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इक्विटी निवेशकों का सारा ज़ोर शॉर्ट-टर्म पर रहने से वो अपने लिए फ़ायदेमंद फ़ैसले नहीं ले पाते

इक्विटी निवेशकों का सारा ज़ोर शॉर्ट-टर्म पर रहने से वो अपने लिए फ़ायदेमंद फ़ैसले नहीं ले पाते

HDFC और HDFC बैंक के विलय की ख़बर क़रीब दो हफ़्ते पुरानी हो गई है। अपने-आप में ये कोई ख़बर भी नहीं थी। क्योंकि कभी-न-कभी तो ये विलय होना ही था। ये अभी होता, कुछ महीने या साल बाद होता, या फिर कुछ महीने पहले भी हो सकता था। पर ये पक्का था कि ऐसा होगा। हालांकि, ये दो हफ़्ते एक ऐसे क्रैश-कोर्स की तरह रहे, जिन्होंने साबित कर दिया कि कैसे इक्विटी मार्केट में शॉर्ट-टर्म का बोलबाला है और स्टॉक के दाम इसी से तय होते हैं।
जब पहले-पहले विलय की ख़बर आई, तो दोनों कंपनियों के स्टॉक में एकदम से काफ़ी बड़ा उछाल देखा गया। ख़बर वाले दिन तो स्टॉक के दाम बड़ी तेज़ी से बढ़े। और फिर आई प्रतिक्रिया, या शायद मुझे पलायन कहना चाहिए। दोनों स्टॉक्स, ट्रेडिंग के 9 दिन, और कैलेंडर के 16 दिन, लगातार नीचे लुढ़कते रहे। हालांकि दामों के लगातार गिरने का ये रिकॉर्ड इससे बड़ा नहीं हो पाया, मगर जो हुआ उसके लिए इक्विटी ट्रेडर या विश्लेषकों का ग़लत रवैया ज़िम्मेदार है।
HDFC और HDFC बैंक की पृष्ठभूमि और बिज़नस पर नज़र डालें, तो किसी शक़ की गुंजाईश नहीं रह जाती कि ये दोनों कॉर्पोरेट संस्थाएं बेहतरीन हैं। और आने वाले कई बरसों तक इनकी सफलता का सिलसिला जारी रह सकता है। यानि इस केस में, दिनों-हफ़्तों-महीनों के तर्क, बरसों के तर्कों से जीत गए।
मैंने एक दिलचस्प बात नोट की है, कि विश्लेषक जिस भी वजह से किसी स्टॉक के छोटी-अवधि में ख़राब प्रदर्शन के कारण गिनाते हैं, असल में वो कह रहे होते हैं कि बिज़नस चलाने वाले अपनी मुश्किलें इसलिए नहीं हल कर पाएंगे, क्योंकि इस वक़्त, वो ख़ुद (यानि विश्लेषक) इस मुश्किल का हल नहीं तलाश कर पा रहे हैं।
मैंने पहली बार ये तब नोटिस किया था, जब 90 के दशक के आख़िरी सालों में Y2K का दौर था। उस समय, ऐसे विश्लेषकों की कमी नहीं थी, जो कहें कि Y2K को दुरुस्त करने का काम ख़त्म होते ही, भारतीय IT इंडस्ट्री भरभरा कर गिर पड़ेगी। इस पर मेरा तर्क होता था कि विश्लेषकों को ज़रा पीछे हट कर, IT सर्विस में, पहले दर्जे की कंपनियों के पूरे सफ़र का जायज़ा लेना चाहिए। और अपने फ़ैसले का आधार, इन कंपनियों के बिज़नस मॉडल और उस पर अमल करने की मैनेजमेंट की क़ाबिलियत को बनाना चाहिए।
यानि, अगर कोई - इंफ़ोसेस, विप्रो या TCS - छोटी सी शुरुआत से उठ कर वहां पहुंची हैं, जहां वो सात-आठ साल के दौरान 1999 में पहुंच गई थी, तो चाहे कम-अवधि में किसी भी तरह की मुश्किलें पेश आएं, वो आगे बढ़ने के रास्ते भी तलाश कर ही लेगी। इसके ठीक उलट, परंपारगत विश्ललेषकों के तर्क का मतलब था कि क्योंकि मैं, एक विश्लेषक के तौर पर, ये नहीं जान पा रहा हूं कि इस मौजूदा मुश्किल से कैसे निपटा जाए, तो ये पक्का हो गया कि कंपनी का मैनेजमेंट भी ऐसा नहीं कर पाएगा। उनके इस अभिमान से भरे नज़रिए को, अगर व्यावहारिक तौर पर देखें तो सारे निवेशक-व्यक्तिगत और प्रोफ़ेशनल के तौर पर-एक तिमाही से दूसरी तिमाही के बीच जीते हैं, इसलिए उससे लंबी अवधि की किसी बात में उनकी दिलचस्पी नहीं है। कम ही ऐसा होता है कि बिज़नस में लंबी-अवधि के विकास की संभावनाओं का अंदाज़ा, आज दिखाई पड़ने वाले कारणों पर निर्भर हो। दरअसल, मोटे तौर पर ये ट्रेंड्स पर और मैनेजमेंट की क्वालिटी पर ज़्यादा निर्भर करता है।
दिलचस्प है कि ऐसा करने की अनिच्छा उलटी मुश्किल खड़ी कर देती है। किसी बिज़नस को लेकर अनावश्यक रूप से निराशावादी रवैया रखने के बजाए, कुछ ऐसी कंपनियां है जिनके लिए बेमतलब का उत्साह होता है। यही बात कुछ समय पहले तक हॉट रहे न्यू-एज डिजिटल बिज़नस को लेकर होने वाली शर्मिंदगी में ये बात साफ़ दिख जाती है। अगर एक दशक की कोशिशों के बाद भी कंपनियों को चलाने वाले मुनाफ़ा बनाने का तरीक़ा नहीं तलाश पाए हैं, तो इसका निश्कर्ष स्पष्ट होना चाहिए।
समझने की बात ये है कि किसी कंपनी की लंबे-समय की संभावनाओं का अंदाज़ा, छोटी अवधि के आकलन से बुनियादी तौर पर अलग होता है। आप एक्सेल-शीट में चार खाने बना सकते हैं और चार तिमाहियों के अनुमान लिख सकते हैं। पर अगर आप दस साल के बारे में जानना चाहते हैं, तो उसी स्प्रेडशीट में 40 खाने बढ़ाने से बात नहीं बनेगी।

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