल सकते हैं. अगर स्टॉक अच्छा करता रहे, तब ये बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि आप उसे होल्ड रखें. अगर उसमें कुछ गड़बड़ होती है, तो बहुत ज़रूरी हो जाता है कि आप उस निवेश से बाहर निकल जाएं. दोनों ही स्थितियों में, आप ज़्यादा पैसे बनाएंगे, अगर आप उस पर ध्यान देंगे जो आपके पास है.

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इसके बावजूद निवेशक – जिनमें मैं भी शामिल हूं – अक्सर उस पर ज़्यादा ध्यान देते हैं, जो वो आगे चलकर ख़रीदने वाले हैं. ये बात हमारे स्वभाव में है. किसी स्टॉक का ‘शिकार’ करने में अद्भुत रोमांच है. कुछ नया करने की तलाश करना, और उस एक्शन में रम जाना. जो आपके पास पहले से ही मौजूद है, उसे बस देखते रहने में कोई उत्साह नज़र नहीं आता.

एक कॉन्सेप्ट है ‘बायस फ़ॉर एक्शन’ यानी कुछ ख़ास करने के पक्ष में झुकाव होना. अक्सर बहुत सफल बिज़नसमैन और उद्योगपतियों में ये बायस पाया जाता है. मगर ये सिर्फ़ बिज़नस तक ही नहीं बल्कि जीवन की ज़्यादातर बातों के लिए भी है. ये बायस एक कर्मचारी पर सही बैठता है, स्टूडेंट, खिलाड़ी, और भारतीय सड़कों पर ड्राइविंग के लिए तो ये बात बिल्कुल सटीक है. इसके साथ ही हम इसे बचत और निवेश के लिए भी सही मान सकते हैं. निवेश को हम किस काम के साथ जोड़कर देखते हैं? मेरे ख़याल से ज़्यादातर लोग सोचेंगे कि निवेश करने के लिए, निवेश के बारे में पढ़ना, निवेश चुनना, नए निवेशों को तलाशने जैसे तमाम काम होते होंगे, पर ऐसा है नहीं.

ऐसा समझने के पीछे मुख्य कारण है, एक इंडस्ट्री, जिसे मैं इन्वेस्टमेंट एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के नाम से बुलाता हूं, हालांकि वो ख़ुद, इन्वेस्टमेंट न्यूज़ मीडिया होने का दावा करते हैं. कितने ही बिज़नस चैनल, अख़बार और वेबसाइट शोर का जो तूफ़ान बरपा करते हैं, उसे वो न्यूज़ का नाम देते हैं. वो ये एहसास दिलाना चाहते हैं कि शॉर्ट-टर्म की घटनाएं निवेशकों के लिए मायने रखती हैं, और इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, लगातार नए निवेशों की तलाश करते रहना.

हां, ये काम आपको करना होता है. मगर वहीं, आपके पास जो पहले से है उसे स्टडी करना ज़्यादा अहमियत रखता है. पिछले कुछ सालों में बहुत से उतार-चढ़ाव आए हैं और आगे भी आएंगे. चाहे जो भी हो, आपके पास जो है, उस पर से ध्यान हटाने का कोई समय सही नहीं होता.

देखिए ये वीडियो- फ़ंड निवेश का बेस्ट प्लान

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