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टैक्स से परे, आपका नुकसान और फ़ायदा

ज़्यादा-से-ज़्यादा टैक्स बचाने के लिहाज़ से निवेश करना आपका हक़ भी है और ज़िम्मेदारी भी, हमारी म्यूचुअल फ़ंड इनसाइट मैगज़ीन की इस बार की कवर स्टोरी आपका यही काम आसान करेगी

ज़्यादा-से-ज़्यादा टैक्स बचाने के लिहाज़ से निवेश करना आपका हक़ भी है और ज़िम्मेदारी भी, हमारी म्यूचुअल फ़ंड इनसाइट मैगज़ीन की इस बार की कवर स्टोरी आपका यही काम आसान करेगी

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इस महीने की म्यूचुअल फ़ंड इनसाइट मैगज़ीन के मई 2023 के इशू की कवर स्टोरी, टैक्स बचाने के लिहाज़ से बेहतर निवेश की बात कर रही है. स्टोरी करने की एक वजह यूनियन बजट के ठीक पहले, कुछ कैटेगरी के फ़ंड्स में टैक्स स्ट्रक्चर का बदलाव है. और टैक्स में बदलावों के चलते बड़े पैमाने पर की गई फ़ंड इन्वेस्टमेंट की ग़लत तरीक़े की सेल (mis-selling) इस स्टोरी को करने की दूसरी वजह है.

कुछ म्यूचुअल फ़ंड्स बेचने वालों ने, पहली अप्रैल से लागू होने वाले टैक्स के नए नियम का हवाला देकर ख़रीदने की ज़ोरदार हवा बनाई. ये काम 24 मार्च से 31 मार्च तक किया गया. इसके बारे में आप म्यूचुअल फ़ंड इनसाइट के इस बार के अंक में विस्तार से पढ़ सकते हैं. पर असल मुद्दा है कि सेल्समैन, निवेशकों को अपने निवेशों से बाहर निकलने के लिए, और उस पैसे को अपने फ़ंड्स में लगाने के लिए उकसाते रहे. कुछ AMCs ने तो अपने इंटरनेशनल फ़ंड्स में एकमुश्त (lump sum) निवेश को 31 मार्च तक के लिए दोबारा खोल दिया, ताकि निवेशकों में जो घबराहट उन्होंने फैलाई थी, उसका फ़ायदा उठा सकें.

सच तो ये है कि अगर आप पहले ही इन फ़ंड्स में निवेश नहीं कर रहे थे, तो इस समय ऐसा करने से कोई बड़ा फ़ायदा नहीं मिलने वाला था. रिटर्न पर जो टैक्स पहले लगता था, वो अब भी वैसा ही है, और इन फ़ंड्स का स्वभाव भी नहीं बदला. और अगर 23 मार्च तक ये फ़ंड आपके निवेश के लिए सही नहीं थे, तो इस तारीख़ के बाद भी ये फ़ायदेमंद नहीं हुए, और भविष्य में भी इनका स्वभाव बदलने वाला तो है नहीं. दरअसल, इन फ़ंड्स को बेचने वाले, इन्हें चुनने के लिए निवेशकों के पीछे इसलिए पड़े रहे, ताकि भविष्य में बढ़ने वाले टैक्स से निवेशकों को राहत मिल सके. पर ध्यान देने वाली बात है कि इसमें ये ख़याल तो रखा ही नहीं गया कि जिन फ़ंड्स पर टैक्स का असर होने वाला है, वो फ़ंड निवेशकों की ज़रूरत के मुताबिक़ हैं भी या नहीं. ये रवैया और कुछ नहीं, निवेशक को नुक़सान पहुंचाने वाला रहा.

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किसी भी निवेश पर टैक्स कम-से-कम ही लगना चाहिए और निवेश का मतलब ही तभी सही बैठता है जब उस निवेश पर टैक्स की देनदारी कम हो. क्योंकि टैक्स का असर आपके पूरे के पूरे निवेश और उसके मुनाफ़े पर पड़ सकता है. ये बात अहम है और इसे सभी समझते हैं, मगर ये पहलू किसी निवेश में सबसे बड़ी चिंता का कारण नहीं होना चाहिए. इसके बजाए, आपकी प्राथमिकता आपके आर्थिक लक्ष्य के मुताबिक़ होनी चाहिए, और आपको अपने निवेश का चुनाव अपने उसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर करना चाहिए. अपना फ़ाइनेंशियल गोल तय करते हुए आपको कई तरह के फ़ैक्टर ध्यान में रखने चाहिए, जिसमें आपकी रिस्क लेने की क्षमता, पढ़ाई के लिए फ़ंडिंग, या पूंजी को सुरक्षित रखने जैसी तमाम बातें शामिल होनी चाहिए.

लंबे समय के लिए किए गए निवेश के लक्ष्य हासिल करने की सबसे अहम बात है कि आप फ़ैसला लेते समय इन प्राइमरी फ़ैक्टर्स को अपने निवेश में शामिल करें. टैक्स को बेहतर तरीक़े से बचाने पर फ़ोकस करना तब बेहद फ़ायदेमंद है जब आपके चुने हुए निवेश आपके जीवन के लक्ष्यों से सटीक तरीक़े से मेल खाते हों. इसलिए टैक्स, आपकी निवेश यात्रा का अहम हिस्सा तो है मगर ये सबसे बड़ा हिस्सा नहीं है.

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और फिर म्यूचुअल फ़ंड्स में निवेश आसान होना चाहिए. जब तक आप बहुत ज़्यादा सोच, और कुछ ज़्यादा ही प्लानिंग में नहीं उलझ जाते, ये आसानी से किया भी जा सकता है. पर बदक़िस्मती से, बहुत से लोग इसे मुश्किल बनाकर पेश करने लगते हैं. कुछ लोग अपने प्रोफ़ेशन और बिज़नस में अव्वल रहने के लिए ऐसा करते हैं, और कुछ दूसरे लोग, सोशल मीडिया के तथाकथित 'इन्फ़्लुएंसर' होने के चलते ऐसा करते हैं. पर फ़ंड निवेश को आसान रखने के जिस मंत्र की बात वैल्यू रिसर्च दशकों से करता आ रहा है, ये बात उसके ख़िलाफ़ है.

टैक्स के जो बदलाव हाल ही में हुए हैं, जिन्हें आमतौर पर डेट फ़ंड के बदलाव कहा जा रहा है. उन्हें लेकर ये मत समझिए कि हम फ़िक्स्ड इनकम के ख़िलाफ़ हैं. हालांकि, जो लोग हमें अर्से से पढ़ते आ रहे हैं उन्होंने ज़रूर नोटिस किया होगा कि जिस फ़िक्स्ड इनकम इन्वेस्टमेंट पर ज़्यादातर भारतीय निर्भर रहते हैं, मैं उस निर्भरता के ख़िलाफ़ काफ़ी मुखर रहा हूं.

दरअसल, पारंपरिक तौर पर भारत एक 'फ़िक्स्ड इनकम वाला देश' रहा है. बचत करने वाले, पीढ़ियों से अपनी बचत की सभी ज़रूरतों के लिए PPF, बैंक डपॉज़िट, जैसे तरीक़ों से पैसे बचाते आ रहे हैं. दूसरी तरफ़, अब ये भी दिखने लगा है कि कुछ युवा बचतकर्ताओं ने इक्वटी में निवेश का मंत्र कुछ ज़्यादा ही अपना लिया है. बचत करने वाले जो लोग इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड से अपने निवेश की शुरुआत करते हैं, और उनका शुरुआती अनुभव सुखद रहता है, वो अति-उत्साह में अपनी पूरी की पूरी बचत इक्विटी में ही निवेश करने लगते हैं. ये ठीक वैसी ही ग़लती है, जैसी फ़िक्स्ड इनकम में ज़्यादा निवेश करने की होती है.

भारतीय निवेश का एक सत्य ये भी रहा है कि फ़िक्स्ड इनकम की चुनौती, इक्विटी से ज़्यादा रही. कुछ अजीब ज़रूर लगेगा, पर टैक्स में किए गए मौजूदा बदलाव इस चुनौती को सरल बना रहे हैं. उससे भी बड़ी बात है कि जो लोग ज़ीरो टैक्स या सबसे निचले टैक्स ब्रैकेट में हैं, उनके लिए टैक्स अब कम हो जाएगा. कम टैक्स देना (क़ानूनी तौर पर) हर किसी का हक़ है, और इस म्यूचुअल फंड इनसाइटके मई 2023 के इशू की हमारी कवर स्टोरी आपको ये बताएगी कि आप अपने निवेश के साथ समझौता किए बग़ैर कैसे ये काम कर सकते है.

देखिए ये वीडियो- स्मॉल सेविंग स्कीम vs डेट म्यूचुअल फ़ंड

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