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दुनिया भर में बढ़ रहीं बॉन्ड यील्ड्स, आप पर क्या होगा इसका असर?

अमेरिका से जापान तक सरकारी बॉन्ड की यील्ड दशकों के ऊंचे स्तर पर है, फेड ने तीन साल बाद ब्याज दर बढ़ा दी है और भारत में 10 साल का बॉन्ड 7% के पार निकल चुका है, जानिए इसका आपके डेट फ़ंड, आपके शेयरों और आपके क़र्ज़ के लिए क्या मतलब है

अमेरिका से जापान तक सरकारी बॉन्ड की यील्ड दशकों के ऊंचे स्तर पर है, फेड ने तीन साल बाद ब्याज दर बढ़ा दी है और भारत में 10 साल का बॉन्ड 7% के पार निकल चुका है, जानिए इसका आपके डेट फ़ंड, आपके शेयरों और आपके क़र्ज़ के लिए क्या मतलब हैSakshi/AI-Generated Image

सारांशः दुनिया भर में बॉन्ड यील्ड्स कई दशकों के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं. महंगा कच्चा तेल, ऊंची महंगाई, सरकारों का बढ़ता क़र्ज़ और ब्याज दर बढ़ने की आशंका - इन सबने मिलकर बॉन्ड बाज़ार का गणित बदल दिया है. अमेरिकी सेंट्रल बैंक ने तीन साल में पहली बार ब्याज दर बढ़ाई है और आगे एक और बढ़ोतरी का संकेत दिया है. भारत में भी 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़ गई है और निवेशक अपना पैसा कम अवधि वाले फ़ंड्स की तरफ ले जा रहे हैं. यील्ड बढ़ने का असर सिर्फ बॉन्ड बाज़ार तक सीमित नहीं रहता - यह आपके निवेश और आपके क़र्ज़, दोनों तक पहुंचता है.

बॉन्ड यील्ड ऐसा शब्द है जो आमतौर पर बिज़नेस अख़बारों के अंदर के पन्नों में रहता है. लेकिन पिछले कुछ हफ़्तों में यह हर जगह दिख रहा है. अमेरिका के 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 2023 के बाद पहली बार 5 प्रतिशत पर पहुंची. Goldman Sachs Research के मुताबिक़, 30 साल का अमेरिकी बॉन्ड 8 सितंबर तक करीब 5.2 प्रतिशत पर था, जो दो दशकों से भी ज़्यादा का ऊंचा स्तर है. जापान और ब्रिटेन के लंबी अवधि वाले बॉन्ड इस सदी के और जर्मनी के 2009 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर हैं.

भारत भी इससे अछूता नहीं है. 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड जुलाई के आख़िर में 6.83 प्रतिशत, अगस्त के आख़िर में 6.95 प्रतिशत थी और 21 सितंबर तक 7.06 प्रतिशत पर पहुंच गई.

यहां एक बुनियादी बात समझ लेना ज़रूरी है. बॉन्ड की क़ीमत और उसकी यील्ड उलटी दिशा में चलती हैं. जब निवेशक बॉन्ड बेचते हैं, क़ीमत गिरती है और यील्ड चढ़ जाती है. यानी यील्ड बढ़ने का मतलब है कि बॉन्ड बिक रहे हैं और नए ख़रीदार पहले से ज़्यादा रिटर्न मांग रहे हैं.

यील्ड क्यों चढ़ रही है

महंगा तेल: पश्चिम एशिया में तनाव और सऊदी अरब की एक अहम तेल पाइपलाइन बंद होने के बाद ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. महंगा तेल ढुलाई, उत्पादन और ईंधन का ख़र्च बढ़ाता है, जिससे महंगाई लंबे समय तक ऊंची रह सकती है.

फेड ने बढ़ाईं दरेंः अमेरिका में अगस्त की महंगाई अनुमान से ज़्यादा रही और 16 सितंबर को फेडरल रिजर्व ने अपनी बेंचमार्क दर 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 3.75-4 प्रतिशत के दायरे में कर दी, जो 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी है. फ़ैसला सर्वसम्मति से हुआ और नए अनुमान इस साल एक और बढ़ोतरी की संभावना की तरफ इशारा कर रहे हैं.

सरकारों का बढ़ता क़र्ज़: कोविड के बाद विकसित देशों का फिस्कल डेफिसिट काफ़ी बढ़ गया है. Goldman Sachs Research के एनालिसिस के मुताबिक़, AI में निवेश के लिए हो रही उधारी भी करीब ग्लोबल GDP के 1 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. यानी दुनिया में सेविंग्स को आकर्षित करने के लिए कॉम्पीटिशन बढ़ गया है, और जब क़र्ज़ लेने वाले ज़्यादा हो जाएं तो ब्याज ऊपर जाता है.

Goldman Sachs में यूरोपियन रेट्स स्ट्रैटजी के हेड जॉर्ज कोल ने एक वेबिनार में कही एक बात ख़ास तौर पर ध्यान देने लायक है - यील्ड में यह बढ़ोतरी घबराहट वाली उठापटक के साथ नहीं, बल्कि बहुत व्यवस्थित तरीके से हुई है. अगर यील्ड बुनियादी वजहों से चढ़ी है, तो नीचे आने के लिए भी बुनियादी हालात में बदलाव ज़रूरी होगा.

जापान का कनेक्शन, जो सबसे कम समझा जाता है

CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, महंगाई, बैंक ऑफ जापान का दर बढ़ाना और सरकार के ख़र्च की योजनाओं पर निवेशकों की चिंता आदि वजहों के चलते जापान में बॉन्ड यील्ड तीन दशकों के सबसे ऊंचे स्तर पर है. 15 सितंबर को वहां 10 साल के बॉन्ड की यील्ड 3.030 प्रतिशत पर थी और 18 सितंबर को बैंक ऑफ जापान ने पॉलिसी रेट बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दी.

तीन दशक तक जापान दुनिया के लिए सस्ते पैसे का स्रोत था - वहां ब्याज लगभग शून्य था, तो जापानी निवेशक पैसा बाहर लगाते थे, जिसमें अमेरिकी सरकारी बॉन्ड बड़ी मात्रा में शामिल थे. अब जापान में ही अच्छा ब्याज मिलने लगा है, तो वह पैसा घर लौट रहा है.

यहीं से अमेरिका की चिंता शुरू होती है. CNN के मुताबिक़, अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने इस साल येन को सहारा देने के लिए बाज़ार में दख़ल देने का असाधारण अभियान चलाया है. विश्लेषकों के मुताबिक़, इसका मक़सद यह है कि जापान को येन की क़ीमत बढ़ाने के लिए अपनी डॉलर एसेट्स - जैसे US ट्रेजरी - बेचने पर मजबूर न होना पड़े. ट्रेजरी में बिकवाली और बढ़ी, तो अमेरिकी ब्याज दरें ऐसे समय और ऊपर जा सकती हैं जब यील्ड पहले से चढ़ रही है.

यह भी पढ़ेंः इक्विटी फ़ंड का पैसा कब लिक्विड फ़ंड में डाल देना चाहिए?

आप पर क्या होगा असर?

1. डेट फ़ंड

यहीं सबसे सीधा असर पड़ता है. डेट फ़ंड के पोर्टफ़ोलियो में बॉन्ड होते हैं और यील्ड बढ़ने पर उनकी क़ीमत गिरती है, जिससे फ़ंड की NAV पर दबाव आता है. लेकिन हर डेट फ़ंड पर बराबर असर नहीं होता - लंबी अवधि वाले बॉन्ड रखने वाले फ़ंड्स की NAV ज़्यादा हिलती है, कम अवधि वाले पेपर रखने वालों पर असर कम होता है.

निवेशक भी इस बात को समझ चुके हैं. अगस्त के आंकड़े देखिए:

कैटेगरी अगस्त में शुद्ध निवेश (₹ करोड़)
लिक्विड फ़ंड 19,934
मनी मार्केट फ़ंड 11,734
अल्ट्रा-शॉर्ट ड्यूरेशन फ़ंड 4,257
गिल्ट फ़ंड -1,824
कॉरपोरेट बॉन्ड फ़ंड -3,190
शॉर्ट ड्यूरेशन फ़ंड -4,259
ओवरनाइट फ़ंड -30,654
बाक़ी सभी डेट कैटेगरी -4,126
कुल ओपन-एंडेड डेट फ़ंड -8,127
स्रोत: AMFI

जुलाई में डेट फ़ंड्स में ₹1.88 लाख करोड़ आए थे, अगस्त में ₹8,127 करोड़ निकल गए. लेकिन यह हेडलाइन नंबर पूरी कहानी नहीं बताता - पैसा फ़िक्स्ड इनकम से बाहर नहीं गया, कम अवधि वाली कैटेगरी में आता रहा और ज़्यादा इंटरेस्ट रेट्स के लिहाज़ से संवेदनशील कैटेगरी से निकला.

फ़ाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में Kotak Mahindra AMC में हेड (रिटेल सेल्स) ओवास बख्शी ने बताया कि इससे पता चलता है कि निवेशक तीन चीज़ें चाहते हैं - लिक्विडिटी की सुविधा, ब्याज दर का कम जोखिम और अनुमानित रिटर्न.

ओवरनाइट फ़ंड से निकली ₹30,654 करोड़ की रक़म को अलग से समझना ज़रूरी है, क्योंकि जुलाई में इसमें ₹40,413 करोड़ आए थे. बख्शी के मुताबिक़, यह कैटेगरी बड़ी कंपनियों के कैश मैनेजमेंट से चलती है, इसलिए इसे रिटेल निवेशकों के मन बदलने का संकेत मानना ठीक नहीं. DSP Mutual Fund में हेड (फ़िक्स्ड इनकम) संदीप यादव ने इसी रिपोर्ट में दूसरी वजह बताई - सिस्टम में ज़्यादा नक़दी से ओवरनाइट रेट नरम पड़ गए, तो निवेशक बेहतर रिटर्न के लिए लिक्विड और मनी मार्केट फ़ंड में चले गए. HDFC AMC में हेड (फिक्स्ड इनकम) अनिल बांबोली जोड़ते हैं कि अगस्त में ओवरनाइट रेट 5.25 प्रतिशत के रेपो रेट से काफ़ी नीचे थे, जबकि 31 अगस्त तक लिक्विड फ़ंड की यील्ड 6 से 6.25 प्रतिशत के दायरे में थी.

2. शेयर

यील्ड बढ़ने से शेयर बाज़ार पर दो तरह का दबाव आता है. एक, सुरक्षित सरकारी बॉन्ड में अच्छा रिटर्न मिलने लगे तो निवेशक शेयरों का जोखिम उठाने की ज़रूरत कम महसूस करते हैं. दो, कंपनियों के लिए क़र्ज़ महंगा हो जाता है. ऊंचे वैल्यूएशन वाली टेक्नोलॉजी कंपनियों पर यह असर ज़्यादा दिखता है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़, Jefferies के क्रिस वुड ने अपने वीकली नोट 'ग्रीड एंड फियर' में चेताया था कि 10 साल की अमेरिकी यील्ड का 5 प्रतिशत के ऊपर जाना दुनिया भर के शेयर बाज़ारों में बड़ी गिरावट का संकेत बन सकता है.

लेकिन अतीत अलग तस्वीर दिखाता है. Investing.com की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, Goldman Sachs Research के चीफ US इक्विटी स्ट्रैटजिस्ट बेन स्नाइडर ने लिखा है कि पिछले कुछ दशकों की सात रेट-हाइक साइकल की शुरुआत में S&P 500 औसतन तीन महीने में 2 प्रतिशत गिरा, लेकिन 12 महीने में औसतन 9 प्रतिशत चढ़ा - 2022 को छोड़कर हर बार पॉज़िटिव रिटर्न. उनका कहना है कि मध्यम अवधि में शेयरों की दिशा यील्ड से नहीं, कंपनियों की कमाई से तय होगी. इसी रिपोर्ट के मुताबिक़, S&P 500 का फॉरवर्ड P/E इस साल 22 गुना से 19 गुना पर आ गया है, लेकिन बॉन्ड के मुक़ाबले शेयरों का वैल्यूएशन लगभग वहीं है. यानी शेयर सस्ते नहीं हुए, बॉन्ड आकर्षक हो गए.

3. आपका क़र्ज़

बॉन्ड यील्ड ब्याज दरों का पैमाना है. अगर RBI दर बढ़ाता है, तो फ्लोटिंग रेट होम लोन की EMI या लोन की अवधि, इनमें से कुछ बढ़ेगा. कार लोन और पर्सनल लोन पर भी असर पड़ता है. दूसरी तरफ FD और स्मॉल सेविंग्स पर ब्याज बेहतर हो जाता है. यानी यह क़र्ज़ लेने वाले के लिए बुरी ख़बर है, लेकिन बचत करने वाले के लिए अच्छी.

एक एक्सपर्ट के मुताबिक़, फ़िक्स्ड इनकम के भाव में बहुत सारी नकारात्मक बातें पहले से शामिल हो चुकी हैं, इसलिए धीरे-धीरे ड्यूरेशन बढ़ाना ठीक हो सकता है. ICICI Prudential का एक नोट कहता है कि भारतीय बॉन्ड बाज़ार आकर्षक दिख रहा है.

आगे क्या होगा? यह 10 साल की यील्ड की दिशा, RBI की नक़दी नीति, घरेलू महंगाई, तेल के भाव और ग्लोबल यील्ड पर टिका है. 

आपको क्या करना चाहिए

सबसे ज़रूरी बात ड्यूरेशन को अपने गोल से मिलाना है. पैसा दो-तीन साल में चाहिए तो लंबी अवधि वाले फ़ंड में नहीं होना चाहिए, चाहे पिछले रिटर्न कितने भी अच्छे दिखे हों. कुछ महीनों के लिए रखे पैसे के लिए लिक्विड और मनी मार्केट फ़ंड ही सही हैं.

दूसरी बात, घबराकर बाहर न निकलें. यील्ड बढ़ने से NAV गिरती है, लेकिन फ़ंड के पास जो बॉन्ड हैं वे अब ज़्यादा ब्याज कमा रहे हैं और समय के साथ यह रिटर्न में दिखता है. तीसरी, लंबी अवधि में जाना है तो एक बार में नहीं, चरणों में जाएं.

और आख़िरी बात - डेट फ़ंड इक्विटी का विकल्प नहीं हैं. ये पोर्टफ़ोलियो को स्थिरता देने के लिए होते हैं. यील्ड बढ़ने का यह दौर इनसे ज़्यादा उम्मीद लगाने का समय नहीं, बल्कि यह देखने का समय है कि आपका पैसा सही अवधि वाले फ़ंड में है या नहीं.

आपका डेट फ़ंड आपकी ज़रूरत से मेल खाता है या नहीं?

यील्ड बढ़ने का असर हर डेट फ़ंड पर अलग पड़ता है. जो फ़ंड तीन साल बाद के गोल के लिए सही है, वही छह महीने के पैसे के लिए ग़लत हो सकता है. Value Research Fund Advisor आपको बताता है कि किस फ़ंड में बने रहना है, किसमें नया पैसा लगाना है और किससे निकलना है.

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ये लेख पहली बार सितंबर 22, 2026 को पब्लिश हुआ.

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