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संकट का संकट

बुरी ख़बरें रुकने का नाम नहीं लेतीं, कम-से-कम, कुछ लोग तो यही मानते हैं।

बुरी ख़बरें रुकने का नाम नहीं लेतीं, कम-से-कम, कुछ लोग तो यही मानते हैं।


एक निवेशक और बचतकर्ता के तौर पर, आज आप किस बात से सबसे ज़्यादा चिंतित होते हैं? क्या आपकी चिंता का कारण ब्याज दरें हैं? किसी बीमारी का एक और वेरियंट है? यूरोप की लड़ाई? एशिया में युद्ध की संभावना? या फिर जलवायु परिवर्तन है?
आज, दुनिया में ‘संकट का संकट’ है, और इसका प्रभाव लोगों के निर्णय लेने के तरीक़े पर हो रहा है। ज़ाहिर है, इसका असर उनके जीवन के हर पहलू पर होता होगा, पर मुझे उनके बिज़नस और निवेश के फ़ैसलों पर होने वाला असर साफ़-साफ़ दिखाई देता है। आप सोचेंगे, कि ये संकट का संकट क्या है। दरअसल, ये उस संकट की आशंका है, जो दुनिया भर के लोगों पर अपना असर दिखा रही है और लोग इसे किसी असल संकट जैसा पाते हैं।
बुनियादी तौर पर, ‘संकट का संकट’ एक लगातार भयभीत रहने की मनःस्थिति है, जिसे चंद लोग दुनिया भर में लगातार उकसाते और भड़काते रहते हैं-और आप सब जानते हैं कि ये लोग कौन हैं, पर उनकी बात बाद में।
दुनिया कई दशकों से लगातार संकट में है, एक ऐसा संकट, जो शायद कभी ख़त्म न हो। पहले, ऊर्जा संकट जैसी चीज़ें हुआ करती थीं। और अब, डिजिटल मीडिया और क्लिकबेट इंडस्ट्री बढ़ने के साथ-साथ ये संकट के एहसास को लगातार क़ायम रखना 24X7X365 का काम हो गया है। प्रसिद्धि और ताक़त हासिल करने के लिए लोगों को डराए रखना फ़ायदे का सौदा हो गया है।
बदक़िस्मती से, ये इस बात को हवा देता है कि निराशावादी (pessimists) = अक्लमंद (smart) और आशावादी (optimists) = अनजान (dumb). कोई भी संकट जिसका असर सारी दुनिया पर हो, ऐसा निराशावादी संदेश हेडलाइन बन जाता है, वहीं आशावादी (या जो संतुलित भी है) कहीं जगह नहीं पाता है। इसे एक्शन में देखना है तो आप कोई भी न्यूज़ चैनल खोल कर देख सकते हैं।
आइए इसकी परिभाषा देख लेते हैं। डिक्शनरी के मुताबिक़, ‘????? को ????? मानने ??? ???????? ????? को निराशाजनक ????????? से देखने की ?????? ’ निराशावाद है। वहीं दूसरी तरफ़, आशावाद का मतलब है, ‘??? अच्छी बातों और ????? में ??????? रखने ???? ???????? ।’ आपको क्या लगता है कि एक बचत करने वाला, जो अपना धन निवेश से बढ़ाना चाहता है उसके लिए सही मनःस्थिति क्या है।
किसी ने एक बार कहा था: निराशावादी स्मार्ट लगते हैं, आशावादी पैसे बनाते हैं। निराशावादी स्मार्ट क्यों लगते हैं, ख़ासतौर पर निवेश के संदर्भ में? क्योंकि उनकी बातें तथ्यों और रुझानों और आंकड़ों और अनुमानों और इसी तरह की तमाम बातों से लदी-फंदी होती हैं। वहीं दूसरी तरफ़, आशावादी अपने सिद्धांतों और मानवीय व्यवहार पर कहीं ज़्यादा भरोसा करते हैं, ख़ासतौर पर जब बात निकट भविष्य से आगे की हो। कोई निराशावादी कुछ इस तरह कहेगा-रिज़र्व बैंक ने ब्याज दरें X से बढ़ा कर Y कर दी हैं और इसलिए Z प्रतिशत कंपनियां अपने फ़ाइनांस के ख़र्च को W करोड़ रुपए तक ऊंचा होता पाएंगे। सुनने में ये काफ़ी स्मार्ट लगता है-ऐसा लगता कि बोलने वाला व्यक्ति अच्छी तरह जानता है कि क्या कुछ चल रहा है। वहीं एक आशावादी कहेगा-हां, ये हो तो सकता है, पर मुझे लगता है कि अच्छी तरह से मैनेज की जा रही क़ाबिल मैनेजमेंट वाली कंपनियां, इस परिस्थिति से निपटने का तरीक़ा ढ़ूंढ लेंगी और इस सबके बावजूद अच्छा प्रदर्शन करेंगी, क्योंकि पहले भी वो ऐसा कर चुकी हैं।
यहां, आशावादी एक अनजान चीयरलीडर की तरह लग रहा है, ऐसा जिसे तथ्यों और आंकड़ों की कोई समझ नहीं है और जो सिर्फ़ स्लोगन दे रहा है। हालांकि, समझने वाली बात है कि एक आशावादी के सही साबित होने और पैसा बनाने की संभावनाएं कहीं ज़्यादा हैं, एक बिज़नसमैन के तौर पर भी और एक इक्विटी निवेशक के तौर पर भी। एक क्वालिटी जो सफल निवेशकों और बिज़नस करने वालों में होनी ही चाहिए, वो है आशावादिता। अगर निवेशक मन से आशावादी नहीं है, तो दूसरी कोई चीज़ काम नहीं करेगी।
भविष्य को लेकर कोई-न-कोई ख़राब नज़रिया होता ही है जिसे तर्कसंगत ठहराया जा सकता है। आगे क्या होने वाला है, इसे लेकर कोई-न-कोई अनिश्चितता बनी ही रहती है। ऐसा उदासीन और भाग्यवादी परिदृष्य आपको हमेशा मिल ही जाएगा,जिसे सही ठहराया जा सकता है। इस सबका नतीजा होता है कि निराशावादी हमेशा ही ज़्यादा बड़े जानकार नज़र आते हैं। वो अपनी बातों में हमेशा ही जानकार लगते हैं, जैसे होने वाली घटनाओं के कारणों को लेकर उन्हें गहरी समझ है और भविष्य को लेकर आपके ख़ुशनुमा विश्वास, विशुद्ध चियरलीडिंग से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। मगर, सिवाए छोटे अर्से को छोड़ कर, ये लोग हमेशा ही ग़लत होते हैं। और ये हमेशा ही होता है, बिना किसी अपवाद के। हां, कुछ अर्से के लिए, जैसे - एक हफ़्ते, कुछ महीने, या ज़्यादा-से-ज़्यादा दो-तीन साल की बात हो तो निराशावादी सही हो जाते हैं, मगर उसके आगे, आशावादी हर बार जीतते हैं।
तो आप किस पक्ष को चुनेंगे?

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