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एक बर्बादी और...

एक और क्रिप्टो के ढह जाने में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। अचरज की बात तो ये है कि लोग अब भी अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई इस धोखाधड़ी में झोंकने के लिए तैयार हैं


एक और क्रिप्टो के ढह जाने में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। अचरज की बात तो ये है कि लोग अब भी अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई इस धोखाधड़ी में झोंकने के लिए तैयार हैं

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एक बड़ा क्रिप्टोकरंसी एक्सचेंज बैंकरप्ट हो हो गया है, और उसके बाद, कई क्रिप्टो एक्सचेंज ने पैसे निकालने पर रोक लगा दी है। क्या आप पिछले वाक्य में एक बड़ी ग़लती पकड़ पाए? ग़लत शब्द है, एक्सचेंज। काफ़ी हद तक, जिन लोगों (आम लोगों) ने पिछले एक साल या ऐसे ही अर्से में इसलिए अपना पैसा गंवाया है क्योंकि वो एक्सचेंज के काम को लेकर भ्रमित रहे हैं। इक्विटी ट्रेडिंग या डेट ट्रेडिंग में, एक्सचेंज वो संस्था है जो ख़रीदार और बेचने वाले को एक जगह पर लाती है। क्रिप्टो में, एक्सचेंज का मतलब होता है बैंक, डिपॉज़िटरी, म्यूचुअल फ़ंड, और वो कंपनी जो स्टॉक जारी करती है। और हां, रेग्युलेटर भी! असल में, इसका मतलब है एक्सचेंज होने के सिवाए दूसरा सबकुछ होना।
उन तथ्यों पर ग़ौर कीजिए जो FTX के बैंकरप्ट होने की शाम को उसकी बैलेंस शीट से उजागर हुए हैं। लाइबिलिटी के नज़रिए से, FTX का क़रीब USD 9 बिलियन का फ़ंड है, जो ज़्यादातर ग्राहकों ने जमा करवाया है। एसेट के नज़रिए से, इसकी भुनाई जा सकने वाली होल्डिंग इस रक़म का क़रीब 1/10 प्रतिशत है। इसमें से ज़्यादातर रक़म या तो ग़ायब है या फिर 'क्रिप्टो टोकन' के तौर पर है, जो ख़ुद इसने बनायी है। बुनियादी तौर पर, ये एक काल्पनिक पैसा है। एक एक्सचेंज, ग्राहकों का पैसा अपने पास क्यों रखे किए हुए था? क्योंकि क्रिप्टो एक्सचेंज, एक्सचेंज हैं ही नहीं। ये तो बैंक या म्यूचुअल फ़ंड की तरह है, सिवा इस फ़र्क़ के, कि ये पूरी तरह से अन-रेग्युलेटेड है।
लंबे समय से, हममें से कुछ लोग साफ़-साफ़ कहते आ रहे हैं कि पूरा क्रिप्टो ही चोरों और अपराधियों के लिए है। कुछ गोरखधंधों में लिप्त लोग होंगे ही, जो इसे रैनसमवेयर और मनी-लॉन्डरिंग के लिए इस्तेमाल करेंगे, वहीं कुछ ऐसे सफ़ेदपोश भी होंगे जैसे FTX है। अंत में, होते हैं वो बचत करने वाले, जिनपर क्रिप्टो रैकेट की मार पड़ती है और यही लोग नुकसान झेलते हैं। सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया की कहानियों पर एक सरसरी नज़र डालने पर ही समझ में आ जाता है कि बहुत सारे भारतीय अब भी इंटरनेशनल एक्सचेंजों के ज़रिए क्रिप्टो में पैसे लगा रहे हैं। टैक्स के और दूसरे नियमों ने ये पक्का कर दिया है कि भारत में ये सब काफ़ी हद तक सीमित हो जाए।
इसके साथ ही ये कहना ग़लत नही है कि क्रिप्टो की एक वैद्ध निवेश के तरीक़े के तौर पर स्वीकार्यता का माहौल बनाने के लिए मास मीडिया काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार है। आज भी, एक स्नोबॉलिंग ग्लोबल इनसॉल्वेंसी क्राइसिस के साथ क्रिप्टो कंपनियों में ये चर्चा आम है कि नियमों की कमी के कारण कुछ मुश्किलें तो हैं, लेकिन ये स्थाई नहीं हैं और क्रिप्टो का भविष्य उज्ज्वल है। हर बार जब कोई क्रिप्टो संकट होता है, तब ऐसे लोगों की कमी नहीं होती जो इस मसले को लेकर ज़ोर-शोर से कहने लगते हैं कि ये तो एक सेब के ख़राब निकल जाने का मामला है। जैसे कि आमतौर पर क्रिप्टो एक साफ़-सुथरा बिज़नस है, सिवाए एक-आध सेब के ख़राब निकल जाने के। ऐसे तर्क के फेर में पड़ना बड़ी भारी ग़लती होगी। ये बिज़नस, डिज़ाइन ही किया गया है ख़राब सेबों के लिए, और हो सकता है आपको जल्द ही कई और मिल भी जाएं। इस साल मई के महीने में जब लूना नाम की एक करंसी बर्बाद हुई, उस समय का एक कमेंट मुझे याद आ रहा है, जो मैंने ट्विटर पर देखा था। तब किसी ने कहा था: मैं लोगों के क्रिप्टो की हर बात को एक धोखेधड़ी की स्कीम कहे जाने से तंग आ चुका हूं। कुछ क्रिप्टो प्रोजैक्ट पंप-और-डंप स्कीमें हैं, वहीं कुछ दूसरी पिरामिड स्कीमें हैं। कुछ और, स्टैंडर्ड-इशू किए हुए फ़्रॉड हैं। तो कुछ दूसरों में बिचौलिये ऊपर की मलाई खा रहे हैं। इस इंडस्ट्री की विविधता को नज़रअंदाज़ करना बंद करें। ये बात, असलियत में जो हो रहा है उसे सटीक तरीक़े से परिभाषित करती है।
ईमानदारी से कहें, तो क्रिप्टो का रैकेट अब पूरी तरह से पैर जमा चुका है। इसे ग्लोबल स्तर पर ख़त्म किए जाने का समय गुज़र चुका है। इसमें लोगों की बचत उनसे ले कर उन्हें मूर्ख बनाने में बड़ा पैसा है। ये व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वो समझदारी से काम लें और ख़ुद को बचाए रखें। क्रिप्टोकरंसियों के अस्तित्व का कोई बुनियादी तर्क नहीं है। इसे ख़रीदने का सिर्फ़ एक ही कारण है और वो है दाम। तो जब दाम गिरते हैं, तो ये एकमात्र कारण भी दम तोड़ देता है। इसकी वैल्यू कैलकुलेट करने का कोई दूसरा तरीक़ा नहीं है। ये एक जुआ है, प्योर और सिंपल। इसमें और कुछ भी नहीं है। इस सब के ऊपर टैक्स जैसे मुद्दे हैं और फिर ऐसे संदेहास्पद संस्थानों से लेने-देन करने की ज़रूरत पड़ती है जो स्व-घोषित एक्सचेंज हैं और जिन्हें कोई भी रेग्युलेट नहीं कर रहा है। फिर भी अगर आपको जुआ खेलना ही है तो ज़रूर खेलिए, मगर फिर मत कहिएगा कि किसी ने चेताया नहीं।

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