
सारांशः रेगुलर और डायरेक्ट म्यूचुअल फ़ंड प्लान का पोर्टफ़ोलियो एक ही होता है, लेकिन एक्सपेंस रेशियो अलग होता है, जिससे रेगुलर प्लान महंगा पड़ता है. लेकिन क्या इनका NAV भी अलग होता है? आइए जानते हैं.
क्या किसी म्यूचुअल फ़ंड के रेगुलर प्लान का NAV, डायरेक्ट प्लान से अलग होता है? और अगर हां, तो एक तय रक़म पर मिलने वाली यूनिट्स की संख्या भी अलग होगी? - शाम मोर
जब आप किसी म्यूचुअल फ़ंड में निवेश करते हैं, तो आप उसके NAV पर यूनिट्स ख़रीदते हैं. लेकिन एक बात जो बहुत से निवेशक नज़रअंदाज़ कर देते हैं, वो यह है कि एक ही फ़ंड के डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के NAV अलग-अलग होते हैं. और यह फ़र्क़ भले ही छोटा लगे, लेकिन इसका असर आपको मिलने वाली यूनिट्स की संख्या पर पड़ता है. आइए समझते हैं क्यों.
म्यूचुअल फ़ंड का NAV मुख्य रूप से दो चीज़ों पर निर्भर करता है - फ़ंड का संबंधित पोर्टफ़ोलियो और उसका एक्सपेंस रेशियो.
इसे इस फ़ॉर्मूले से निकाला जाता है:
NAV = (पोर्टफ़ोलियो की सिक्योरिटीज़ की मार्केट वैल्यू - ख़र्च) / फ़ंड की कुल आउटस्टैंडिंग यूनिट्स
रेगुलर और डायरेक्ट प्लान का संबंधित पोर्टफ़ोलियो एक ही होता है, लेकिन एक्सपेंस रेशियो अलग होता है, और यही NAV को प्रभावित करता है. रेगुलर प्लान का एक्सपेंस रेशियो ज़्यादा होता है, क्योंकि इसमें डिस्ट्रीब्यूटर का कमीशन जुड़ा होता है. डायरेक्ट प्लान में कोई डिस्ट्रीब्यूटर नहीं होता, इसलिए एक्सपेंस रेशियो कम होता है. नतीजतन, रेगुलर प्लान का NAV, डायरेक्ट प्लान के मुक़ाबले कम होता है.
अब रही बात यूनिट्स की. एक तय रक़म पर निवेशक को कितनी यूनिट्स मिलेंगी, यह उस रक़म और फ़ंड के NAV के बीच का गणित है. NAV वह क़ीमत है जिस पर एक यूनिट मिलती है. यानी यूनिट्स की संख्या = निवेश की रक़म ÷ NAV.
मान लीजिए डायरेक्ट प्लान का NAV ₹11 है. ₹10,000 लगाने पर 909.09 यूनिट्स मिलेंगी. वहीं, उसी स्कीम के रेगुलर प्लान का NAV ₹10 है, तो निवेशक को 1,000 यूनिट्स मिलेंगी. तो यूनिट्स की संख्या ज़रूर अलग होती है.
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ये लेख पहली बार मई 18, 2026 को पब्लिश हुआ.
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