
क्या आपने ESG इन्वेस्टिंग के बारे में सुना है? सुना ही होगा. ये फ़ंड मैनेजमेंट इंडस्ट्री की बाज़ीगरी दिखाने की लंबी फ़ेरहिस्त में एक और नाम है, जिसे इसलिए गढ़ा गया है कि फ़ंड के प्रदर्शन की बराबरी के आधार पर तुलना न की जा सके. मुझे लगता है, आप अचरज में पड़ गए होंगे, शायद आपको झटका सा लगा हो. कहां तो आपने सोचा होगा कि फ़ंड की दुनिया के इस तोहफ़े से दुनिया का कितना भला होगा और कहां मैं उलटी और उदासीन बातें कर रहा हूं. चलिए ज़रा ठहरते हैं, और देखते हैं कि यहां असली दिक़्क़त क्या है. इसमें कोई शक़ नहीं कि हरेक बिज़नस का, और लोगों का रवैया ऐसा होना चाहिए कि वो पर्यावरण और सामाजिक सरोकार के लक्ष्यों की रक्षा करने वाला हो.
हालांकि अंत में जो मिल रहा है (शायद), वो एक नई तरह की स्वयंभू लालफीताशाही है जो दावा करती है कि बिज़नस का आकलन वो करेंगे. वही तय करेंगे कि कोई बिज़नस उनके ऊंचे लक्ष्यों के मुताबिक़ काम कर रहे हैं या नहीं. इससे भी बुरा ये है - और ये मेरी असली चिंता है कि फ़ंड मैनेजमेंट इंडस्ट्री ESG ( Environmental, Social, and Governance) को निवेश के पैमाने के तौर पर अपना रही है. आप पूछ सकते हैं कि क्या ये अच्छी बात नहीं है?
सुनने में तो ये अच्छा लगता है, मगर मेरे संदेह के लिए मुझे माफ़ करें. मुझे लगता है कि आपके फ़ंड के प्रदर्शन को किसी बेंचमार्क या एक जैसे फ़ंड से तुलना करने के काम को मुश्किल बनाया जा रहा है. पिछले दो दशकों में, मैंने निवेश की कई नई और तथाकथित इनोवेटिव थीम देखी हैं, जिनकी कल्पना इसी मक़सद से की गई थी.
ये भी पढ़िए- जोएल ग्रीनब्लाट के साथ वैल्यू इन्वेस्टिंग के अहम सबक
ये बात उस दिन सामने आ गई जब मुझे एहसास हुआ कि भारत के सबसे पुराने इक्विटी फंड्स में से एक फ़ंड अब ESG फंड बन गया है. इस फ़ंड की स्थापना 1990 में की गई थी और ये लार्ज-कैप इक्विटी फ़ंड्स में लंबे समय तक का रिटर्न को देखने के लिए काफ़ी काम का था. हालांकि, तीन दशक के बाद, अब इसने ESG फ़ंड का चोला ओढ़ लिया है. अब धीरे-धीरे इसका इतिहास बेमानी हो जाएगा, और इसी जैसे फ़ंड्स के साथ इसकी तुलना का असंभव हो जाएगी. मैं इस फ़ंड के पीछे नहीं पड़ना चाहता, मगर भारत में 10 के आसपास जो ESG फ़ंड हैं, उन्हें लेकर अपनी बात कहना चाहता हूं. दरअसल अब, एक पूरी की पूरी नई इंडस्ट्री बनने जा रही है. इसमें होंगे ESG इंडेक्स, ESG रेटिंग एजेंसियां और ESG कंसल्टेंट. मुझे इससे कोई परेशानी नहीं है, पैसे बनाना हर किसी की ज़रूरत है, और नए-नए बिज़नस लगातार आते ही रहते हैं. अगर आप जानना चाहते हैं कि यहां क्या हो रहा है, तो आप 'greenwashing' गूगल कीजिए. ये व्हाइट-वॉशिंग का क़रीबी रिश्तेदार है.
हालांकि, म्यूचुअल फ़ंड निवेशकों को सतर्क हो कर देखना चाहिए और इसके पीछे छिपे मक़सद को साफ़-साफ़ समझना चाहिए. फ़ंड कंपनियां थीम ईजाद करती हैं, अपने ग्राहकों को भ्रमित करने के लिए और अपने दोयम दर्जे के फ़ंड्स को बेचने के लिए. ये मार्केटिंग की बड़ी बुनियादी तरक़ीब है जिसके तहत, बेचने वाले अपने प्रोडक्ट को जितना हो सके अलग दिखाने की कोशिश करते हैं. इसलिए, फ़ंड कंपनियां अपने निवेश के तरीक़े को अनोखा या यूनीक बताती हैं. ये फ़ंड को दूसरों से अलग दिखाने कोशिश होती है – ताकि फ़ंड कंपनी ये दावा कर सके कि उसका मूल्यांकन उसके बताए गए पैमानों पर ही हो और उसकी तुलना किसी दूसरे फ़ंड से न हो सके.
जहां तक आपका यानी एक निवेशक का सवाल है, किसी भी फ़ंड कंपनी को पांच से ज़्यादा फ़ंड्स रखने की ज़रूरत नहीं. ये पांच तरीक़े के फ़ंड इस तरह हैं - एक कंज़रवेटिव और एक एडवेंचर वाला इक्विटी फ़ंड, एक लिक्विड फ़ंड, एक इनकम फ़ंड और एक इक्विटी-इनकम हाइब्रिड. इक्विटी और हाइब्रिड वाले फ़ंड के वेरिएंट टैक्स बचाने वाले फ़ंड हो सकते हैं. इन्हीं पांच तरीक़े के फ़ंड्स से निवेशकों की सभी ज़रूरतें पूरी की जा सकती हैं. हां, कैटेगरी के असली नाम रेग्युलेटरी ज़रूरतों के मुताबिक़ अलग हो सकते हैं, मगर इस तरह के म्यूचुअल फ़ंड किसी भी आम निवेशक की बचत और निवेश की सभी ज़रूरतों को पूरा कर सकते हैं.
ये ज़रा क्रांतिकारी प्लान लग सकता है, पर असल में इसी तरह की सरलता म्यूचुअल फ़ंड्स को किसी आम निवेशक के समझने लायक़ बनाएगी. तभी ये संभव हो सकेगा कि आपकी बचत की ज़रूरतें तयशुदा नतीजे दे सकें, और उन पर बिज़नस की दुनिया के तमाम फ़ैशन का कोई असर न हो.
ये भी पढ़िए- पीटर लिंच जैसे ज़बर्दस्त इन्वेस्टर कैसे बनेंगे आप?


