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निराशावादी समझदार लगते हैं

ये इक्विटी मार्केट का वो दौर है जब निराशावादी समझदार दिखाई देते हैं, और आशावादी...

ये इक्विटी मार्केट का वो दौर है जब निराशावादी समझदार दिखाई देते हैं, और आशावादी...

मार्केट के हर कमज़ोर दौर में कुछ लोग होते हैं जो शांत और स्थिर रहते हैं, और कुछ ऐसे लोग होते हैं जो हैरान-परेशान हो जाते हैं। अक्सर, समय और अनुभव इसके लिए ज़िम्मेदार होते हैं। सोशल मीडिया पर बहुत से लोग इक्विटी मार्केट की गिरावट पर अपनी चिंता और घबराहट लगातार ज़ाहिर करते हैं। इनके हर मैसेज में एक बात हमेशा मौजूद रहती है कि ऐसी घबराहट पिछले दो बरस से नहीं देखी गई, ख़ासतौर पर मार्च 2020 से। इस बात पर अनुभवी निवेशकों का व्यंग्य में सराबोर जवाब होता है, “तो”?

और हां, जिन्होंने पिछले क्रैश देखे हैं और उनके दौरान निवेश करते रहे हैं, उनके लिए ये समझना मुश्किल होता है कि इस घबराहट की वजह क्या है। इस समय, लार्ज-कैप इंडेक्स पिछले साल के मुक़ाबले 7.5 प्रतिशत ज़्यादा है। जो हुआ है, वो ये कि पिछले 10 महीनों में मिली बढ़त ग़ायब हो गई है। जिसने भी अपने स्टॉक समझ-बूझ के साथ चुने हैं और उनकी वैल्यू को ध्यान में रख कर अपना निवेश लगातार करते रहे हैं, उनके लिए कुछ गड़बड़ नहीं है, कोई क्रैश नहीं है।

अब अगर, हेडलाईन और सोशल मीडिया की चीख़-पुकार आपको इक्विटी मार्केट के तथाकथित क्रैश को लेकर चिंतित कर रही है, तो दो क़दम पीछे हट कर पूरा जायज़ा लीजिए। ध्यान देने वाली पहली चीज़ है कि किसी भी वाजिब समय में - दो साल, तीन साल और या इससे ज़्यादा वक़्त के दौरान इक्विटी अच्छे-खासे फ़ायदे में है। इस समय जो कुछ घट रहा है उसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। असलियत तो ये है कि अपनी दिशा और गति दोनों में, पिछले साल के मुक़ाबले, बिज़नस के फ़ंडामेंटल्स कहीं बेहतर हैं। एक तरह से देखें तो अक्सर मुश्किल दौर में ऐसा ही होता है, जैसा कोविड के दौर में हुआ है। असल में, इस महामारी ने कंपनियों को बाध्य किया है कि वो अपने बिज़नस की बुनियादी बातों पर फ़ोकस करें, और अपने वित्तीय तथा कामकाज के मापदंडों को बेहतर बनाएं।

तो एक निवेशक के तौर पर आपको इस तथाकथित मार्केट क्रैश को लेकर क्या करना चाहिए? इसे इस परिप्रेक्ष्य में देखें, और जवाब साफ़ हो जाएगा - ये अवसर है ज़्यादा निवेश करने का, या कम-से-कम, निवेश करते रहने का। काफ़ी हद तक ये मौक़ा है, वापस बुनियादी बातों पर ग़ौर किए जाने का। किसी भी शानदार रिटर्न की बुनियाद हमेशा ही स्टॉक मार्केट के बुरे दौर में रखी जाती है। मैं ये बात कभी नहीं समझ पाया - और ईमानदारी से स्वीकार करता हूं - कि अगर आप एक महीने पहले किसी अच्छे स्टॉक में निवेश करना चाहते थे, तो ये बात पक्की है कि आज आप इसे ख़रीदने के और ज़्यादा इच्छुक होंगे? आख़िर कोई इसके उलट क्यों सोचेगा?

एक कारण ये हो सकता है, जिसके बारे में हर कोई बहस कर रहा है कि दुनिया भर के स्टॉक मार्केट या अर्थव्यवस्थाएं या बिज़नस पर मुश्किल समय आने वाला है, और लगता है कि उनके तर्कों में दम है। ऐसा सोचने के कारण हैं - युद्ध और महंगाई और ब्याज दरें और एनर्जी के दाम और इसी तरह की तमाम चीज़ें। ये बातें ठीक हैं और काफ़ी ज़रूरी भी। पर, एक बात याद रखनी चाहिए जो किसी ने कही है: निराशावादी समझदार दिखते हैं, आशावादी पैसे बनाते हैं। निराशावादी समझदार क्यों दिखाई देते हैं? क्योंकि उनके पास बहुत सारे तथ्य, तर्क और नंबर होते हैं, जिनका ज़िक्र मैंने इससे पहले किया।

आशावादी भी यही कुछ करते हैं, मगर उनका विश्वास, सिद्धांतों के क़ारगर साबित होने और इंसानों की कोशिशों के भरोसे पर टिका होता है, ख़ासतौर पर मौजूदा परिस्थिति के मुक़ाबले बेहतर भविष्य की आशा को लेकर। निराशावादी कहेंगे - ब्याज दरें X से बढ़ कर Y होने वाली हैं और इसलिए Z प्रतिशत कंपनियों की फ़ाईनेंशियल कॉस्ट ₹W करोड़ बढ़ जाएगी। उनकी ये बात प्रभावित करने वाली लगती है। पर एक आशावादी कहेगा, बिल्कुल, मगर क्या आप जानते हैं, अच्छी तरह से चलने वाली कंपनियां, जिनमें क़ाबिल मैनेजमेंट है, वो उससे निपटने का तरीक़ा तलाश ही लेंगी और इस सबके बावजूद अच्छा प्रदर्शन करेंगी क्योंकि वो पहले भी ऐसा कर चुकी हैं।
मानना होगा कि यहां, आशावादी की बात काफ़ी कमज़ोर लगती है, ऐसा लगता है, जैसे किसी के पास ज़रूरी जानकारी या तथ्य ही न हों और वो बस हौसला अफ़ज़ाई कर रहा हो। पर सच तो ये है कि आशावादी के सही होने और पैसा बनाने के चांस कहीं ज़्यादा हैं, एक बिज़नसमैन के तौर पर भी और एक इक्विटी निवेशक के तौर पर भी। अंत में यही कहूंगा, शॉर्ट-टर्म में आपको यथार्थवादी रहना चाहिए और लॉन्ग-टर्म में आशावादी। हमेशा जीत हासिल करने का ये क़ारगर फ़ॉर्मूला है।

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