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इक्विटी मार्केट में हर कोई आपको लूटने के लिए खड़ा है

इक्विटी मार्केट में हर कोई आपको लूटने के लिए खड़ा है


जब आप स्कूल में पढ़ते थे, तब क्या किसी ऐसे बच्चे को जानते थे, जो अपनी रिपोर्ट कार्ड में हेरफेर करता था? आजकल, तो सब कुछ ऑनलाइन है और SMS से होता है। मगर एक समय था जब बच्चे, टीचर के हाथ से लिखे रिपोर्ट कार्ड घर ले जाते थे और अपने मां-बाप से साइन करवाते थे। जो बच्चा अपने नंबरों को लेकर ज़्यादा घबराता था, उसके लिए रिपोर्ट कार्ड में फेरबदल करने के दो मौक़े होते थे। वो या तो रिपोर्ट कार्ड के नंबरों में बदलाव कर दे, या मां-बाप के नक़ली दस्तख़त करे। कई बच्चों को (और मेरे ख़याल से मां-बाप और शायद टीचरों को भी) इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं होती थी कि रिपोर्ट कार्ड में नंबरों का असल मायने क्या है। उन्हें सिर्फ़ इस बात की फ़िक्र रहती थी कि पेपर पर एक अच्छा एकेडमिक रिकॉर्ड कैसे बरक़रार रहे और ये काम नंबरों में फेरबदल से किया जा सकता था।
ठीक यही बात कई लिस्टिड कंपनियों पर लागू होती है। इसी मिसाल को जारी रखा जाए, तो ऐसी कंपनियों के प्रमोटर उन बच्चों जैसे होते हैं, जिनके ऑडिटर किसी टीचर का रोल अदा करते हैं, और एनालिस्ट और इन्वेस्टर अभिभावक के रोल में होते हैं। इन कंपनियों का लक्ष्य सच बताना नहीं बल्कि वो भ्रम बनाना होता है, जो निवेशकों के लिए खड़ा किया जाता है। दरअसल, इनके प्रमोटरों के गोल अलग होते हैं और वो आम शेयरधारक के गोल से मेल नहीं खाते।
पिछले कुछ दशकों में, ऐसी कंपनियों की कई ग़लत मिसालें सामने आई हैं, जिनका खड़ा किया भ्रम निवेशकों के सिर पर मुसीबत बन कर फूटा। मगर हां, ये सिर्फ़ वो बड़ी घटनाएं हैं, जो लोगों की नज़र में आ पाईं। इस तरह की सबसे बड़ी घटना सत्यम रही। मगर सत्यम दो तरह से अलग था। पहला, कंपनी का साइज़ और एक बढ़ती हुई इंडस्ट्री में उसका अहम रोल। दूसरा, किस तरह से रामलिंग राजू ने अंत तक इस भ्रम को बनाए रखा। असल में इस फ़्रॉड का इतना लंबा खिंचना असल अचरज की बात रही। और ये तभी संभव हो पाया क्योंकि इसमें ऑडिट करने वालों ने एक रोल निभाया। सत्यम की घटना का फ़ायदा ये हुआ कि बाद में होने वाले ऑडिट के सुधारों की बड़ी वजह बन गया।
सत्यम सिर्फ़ एक मिसाल है, मगर ऐसी बहुत सी कंपनियां हैं जिनमें पिछले कुछ दशकों में इस इस तरह के ख़ुलासे हुए हैं। ILFS, Cox & Kings, DHFL और CG Power कुछ नाम हैं, जो तुरंत ही दिमाग़ में आते हैं। इनमें से ज़्यादातर घटनाओं में चेतावनी के संकेत, पहले से और लंबे समय से नज़र आ रहे थे। सत्यम का मामला कुछ अलग ज़रूर था, पर ज़्यादातर कंपनियों में ये बहुत अलग नहीं होता। आज की तुलना में, पहले चीज़ें काफ़ी अलग हुआ करती थीं। इक्विटी निवेश के मूल में जानकारी और नंबरों का वो भरोसा है, जो कंपनियां अपने बिज़नस के बारे में निवेशकों के लिए रिलीज़ करती हैं। इस भरोसे के बिना कुछ भी नहीं है। ऐतिहासिक तौर पर, कम-से-कम 90 के दशक के अंत तक, ऐसे नंबरों पर भरोसा करना काफ़ी मुश्किल था। असल में, तब स्टॉक के दामों में एक ट्रस्ट प्रीमियम या डिस्काउंट हुआ करता था। मिसाल के तौर पर, एक MNC प्रीमियम होता था, जो कमोबेश इसलिए था कि आप उनके नंबरों पर भरोसा कर सकते थे।
आज, इक्विटी मार्केट में स्थिति काफ़ी हद तक बदल गई है। कम-से-कम सबसे बड़ी 100 से 200 कंपनियों के नंबरों पर आप भरोसा कर सकते हैं। कई तरह के रेग्युलेटरी सुधारों ने भी इसमें भूमिका निभाई है, इनमें वो सुधार भी शामिल हैं जो ऑडिटिंग को लेकर किए गए और वो भी, जो GST के तहत जानकारियों की ज़रूरत के तौर पर बनाए गए। इससे भी बढ़कर, एक ख़ास साइज़ से बड़ी कंपनियों पर बहुत सारे निवेशकों और एनालिस्ट का ध्यान होने से, किसी तरह की गड़बड़ी को आसानी से पहचाना जा सकता है। पर फिर भी, अगर आप अपनी रिसर्च ख़ुद कर रहे हैं और छोटी कंपनियों में निवेश कर रहे हैं, तब आपको अपना ख़याल ख़ुद रखना आना चाहिए। बड़ी कंपनियों में, लोग बिज़नस और उसके वैल्यूएशन का ग़लत अंदाज़ा लगा बैठते हैं।
निवेश को लेकर हमेशा सही रवैया रखना और निवेश में पारंगत हो जाना आसान नहीं होता। पर आज, इसके लिए काफ़ी मदद ऑनलाइन मिल जाती है। वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन के पास ऐसे कई टूल हैं, जो आपकी काफ़ी मदद सरलता से कर सकते हैं। संभावित धोखाधड़ी पकड़ना या ऐसे ख़तरे को भांपना जो संदेहास्पद हो, हर निवेशक की टूलकिट का अहम हिस्सा होता है। इक्विटी निवेशक अपने स्वभाव से आशावादी होता है और मानता है कि अंततोगत्वा सब कुछ ठीक हो जाएगा। ज़्यादातर समय ऐसा होता भी है, मगर जब ऐसा नहीं होता, तब ज़रूरत होती है कि आप जल्द-से-जल्द असलियत पहचान सकें।

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