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एक पहेली है LIC का IPO

जिस LIC के IPO का लंबे वक़्त से इंतज़ार था क्या वो रीटेल इन्वेस्टर की दिलचस्पी का हक़दार है? या इस पर भी ‘PSU कभी नहीं’ और ‘IPO कभी नहीं’ का सिद्धांत लागू होता है?

जिस LIC के IPO का लंबे वक़्त से इंतज़ार था क्या वो रीटेल इन्वेस्टर की दिलचस्पी का हक़दार है? या इस पर भी ‘PSU कभी नहीं’ और ‘IPO कभी नहीं’ का सिद्धांत लागू होता है?

बिज़नस चलाने के मामले में सरकारें किसी काम की नहीं होतीं। अगर सरकार के कंट्रोल वाले किसी बिज़नस में आपको धन लगाना हो तो नफ़े-नुक्सान पर फ़ैसला लेते समय ये याद रखें। इसी सिद्धांत को मानते हुए कई निवेशक पब्लिक स्टॉक अंडरटेकिंग (PSU) स्टॉक्स में कभी निवेश नहीं करते।
पर, लाईफ़ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (LIC) के मौजूदा इनीशियल पब्लिक ऑफ़रिंग (IPO) ने इस सवाल को एक दिलचस्प मोड़ दे दिया है। कुछ लोग मानते हैं कि ‘PSU स्टॉक्स कभी न ख़रीदने का रूल’ के लिए LIC एक अपवाद है। इसे समझने के लिए, मैं PSU स्टॉक्स पर अपने प्वाईंट्स आपके सामने रख रहा हूं।
मेरा शुरुआती प्वाईंट है, लोग। किसी भी बिज़नस के सफल या असफल होने की वजह वो लोग होते हैं जो उस बिज़नस में काम करते हैं और उसे चलाते हैं। PSU ऊर्जा से भरे संस्थान नहीं होते। जो लोग प्राईवेट और पब्लिक सेक्टरों में काम कर चुके हैं, वो इसे समझते हैं। मानवीय स्तर पर देखें, तो पब्लिक सेक्टर में कुछ बेहतर कर दिखाने की जीवटता नहीं होती। जब बिज़नस ख़राब चल रहा हो, तो किसी भी तरह बिज़नस बचाने, और मुनाफ़ा बढ़ाने, और इस सबके नतीजे में शेयर-होल्डर की वैल्थ बढ़ाने के लिए - कुछ भी कर गुज़रने का जज़्बा पब्लिक सेक्टर में नहीं होता। इससे भी बड़ी बात है कि आप तब कंपनी चलाने वालों को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते, जब कंपनी की होल्डिंग बढ़ाना उसके सबसे बड़ा शेयरहोल्डर की प्राथमिकता ही न हो।
ये बात इस मसले के केंद्र में है कि क्यों पब्लिक सेक्टर कंपनियों के स्टॉक में निवेश करना बुनियादी तौर पर अलग है। ये ठीक वैसा ही है जैसे आप किसी ऐसे बिज़नस के माइनॉरिटी शेयरहोल्डर हों, जिसके मेजॉरटी शेयरहोल्डर के इरादे आपसे से बिल्कुल अलग हों। इसके बावजूद, अगर PSU बिज़नस में संभावनाएं अच्छी हों भी, तो ऐसा उनके इतिहास की किसी ख़ास वजह से होगा। आमतौर पर या तो इनका वर्चस्व होता है या किसी ऐतिहासिक कारण से उनका बिज़नस कोई दूसरा नहीं कर सकता। LIC ने पहली कैटेगरी से शुरुआत की थी और फिर दूसरी कैटेगरी में आ गई, जहां वो अब भी है।
ये अपनेआप में कोई राहत की बात नहीं है। भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) और एयर इंडिया जैसी कंपनियां भी यही रास्ता ले चुकी हैं, और देखिए उनका क्या हुआ। हालांकि, एक ऐसा कारण है जो सच में LIC को, BSNL या एयर इंडिया से अलग करता है। एक इंश्योरेंस कंपनी के प्रॉडक्ट के लिए, भरोसा अहम होता है। असल में, आप कह सकते हैं कि भरोसा ही प्रॉडक्ट होता है। जहां तक कस्टमर का सवाल है, LIC भारत सरकार का हिस्सा है। वो दिवालिया नहीं होगी। सारे तामझाम के बावजूद, इश्योरेंस ख़रीदने वाले बहुत से लोगों में प्राईवेट इंश्योरेंस कंपनियों को लेकर भरोसा नहीं है। इसका मतलब है कि बुनियादी तौर पर सरकार की इंश्योरेंस कंपनी होना, सरकारी टेलीकॉम या एयरलाईन होने से अलग बात है, और BSNL-एयर इंडिया जैसे उदाहरण उस पर लागू नहीं होते।
कह सकते हैं, कि LIC IPO के फ़ायदे-नुकसान की बैलेंस-शीट में, सरकार के स्वामित्व वाला फ़ैक्टर, असल में एक फ़ायदे की बात है। लेकिन जो पहला कारण मैंने PSU स्टॉक को नज़रअंदाज़ करने का गिनाया, वो अब भी लागू होता है। अगर सबसे अच्छी और सबसे ख़राब बात को ध्यान में रखें, तो कहा जा सकता है कि इस मामले में, बढ़त और कमी दोनों संतुलित हैं और इसलिए LIC के स्टॉक को बिज़नस के नज़रिए से आंका जा सकता है। हालांकि IPO के विषय पर मैं ये नज़रिया नहीं अपनाऊंगा, पर यही कहूंगा कि ये IPO कतई बुरा नहीं लग रहा है। फिर भी, निवेशकों ने इस मसले को कई नज़रिए से देखा-परखा है।
यहां मेरे लिए सबसे अहम है, कुछ बुनियादी सिद्धांतों की तरफ़ लौटना: क्या किसी एक निवेशक को IPO में निवेश करना भी चाहिए? मेरा मानना है कि नहीं करना चाहिए, और ये जवाब हमेशा ही नहीं में होना चाहिए, चाहे कोई भी IPO हो। किसी भी IPO में, बहुत सारे अनजान कारक होते हैं, जो सेकेंडरी मार्केट में नज़र नहीं आते। जानकारी की ताक़त इन्डिविजुअल इन्वेस्टर के पास कभी नहीं होती। IPO को लेकर सही नज़रिया है, और ये न सिर्फ़ नए निवेशकों के लिए है बल्कि सभी निवेशकों के लिए है कि आप उन्हें छोड़ ही दें। दूर रहें। आप कोई प्रोफ़ेशनल नहीं हैं, जिसे हर IPO पर कोई नज़रिया क़ायम करना ही होगा। सेकेंडरी मार्केट में हर समय कई बेहतर विकल्प मौजूद होते हैं। आपके पास धन सीमित होता है-तो क्यों नहीं इसे किसी स्टॉक में डालते, जिनके प्राईस के बारे में पहले से पता होता है, और जो मार्केट द्वारा कहीं बेहतर तरीक़े से समझे-बूझे गए होते हैं?

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